सुदेवी दासी नहीं जाएंगी जर्मनी, भारत में ही रहकर करती रहेंगी गोसेवा

मथुरा (उत्तर प्रदेश) पिछले 38 वर्षों से राधाकुंड में गोसेवा कर रही जर्मनी की फ्रेडरिक इरिना ब्रूनिंग उर्फ सुदेवी दासी को देश छोड़कर नहीं जाना पड़ेगा, वो गायों की सेवा करती रहेंगी।

ब्रजभूमि में गोसेवा कर रही जर्मन की फ्रेडरिक इरिना ब्रूनिंग उर्फ सुदेवी दासी के वीजा की अवधि 25 मई को खत्म हो चुकी थी। विदेश मंत्रालय के स्तर से इसमें इजाफा न किए जाने के बाद यह मामला विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक पहुंचा था। विदेश मंत्री के हस्तक्षेप के बाद विदेश मंत्रालय ने पद्मश्री फ्रेडरिक इरिना के वीजा की अवधि बढ़ा दी है।

उन्होंने तत्काल रिपोर्ट तलब की और फिर विदेश मंत्रालय ने सोमवार को वीजा की अवधि बढ़ाते हुए इसकी सूचना भी इरिना को दे दी। केंद्र सरकार ने पिछले साल ही जर्मन निवासी फ्रेडरिक इरिना ब्रेनिंग को गो-सेवा के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया था। वीजा की अवधि न बढ़ने पर निराश इरिना ने पद्मश्री को लौटाने की बात तक कह दी थी। सुदेवी दासी ने वीजा अवधि बढ़वाने को भारत सरकार को प्रार्थना पत्र भेजा गया था, जिसे सरकार द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है। यह कहते हुए सुदेवी दासी के आंसू निकल पड़े। उन्होंने कहा कि अगर वीजा अवधि नहीं बढ़ी तो मुझे बीमार और बेसहारा गायों की सेवा छोड़ कर अपने देश जर्मन जाना पड़ेगा।

इरीना ब्रूनिंग की कहानी बड़ी दिलचस्प है, साल 1978 में जब जर्मनी की एक युवती भारत घूमने आई थी, उसके पिता भारत में जर्मनी के राजदूत थे। युवती का नाम फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग था जो देश के कई हिस्सों को घूमते हुए कृष्ण की धरती मथुरा वृंदावन पहुंच गई। जहां उसकी दुनिया बदल गई, नाम बदल गया, धर्म बदल गया, अब वो सुदेवी दासी के नाम से जानी जाती हैं। उनका एक और नाम भी है, "हजार बछड़ों की मां।"


जर्मनी की मूल निवासी फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग ने अपने देश से 7000 किलोमीटर दूर मथुरा में नया धर्म अपना लिया है। वो सन्यासियों सा जीवन जीती हैं। भगवान का भजन करती हैं और गायों की सेवा। इसके लिए उन्होंने कौन्हाई गाँव में 3 एकड़ जमीन किराए पर ली है। सुरभि गौसेवा निकेतन में आसपास कई जिलों से चोटिल, बीमार गाय और बछ़डे और गोवंश लाए जाते हैं। डॉक्टरों और सेवकों की टीम उनका इलाज करती है।

"हमारे पास संसाधन बहुत कम हैं। रखने के लिए जगह भी पर्याप्त नहीं है। लेकिन कोई चोटिल गाय लेकर आ जाता है तो हम मना नहीं कर पाते। कई गाय इलाज के दौरान मर भी जाती हैं। हमने 9 लोगों को गायों की सेवा के लिए रखा है। जितना खर्च है उतना पैसा नहीं मिल पाता। काफी लोग डोनेशन देते हैं लेकिन सरकार से कोई मदद नहीं मिलती," सुदेवी दासी बताती हैं।

वर्तमान में इस समय यहां पर 200 दृष्टिहीन, 600 से ज्यादा बछड़े और बैल हैं। गायों के इलाज और चारे-पानी के लिए 9 लोग तैनात किए गए हैं, जबकि कई लोग स्वयं सेवा भी करते हैं।

फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग का नाम वर्ष 2019 की शुरुआत में एक बार सुर्खियों में तब आया जब भारत सरकार ने इस वर्ष के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में एक पद्म पुरस्कार की लिस्ट में उनका नाम था। गायों के सेवा के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया गया है।

फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग से सुदेवी दासी खुद को हजार बछड़ों की मां कहलाना भी पसंद करती हैं। उनकी गोशाला में काम करने वाले भी उन्हें के रंग में रंगे नजर आते हैं। गोशाला की कई परंपराएं मानवता का पाठ पढ़ाती हैं। गोशाला में दूध नहीं बेचा जाता है। कई बार जिन बछड़ों की मां मर जाती हैं उनके लिए दूध बाहर से खरीद कर आता है। दूसरा जब कोई गर्भवती गाय बच्चा देती है तो पांच दिन बाद उसके दूध से जो खीर बनती है, उससे सबसे पहले ग्वालिया का भोग लगाया जाता है। ग्वालिया वो शख्स होता है तो इन गायों की सेवा करता है।

61 वर्षीय फ्रेडरिक इरिना राधाकुंड में सुरभि गौशाला का संचालन कर रही हैं, जहां करीब दो हजार से अधिक गायों का पालन किया जाता है। विदेश मंत्रालय ने फिलहाल पद्मश्री फ्रेडरिक इरिना के वीजा की अवधि एक साल के लिए बढ़ाई है। इस सूचना के बाद इरिना ने सरकार और विदेश मंत्री का आभार जताया है।

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