दयामणि बारला: 'लोकसभा चुनाव आदिवासियों के लिए लक्ष्मण रेखा हैं'

झारखण्ड। झारखण्ड राज्य की आयरन लेडी कहलाने वालीं दयामणि बारला गाँव कनेक्शन से बात करते हुए कहती हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश झारखण्ड के आदिवासियों के लिए जनसंहार जैसा है। दयामणि सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के बारे में बात कर रही हैं जिसमें कहा गया कि पच्चीस लाख आदिवासियों को जंगल से बाहर निकलना होगा। हालांकि, न्यायालय ने बाद में इस आदेश पर रोक लगा दी।

दयामणि बारला कहती हैं कि आदिवासी लोगों का जीवन जंगल पर निर्भर करता है। कोर्ट ने कहा कि पूरे देश के पच्चीस लाख आदिवासियों को जंगल से निकाल दिया जाए। इन पच्चीस लाख में से सत्रह लाख झारखण्ड के आदिवासी हैं। झारखण्ड की अधिकतर जनसंख्या जंगलों में रहती है, वही उनका घर है।

बारला कहती हैं, इस समय सतरह्वीं लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं। आदिवासी पशोपेश में हैं कि क्या करें। उन्हें लग रहा है कि हमें अपने हक के लिए लड़ने का मौका तक नहीं मिला। वो बताती हैं कि साल 2008 से 2010-12 तक 70 लोगों में से केवल 18 या 19 लोगों को वनपट्टा मिला है। जिन लोगों ने वनपट्टे के लिए दावापत्र भरे, उनमें से नाम भर के लोगों को ही ज़मीन मिली। जिन्हें मिली भी तो बहुत कम।

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दयामणि बारला बताती हैं, दो तरह से दावापत्र भरे जाते हैं। एक तो व्यक्तिगत और दूसरा समुदाय के आधार पर। रांची में जिन लोगों ने साल 2008 से 2012 के बीच दावापत्र भरे उनमें से केवल तीन लोगों को ज़मीनें मिलीं। यहां लोगों को मुश्किल से 15 से 20 एकड़ ज़मीन का वनपट्टा मिला है। इस बात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वन अधिकार कानून के तहत वनपट्टा मिलने की स्थिति कितनी दयनीय है।

"वन दरोगा (Forester) और थाना पुलिस जांच के लिए कभी नहीं जाती। दावापत्र के आधार पर जिस ज़मीन पर दावा पेश किया जा रहा है वो उन लोगों की है या नहीं, वो 30 सालों या उससे अधिक से वहां रह रहे हैं या नहीं, ये जांच करना फॉरेस्टर और थाना अधिकारी का काम है लेकिन वो कभी जांच करने जाते ही नहीं हैं। न जाने किस आधार पर लोगों को ज़मीन दी जाती है?" - दयामणि बारला कहती हैं।

बारला का कहती हैं, "जो लोग दावा करते हैं कि जंगल और वन जीवों को बचाने के लिए आदिवासियों को बाहर निकालना पड़ेगा उन्हें मैं कहना चाहती हूं कि आदिवासी जंगल को अपना घर मानते हैं और वन जीवों के साथ परस्पर ज़िन्दगी जीते हैं। आप पूरी दुनिया को देख लीजिए जंगल और वन जीव वहीं सुरक्षित हैं जहां पर आदिवासी हैं। बिना आदिवासियों के जंगल की कल्पना करना नामुमकिन है।"

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आम चुनावों के बारे में बारला कहती हैं, "पूरे देश के आदिवासियों, किसानों एवं तमाम अल्पसंख्यकों के लिए ये चुनाव लक्ष्मण रेखा हैं। सरकार ने साल 2014 के बाद से अल्पसंख्यकों के बचाव के लिए बने कानूनों को खत्म कर दिया। हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़नी होगी।"

दयामणि बारला दावा करती हैं कि इस समय लोकतंत्र खतरे में है।

"कॉरपोरेट घराने राजनीति को नियंत्रित कर रहे हैं। हमें उनके खिलाफ लड़ना होगा। हम सभी अल्पसंख्यकों को संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए फासिस्ट ताकतों को पराजित करना होगा। तब ही वन अधिकार अधिनियम और हमारे अधिकार बच पाएंगे, आम लोगों के अधिकारों को बचाया जा सकेगा," - बारला अपनी बात समाप्त करते हुए कहती हैं।

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