इंजीनियर की जॉब छोड़ बने किसान, करते हैं इंटीग्रेटेड फार्मिंग

Ankit Kumar SinghAnkit Kumar Singh   30 March 2019 7:07 AM GMT

कैमूर (बिहार)। कई साल तक वेब डिजाइनर की नौकरी करने के बाद जब चितरंजन गाँव में खेती करने आए तो लोगों ने उन्हें तरह-तरह की बातें सुनाई। निकम्मा तक कह दिया, लेकिन आज वही लोग उनकी तारीफ करते हैं।

बिहार के कैमूर जिले के झिझुआ गाँव के चितरंजन सिंह, आज पशुपालन और मछलीपालन के बदौलत साल के 7 से 8 लाख रुपए गांव में ही रहकर कमा रहे है। लगभग 10 साल पहले वेब डिजाइन में डिप्लोमा कोर्स किया। जिसके बाद 2009 में एक प्राईवेट कम्पनी में 12000 रुपए की नौकरी मिली। मगर थोड़ी गलती होने पर अधिकारियों से डांट भी मिलती थी। यह बात अच्छी नहीं लगी जिसके बाद वह 2011 में अपने गांव लौट आए

कम्प्यूटर के की बोर्ड पर चलने वाले हांथो में फावड़ा और जानवरों को खिलाने के लिए भूसा उठाया। पशुपालन का काम शुरू किया। अपने पसीने की स्याही से गांव में ही मुकद्दर के सुनहरे पन्ने लिखना शुरू किया। जिसमें ना तो अधिकारी की डांट थी ना किसी का दबाव।

अपने पुरानी बातों को याद करके कहते है कि जब गांव आया था तो लोग मुझे ताना मारते थे कि पढ़ लिख कर गांव क्या करने आ गए यहां कुछ नहीं है मगर आज वहीं लोग मुझसे सलाह मांगने आते हैं रोजगार करने के लिए गांव में। चार भाइयों में सबसे छोटा था पिता से लेकर सबको खासी उम्मीदें थी कि कुछ अच्छा करेगा। लेकिन नौकरी छोड़ने के बाद घर आया तो घर वालों ने निकम्मों की श्रेणी डाल दिया लेकिन मेरी मेहनत ने उनके। इस सोच को बदल दिया।

चितरंजन बताते हैं, "सरकार की मदद से मैंने 5 गायों से पशुपालन शुरू किया और दूध के व्यापार से जुड़ा। आज 16 गाय हैं जिसमें साहीवाल और हॉल्स्टीन फ़्रिजियन नस्ल की गाय है। जिससे मुझे एक दिन में एक कुंतल बीस किलो दूध प्राप्त होता है। जिसके बाद मैंने खुद अपना डेयरी खोल दिया है।"


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वो आगे बताते हैं, "वहीं पौने दो एकड़ में मछलीपालन का काम शुरू किया। इससे मुझे एक सीजन में 70 कुंतल मछली तैयार होती है जो 7 लाख रुपए तक बाजार में बिक जाती है, जिसमें खर्च काट कर मुझे 3 लाख रुपए तक कमाई हो जाती है ,और वहीं दूध से 4 लाख तक साथ ही खेती से भी अच्छी कमाई हो जाती है।

चितरंजन खुश होकर कहते हैं, "आज अगर मै दिल्ली मे रहता तो साल के 3 से 4 लाख रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाता परिवार की जरूरतों को पूरा करने में परेशान होता। मगर आज मैं घर बैठे ही सुबह शाम केवल दो से तीन घंटे मेहनत करके एक मोटी कमाई कर रहा हूं। बच्चों को अच्छी शिक्षा मुहैया करवा रहा हूं। आज मेरी अपनी जिला स्तर पर मेरे काम से मेरी पहचान है जो दिल्ली रहने पर नहीं होती।"

चितरंजन कहते है कि गांव में रोजगार की आपार संभावनाएं है बस पढ़े लिखें लोगों को यह सोच बदलनी होगी की गांव में कुछ नहीं हो सकता। वहीं चितरंजन रोज उन गांव की गलियों से अपने तालाब से घर जाना होता है जो दस पहले कुछ ऐसा नहीं था आज लोग मिलते है उनसे नये तकनीक से खेती करने की सुझाव लेते है और चितरंजन उनको सुझाव देते है साथ यह भी कहते है की मेरे लिए कम्प्यूटर से यह फावड़ा वाली जिंदगी अच्छी है।

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