बुंदेलखंड के इस गाँव तक नहीं पहुंच पाती कोई सरकारी योजना

अरविंद सिंह परमार

कम्युनिटी जर्नलिस्ट

ललितपुर (उत्तर प्रदेश)। मध्य प्रदेश की सीमा के पास बसे उत्तर प्रदेश के इस गाँव में अगर कोई बीमार हो जाए तो चारपाई पर लादकर ले जाना पड़ता है। हाल ये है कि अब यहां के लड़कों की शादियां नहीं हो पा रही है, क्योंकि इस गाँव में कोई अपनी बेटियां नहीं ब्याहना चाहता है।

बुंदेलखंड के ललितपुर जिला मुख्यालय 95 किमी. दूर मडवारा तहसील के बारई गाँव में कोई सरकारी योजना नहीं पहुंच पाती है। इस गाँव को चारों तरफ जंगल और विंध्याचल की पहाड़ियां हैं।

इस गाँव तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं बनी है, यहां का मतदान स्थल इस गाँव से आठ किमी. दूर ठनगना है, यहां पर किसी भी फोन का नेटवर्क नहीं आता है। लोक सभा चुनाव में विकास के मुद्दे पर वोट मांगे जा रहे हैं, विकास और सुविधाएं क्या होती हैं यहां के लोग नहीं जानते।

विकास के नाम पर थोड़े बहुत संख्या में स्वच्छ भारत अभियान के शौचालय तो बने हैं उनके उपयोग के बारे में पूछने पर बारई गाँव की शोभारानी बताती हैं, "चार हैण्डपम्प में से दो खराब हैं और दो सही हैं उनमें एक घंटे में दो से तीन कुप्पा पानी निकलता हैं। पीने को पानी और घर खर्च को पानी नहीं मिलता शौचालय को पानी कहा से लाएं।

इन गाँवों के अधिकतर लोग रोजी रोटी के लिए बड़े शहरो की ओर पलायन करते हैं। बारई गाँव के मुनीम सिंह लोधी (34 वर्ष) कहते हैं, "बाहर से चार महीना मजदूरी करके लाते हैं उस पैसों से तीन महीना घर का खर्च भी नहीं चल पाता।"

झांसी लोकसभा संसदीय सीट पर 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या 27,57,007 है! इसमें 66.4 फीसदी ग्रामीण और 33.6 फीसदी शहरी आबादी है! 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के मुताबिक इस लोकसभा सीट पर पांचों विधानसभा सीटो में बबीना, ललितपुर, झांसी नगर, महरौनी और मऊरानीपुर, जिनमें से महरौनी और मऊरानीपुर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है! इन सीटों पर कुल 19,91,832 मतदाता और 2,075 मतदान केंद्र हैं। इससे पहले कांग्रेस से प्रदीप जैन और 2014 में भाजपा की उमा भारती का संसदीय क्षेत्र से जीत कर केन्द्र सरकार का प्रतिनिधित्व किया। महरौनी विधान सभा से मन्नू कोरी राज्य सरकार में मंत्री हैं। बुंदेलखंड के हर गाँव को मुख्य सड़क और लाईट से जोडने का काम किया लेकिन सरकार की विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाऐं इन गाँवो की पहुच से कोसों दूर हैं।

वो आगे कहते हैं, "आसपास के गाँवो के बीच कोई उप स्वास्थ्य केन्द्र नहीं हैं बीमारी के समय 15 किमी सौरई जाओ या 25 किमी दूर मडावरा। एम्बुलेंस बुलाने पर वह आठ किमी दूर ठनगना गाँव में खड़ी होती है, जब तक वहां पहुंचते हैं तब तक वह वापस चली जाती हैं, एम्बुलेस वाले कहते हैं तुमारे यहाँ रास्ता नहीं हैं। ऐसे में गाँव वालों को तो मरना ही हैं।"

चौमासे (बरसात) में तो मरीज को चारपाई पर लादकर आठ किमी चलते हैं तब जाकर साधन मिल पाता हैं, "इसी गाँव की प्रकाशबाई (54 वर्ष) पैरों से विकलांग है चलने फिरने में काफी परेशानी होती हैं अपनी बहू की बात करते हुए उनकी आँखों में आंसू आ गये प्रकाशबाई कहती हैं, "गर्भवती महिलाओं की कोई सुध नहीं लेता। हमारी बहू का तीन दिन पेट दर्द हुआ, अस्पताल नहीं पहुंच पाये मरते मरते बची हमारी बहु।"

इन गाँवो में सोलर लाईट के खम्भों की लाईट लुका छिपी खेलती हैं एक या दो घंटे से ज्यादा नही जलती। बारई गाँव के मुनीम सिंह लोधी खम्भों की ओर इशारा करते हुए कहते हुए मुनीम सिंह लोधी कहते हैं, "कुछ काम की नहीं हैं, दिन में जल जाय तो रात में नहीं और रात में जल जाय तो दिन में नहीं? बरसात में तो बुरी दशा होती हैं।"

इसी जंगल के हीरापुर गाँव के मोहन सिंह (40 वर्ष) कहते हैं, "ना रोड हैं ना लाइट हैं वोट माँगने वाले कहते हैं हमें वोट दो लाइट और रोड दोनों होंगे। वोट डलवाने के बाद सब भूल जाते हैं वोट माँगने के लिए हाथ जोड़ते हैं।"

कुछ महीने पहले लाइट की लाइन आने की बात से हल्काई की तरह बाकी गाँव वाले बहुत खुश थे खम्भे तो आये वो भी वापिस चले गये। बारई गाँव के हल्काई (50 वर्ष) कहते हैं, "डीएम साहब के आने से पहले लाइट के खम्भे यानी पोल डल गये थे, हमारे गाँव तक, जैसे ही डीएम साहब यहाँ से वापस गये और पीछे से विभाग वाले सभी खंभे उठा ले गये।" ऐसे दुर्यव्यवहार से हल्काई जैसे ग्रामीणों का विकास कार्य से विश्वास उठ गया। वन विभाग की वजह से ना रोड आ सकती हैं ना लाइट।

गली घूम रहे थे तभी हमे माखन (48 वर्ष) मिले वो गाँव की बदतर स्थिति का हवाला देते हुए माखन ने कहा, "गाँव में रिश्ते नहीं आते पाँच लड़कों की शादी होने वाली थी रिश्तेदार आये और उन्होने देखा और कहा इस गाँव में तो लाइट और रोड कुछ भी नही हैं कि बात करते हुए शादी तोड़ दी। बिना शादी के लड़के घूम रहे हैं।

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