मूर्तिकला के व्यवसाय से गाँव के युवाओं को मिल रहा रोजगार

Virendra SinghVirendra Singh   11 Oct 2019 6:27 AM GMT

दीपक सिंह, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। जहां एक लोग काम के सिलसिले में बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं, वहीं पर राम तीरथ पटेल ने अपने गाँव में ही मूर्तिकला का काम शुरू किया, जिससे उन्हें तो फायदा हुआ ही, कई युवाओं को भी रोजगार मिला है।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से करीब 55 किमी दूर त्रिवेदीगंज ब्लॉक में गोमती नदी के किनारे बसे मौलाबाद मजरे गढ़ी के रहने वाले राम तीरथ पटेल (28 वर्ष) ने मूर्तिकला का काम शुरू किया है। वो बताते हैं, "मेरी बचपन से ही चित्रकारी में रुचि थी, मैं जब भी पेंटिंग बनाता तो गांव के लोग कहते कि यह आगे बड़ा कलाकार बनेगा फिर मेरे मन में यह बात घर कर गई। जब मैंने 12वीं की परीक्षा पास की फिर मैंने आर्ट कॉलेज के बारे में पता किया। वहां एडमिशन लिया वहां से मैंने डीएफए, मास्टर और नेट की डिग्री लेने के बाद जॉब के लिए काफी तैयारी की, लेकिन मुझे कहीं भी नौकरी नहीं मिली। फिर मैंने मूर्तिकला में अपना कैरियर बनाने की ठान ली, और कई स्टूडियो में काम सीखा कई अन्य प्रदेशों में गया वहां काम किया फिर मेरी मुलाकात राम सुतार जी से हुई जिनसे मुझे मूर्तिकला में काफी प्रेरणा मिली"

वो आगे बताते हैं, "फिर मेरा जॉब से रुझान हट गया और मैंने लखनऊ में स्टूडियो बनाया वहां पर मुझे अच्छे भरोसेमंद लड़के नहीं मिलते थे, अपने लड़के थे नहीं आते थे काम करके चले जाते थे, बाहर के थे फिर धीरे-धीरे में काम करता गया और लोगों को मेरा काम पसंद आता गया। फिर मुझे लगा कि अब मुझे काम और ज्यादा बढ़ाना चाहिए लेकिन काम ज्यादा तभी पढ़ पाएगा, जब मेरे पास एक अच्छी टीम होगी आर्टिस्टों की फिर मैंने सोचा क्यों न अपने गांव में ही मैं काम शुरू करूं। फिर मैं गांव चला आया और यहां मैंने मूर्तिकला का काम शुरू किया गांव वालों का भी रुझान धीरे-धीरे काम में बढ़ने लगा। गांव के दर्जनों बेरोजगारों युवाओं को मैंने काम सिखाया और आज वो अच्छा काम कर रहे हैं।"


मूर्तिकला बनाने के बारे में वो कहते हैं, "सबसे पहले मूर्तिकला के लिए जगह का चुनाव करें। अगर आप घर पर मिट्टी की मूर्तियां बनाना चाहते हैं। तब इसके लिए एक कमरा और थोड़ी-सी खुली जगह मूर्तियां सुखाने के लिए पर्याप्त है, लेकिन प्रोफेशनल तरीके से बड़े स्तर पर काम करने के लिए आपको कम से कम पांच सौ गज जगह चाहिए। जगह कहीं भी हो मगर आपका संपर्क हर ऐसी जगह और व्यक्ति से होना चाहिए जहां से आप आसानी से काम का ऑर्डर ला सकें।

मूर्ति निर्माण प्राचीनतम कलाओं में से है, लेकिन यह आज भी युवाओं के लिए रोजगार का प्रमुख साधन है। अपने घरों में सजावट के लिए ही सही, लोगों में मूर्तियों के प्रति मोह बढ़ रहा है, जिसने विभिन्न तरह की मूर्तियों की मांग में काफी इजाफा किया है। अगर आपकी रुचि भी मूर्तियों में है, तो यह आपके लिए रोजगार का साधन बन सकता है।


एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले 20 वर्षों में मूर्तियां बनाने वालों की संख्या लगभग 15 गुना बढ़ी है। इनमें पारंपरिक रूप से मूर्ति बनाने का काम करने वाले करीब पांच प्रतिशत हैं. इस क्षेत्र में डिग्री लेने वालों की संख्या लाखों में है। ऐसे युवाओं के लिए मूर्तिकला स्वरोजगार का अच्छा जरिया बन सकती है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि पिछले 20 वर्षों में भारतीयों द्वारा निर्मित कंटैम्परेरी (समकालीन) मूर्तियों की मांग हमारे देश के बाजारों में करीब आठ प्रतिशत और विदेशी बाजारों में 30 प्रतिशत तक बढ़ी है। जबकि पारंपरिक मूर्तियों की मांग स्थानीय बाजारों में तकरीबन 25 प्रतिशत और विदेशी बाजारों में 40 प्रतिशत बढ़ी है।

मूर्ति कलाकार राम तीरथ पटेल आगे बताते हैं, "प्रोफेशनल तरीके से काम शुरू करने के लिए आप कम से कम 15 लाख रुपए से शुरू कर सकेंगे। बहुत अच्छे स्तर पर काम करने के लिए आप 50 लाख रुपए इस काम में लगा सकते हैं। इस काम में आपकी आमदनी आपके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की बिक्री और आपकी पहचान के अलावा आपके काम की सफाई और उसकी प्रसिद्धि व प्रशंसा पर निर्भर करेगी। वैसे एक मिट्टी का मूर्तिकार महीने में 10 से 15 हजार रुपए और एक डिग्रीधारी कलाकार 25 से 30 हजार रुपए महीने में आसानी से कमा सकता है।"


मूर्ति बनाने के लिए काली मिट्टी और चिकनी मिट्टी की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा मिट्टी की मूर्तियों में पीओपी का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन धातुओं में एल्युमीनियम, तांबा, जस्ता, स्टील आदि का प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है। ये सभी धातुएं लगभग हर शहर में मिल जाती हैं। दिल्ली के सदर बाजार में इनकी उपलब्धता ज्यादा रहती है। ऐसे ही मिट्टी भी हर कहीं मिल जाती है, जिसमें पीओपी राजस्थान से, चिकनी मिट्टी हरियाणा और कोलकाता से और काली मिट्टी कोलकाता से आती है। मूर्तियों की सफाई और चमक आदि के लिए पेंट, तारकोल और धातुओं की पॉलिश की भी जरूरत पड़ती है।

मूर्तिकला का काम सीख रहे पंकज बताते हैं, "मैं पिछले दो वर्षों से यहां काम सीख रहा हूं, पहले मैं काम की तलाश में लखनऊ जाता था, लखनऊ हमारे यहां से 50 किलोमीटर दूर पड़ता है और रोज आने जाने में काफी दिक्कत होती थी, लेकिन जब से मूर्तिकला का काम हमारे गांव में शुरू हुआ तब से हमें रोजगार मिल गया और यहां काम भी करता हूं नई-नई चीजें सीखता भी हूं और अच्छे पैसे भी कमा लेता हूं।"


वहीं मूर्ति कला केंद्र में काम कर रहे संदीप पटेल ने बताया कि यह पूरा काम हमने अपने स्तर से शुरू किया है, मेरे छोटे भाई राम तीरथ पटेल ने मूर्तिकला से एफीनेट किया है, हम लोग मिलकर गांव में ही मूर्तिकला का काम कर रहे हैं हमने कई बेरोजगार युवाओं को भी रोजगार दिया है, हमने यह काम काफी छोटे स्तर से शुरू किया था. लेकिन आज देश के कई अलग-अलग राज्यों से हमारे पास आर्डर आते हैं, हम आर्मी के साथ-साथ सिविल का भी काम करते हैं।

"इस वर्ष हमने महाकुंभ मेले में भी काफी काम किया है, हम लोग ज्यादातर फाइबर, ग्लास, मेटल और कंक्रीट से मूर्तियां बनाने का काम करते हैं। हम लोगों का यहां गांव में काम करने का मुख्य उद्देश्य है कि यहां पर पढ़े-लिखे बेरोजगार घूम रहे युवाओं को हम ट्रेंड कर सकें, और उन्हें स्वावलंबी बना सकें जो अपने पैरों पर खड़े हो आज की स्थिति तो आप देख रहे हैं कि देश में बेरोजगारी किस तरह बढ़ रही हैं, ऐसे में हम स्वरोजगार चलाकर लोगों को प्रोत्साहित करने का काम भी करते हैं, "संदीप पटेल आगे बताते हैं।

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