दिव्यांगता को बनायी अपनी ताकत, सिलाई सिखाकर दूसरी लड़कियों को भी बना रहीं आत्मनिर्भर

दीपक सिंह/राागिनी दुबे, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। दुर्गेश भले ही बिना सहारे के एक कदम भी न चल पाती हों, लेकिन अपनी दिव्यांता को बोझ नहीं बनने दिया, आज वो सिलाई करके न केवल अपना घर चला रहीं हैं। बल्कि दूसरी महिलाओं को भी सिलाई सिखाकर आत्मनिर्भर बना रही हैं।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 49 किमी दूर हैदरगढ़ के पूरे मितई पुरवा वार्ड की रहने वाली दुर्गेश कुमारी के माता-पिता की मौत होने के बाद उनके छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारी भी उनपर आ गई, ऐसे में उन्होंने हार नहीं मानी। वो बताती हैं, "पिता की कैंसर से और मां की बीमारी से मौत के बाद भाई और बहन की परवरिश का जिम्मा मुझ पर आ गया। मां से सीखी सिलाई-कढ़ाई को मैंने हथियार बनाया और निकल पड़ी जिंदगी की जंग लड़ने, हौसला और परिश्रम से दिव्यांग होते हुए भी मैंने ना सिर्फ अपने परिवार को मुश्किलों से निकाला बल्कि मुहल्ले और आसपास की महिलाओं को भी सिलाई सिखाने लगी।"


दिव्यांग दुर्गेश कुमारी के पास सिलाई का प्रशिक्षण लेने वाली भियामऊ गाँव की रोमा देवी बताती हैं, "मैं पिछले चार साल से दीदी के पास सिलाई कढ़ाई सीखने आती हूं। इनके पिता शंकर सिंह बिजली विभाग में लाइनमैन थे, और मां यशोदा देवी व भाई कृष्ण सिंह, संतोष कुमार सिंह हैं। पिता ने दोनों बेटों को बीए तक और दिव्यांग बेटी को इंटर तक पढ़ाया था। शंकर सिंह की कैंसर से 2005 में मौत हो गई, तो सदमे में मां भी बीमार रहने लगी दो साल बाद मां की भी मौत हो गई। छोटे भाई पिता की नौकरी पाकर अलग हो गया अब पूरे परिवार के पालन-पोषण का भार दिव्यांग दुर्गेश कुमारी पर आ गया। दुर्गेश ने घर में रखी सिलाई मशीन से कपड़े सिलना शुरू किया साथ ही साल 2010 से अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बनाने की मुहिम चलाने लगी। वह गरीब महिलाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं।

वहीं प्रशिक्षण लेने वाली नीमा निवासी पुरे मितई वार्ड ने बताया कि दुर्गेश सिलाई सेंटर के नाम से सिलाई सेंटर है और यहां मैं सिलाई सीखने आती हूं, सिलाई सेंटर में जो प्रशिक्षण देती हैं वह दीदी विकलांग हैं और ठीक से बोल भी नहीं पाती हैं लेकिन फिर भी वह हम लोगों को प्रशिक्षण दे रही हैं। दीदी कहती हैं कि अपने पैरों पर खड़े होकर खुद कमाओ किसी पर बोझ मत बनो।"

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