उत्‍तराखंड: रक्षाबंधन के दिन होता है इस मंदिर में खास युद्ध

Mo. AmilMo. Amil   14 Aug 2019 10:11 AM GMT

उत्‍तराखंड में एक ऐसा मंदिर है जहां रक्षाबंधन के दिन बग्वाल यानी पत्थरमार युद्ध होता है। इसे युद्ध को देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। इस मंदिर का नाम है शक्तिपीठ मां वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता है।

इस मंदिर के पुजारी महेश बताते हैं कि देवीधुरा में बसने वाली 'मां वाराही का मंदिर' 52 पीठों में से एक माना जाता है। आषाढ़ी सावन शुक्ल पक्ष में यहां गहड़वाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया खामों के बीच बग्वाल (पत्थरमार युद्ध) होता है। देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर शक्ति के उपासकों और श्रद्धालुओं के लिये पावन और पवित्र स्थान है। ये क्षेत्र देवी का 'उग्र पीठ' माना जाता है।

पुजारी बताते हैं कि चन्द राजाओं के शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और ललत जिह्वा महाकाली की स्थापना की गई थी। उस समय 'लाल जीभ वाली महाकाली' को महर और फर्त्यालो द्वारा बारी-बारी से हर साल नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी। माना जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा इस मूर्ति को घने जंगल के बीच एक भवन में स्थापित कर दिया गया था। धीरे-धीरे इसके चारो ओर गांव स्थापित हो गये और ये मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बन गया।

इसे भी पढ़ें- आंखों से दिखायी नहीं देता, फिर भी बनाती हैं खूबसूरत राखियां



उन्‍होंने यह भी बताया जाता है कि पहाड़ी के छोर पर खेल-खेल में भीम ने शिलायें फेंकी थी। इन विशाल शिलाओं में से दो शिलायें आज भी मन्दिर के निकट मौजूद हैं। जिनमें से एक को 'राम शिला' कहा जाता है, इस स्थान पर 'पचीसी' नामक जुए के चिन्ह आज भी विद्यमान हैं। जनश्रुति के अनुसार यहां पर पाण्डवों ने जुआ खेला था। उसी के समीप दूसरी शिला पर हाथों के भी निशान हैं।

स्‍थानीय लोगों ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार ये स्थान गुह्य काली की उपासना का केन्द्र था। जहां किसी समय में काली के गणों को प्रसन्न करने के लिये नरबलि की प्रथा थी। हालांकि इस प्रथा को कालान्तर में स्थानीय लोगों द्वारा बन्द कर दिया गया। देवीधूरा के आस-पास निवास करने वाले लोग वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहडवाल खामों के थे, इन्हीं खामों में से हर साल एक व्यक्ति की बारी-बारी से बलि दी जाती थी।

इसे भी पढ़ें- क्या सच में खुले में शौच मुक्‍त (ODF) हो सकेगा भारत?

इसके बाद नर बलि बंद कर दी गयी और 'बग्वाल' की परम्परा शुरू हुई। इस बग्वाल में चार खाम उत्तर की ओर से लमगड़िया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक, पूर्व की ओर से गहडवाल के रणबांकुरे बिना जान की परवाह किये एक इंसान के रक्त निकलने तक युद्ध लड़ते हैं।

भले ही तीन साल से बग्वाल फल-फूलो से खेली जा रही हो उसके बावजूद भी योद्धा घायल होते हैं और उनके शरीर रक्त निकलता दिखता है। मां वाराही देवी के मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां वाराही देवी की मूर्ति है। मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ति के दर्शन खुली आंखों से नहीं कर सकता है। क्‍योंकि मूर्ति के तेज से उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। इसी कारण 'देवी की मूर्ति' को ताम्रपेटिका में रखी जाती है।


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top