घोड़े के इस मेले में आते हैं कई प्रदेशों से ग्राहक

Ajay MishraAjay Mishra   4 March 2019 5:56 AM GMT

कानपुर। उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर और कन्नौज बार्डर पर बसे बिल्हौर तहसील क्षेत्र के मकनपुर में लगने वाला मदार साहब बाबा का मेला काफी चर्चा में रहता है। यहां के मेले में दस हजार से छह लाख तक के घोड़े बिकते हैं।

कानपुर जिले के मकनपुर का मेला लखनऊ-आगरा प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस-वे के निकट लगा है। यहां आने वाले घोड़ों के विक्रेता और खरीदार आस-पास क्षेत्र के ही नहीं बल्कि कई प्रांतों के हैं। शौक पूरा करने के अलावा लोग कमाई करने के लिए भी घोड़ा खरीदने आते हैं। यह मेला प्रसिद्ध होने का एक कारण यह भी है कि घोड़ों के मेले यूपी में कम ही लगते हैं। इसलिए दूसरे प्रदेशों के लोगों की दस्तक यहां है।

जमीन पर बोरे बिछाए हाथ में डंडा लेकर धूप का आनंद लेते हुए घोड़ों की रखवाली करते सहारनपुर जिले के मख्खनपुर से आए 52 वर्षीय व्यापारी शमदीन बताते हैं, ''चारों तरफ से लोग आते हैं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, एमपी से लोग यहां आते हैं। मैं 15 सालों से यहां आ रहा हूं।''

व्यापारी शमदीन बताते हैं, ''घोड़े की खासियत के अनुसार दस हजार, पांच हजार और दो लाख में भी घोड़ा मिल जाता है। कोई छोटा पसंद करता है तो कोई बड़ा पसंद करता है। एक तारीख से चार-पांच तारीख को काफी भीड़ रही। बसंत पंचमी को बहुत भीड़ होती है।''

कन्नौज के मानीमऊ निवासी 20 साल के इरशाद खां बताते हैं, ''हमारा तो घर ही है। हर साल यहां आते हैं। यहां अच्छा जानवर बिकता है। उत्तर प्रदेश में आगरा के बटेश्वर और कानपुर के मकनपुर का मेला घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है। चार लाख, पांच लाख और छह लाख तक का घोड़ा मिलता है। कोई शो करता है तो कोई गंवाता है।''


सहारनपुर के देवबंद से आए 55 साल के नूर हसन कहते हैं, ''मेले में करीब 10 हजार घोड़े आते होंगे। पांच-सात हजार घोड़ों की बिक्री भी हो जाती होगी।''

'उम्र बीत गई घोड़ों का व्यापार करते-करते'

कौशाम्बी के मूरतगंज से आए 55 साल के मनोहर खां बताते हैं, ''पंजाब, मारवाड़, गुजरात, सिंध, बारूत्रा, काठियाबाद की नस्ल के घोड़े अच्छे होते हैं। हाईट के लिए पंजाब, फटेकान का सिंधी और कानपत्ती के लिए काठियाबाद, रेस के लिए बारूत्रा का घोड़ा पसंद किया जाता है।''

आगे बताया कि ''पुष्कर के मेले में 1.25 करोड़ का घोड़ा बिका था। देबाश में 51 लाख तक का घोड़ा बिक्री हो चुका है। महाराष्ट्र के सारनखेड़ा में पदमा घोड़ा तीन बार शील्ड भी जीत चुका है।''

''पहले मेरे पिताजी बख्ताबर खां आते थे। हम भी उनके साथ आया करते थे। उम्र बीत गई है घोड़ों का व्यापार करते-करते। 30-35 साल से यहां आ रहे हैं। यह पुरानी मण्डी है। इसके अलावा बिहार के सोनपुर, बाराबंकी के देवा शरीफ, आगरा के बटेश्वर, राजस्थान के पुष्कर, प्रतापगढ़ के भद्री, कासगंज के सोरो, बदायूं के रमाजानपुर, बरेली और महाराष्ट्र के मालगांव में भी घोड़ों के मेले लगते हैं।''

मनोहर खां बताते हैं '' यहां मदार साहब बाबा की मजार है। इसलिए भी लोग ज्यादा आते हैं। तीन साल पहले पुष्कर के मेले में 1.25 करोड़ तक का घोड़ा बिका। एक घोड़े की कीमत सलमान खान ने दो करोड़ लगा दी थी। सारन खेड़ा के मेले में यह घोड़ा था। घोडे़ की चाल और शौक की वजह से इतने रेट रहते हैं।''


ये देखनी पड़ती खासियतें

घोड़ों की खरीददारी के दौरान उसकी चाल देखनी पड़ती है। व्यापारी शमदीन बताते हैं, ''घोड़ा बिदकता तो नहीं है। सही चलता है। उदंत या दंत गया है। दांत, आंख भी देखना जरूरी होता है।''

खरीदने के दौरान लिखा-पढ़ी जरूरी

जानवरों की खरीदारी के दौरान उसकी लिखा-पढ़ी कराना भी जरूरी है। मकनपुर में यह शुल्क 600 रूपए प्रति घोड़ा देना पड़ता है। ऐसा यहां के व्यापारी बताते हैं।

कानपुर जिले के सिंघौली निवासी 32 वर्षीय अर्जुन सिंह अपने हाथ में पीले रंग का कवर चढ़ा रसीद बुक पकड़े और अपने दाहिने कान में पेन लगाए हैं। बताते हैं, ''तीन फरवरी से 20 फरवरी तक सरकारी लिखा-पढ़ी में मेला लगा रहेगा। बसंत पंचमी को हर साल भीड़ अधिक रहती है। लगातार तीन दिन तक लोग खूब आएंगे।''


आगे बताया कि ''सफेद रंग का नकुई घोड़ा महंगा बिकता है। यहां बहुत दूर-दूर से लोग घोड़ा खरीदने आते हैं। लगभग सभी प्रदेशों से लोग आते हैं शायद ही कोई प्रदेश छूटा हो। बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से लोग आते हैं।''

''घोड़ों की मण्डी आस-पास तो होती नहीं है। चार-पांच मण्डी होती हैं। इसलिए लोग दूर-दूर से आते हैं। पांच हजार से लेकर दो लाख, चार लाख रूपए तक का घोड़ा मिल जाता है। नस्ल के हिसाब से कीमत तय होती है। जो घोड़े दो लाख-चार लाख के होंगे वह शौक के लिए जाते हैं। कुछ लोग शादी-ब्याह में चलाने तो कुछ लोग पालने के लिए ले जाते हैं।'' यह अर्जुन सिंह कहते हैं।

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