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'अटल जी के गाँव में न जाने कितने लोग आये, सब बोलकर चले जाते हैं पर आज तक काम कुछ नहीं हुआ'

देश के तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी के बचपन के कई साल इस बटेश्वर गाँव में बीते हैं। सरकार की अनदेखी का शिकार ये गाँव अब विकास की तमाम योजनाओं का लाभ पाने की उम्मीद छोड़ चुका है।

Neetu SinghNeetu Singh   30 Jun 2020 5:30 AM GMT

बटेश्वर (आगरा)। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पैतृक गाँव बटेश्वर के विकास के लिए सरकार ने तमाम घोषणाएं की पर इस गाँव के लोग करोड़ों रुपए में बनी इन विकास योजनाओं की हकीकत से कोसों दूर हैं।

जमुना नदी से सटा ये गाँव आगरा जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म तो ग्वालियर में हुआ था लेकिन इनके बचपन के कई साल इस बटेश्वर गाँव में बीते हैं। सरकार की अनदेखी की वजह से इनका पैतृक घर अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।

ऊँचे टीले पर कांटेदार वृक्षों के बीच खंडहर पड़े इनके घर के दीवारों की अब गिनी-चुनी ईंटे ही बची हैं। कहने को तो इस गाँव में 100 शैय्या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी बना है पर ग्रामीणों का आरोप है कि इसमें डॉ कभी-कभार ही आते हैं, जरूरत की दवाईयां भी यहाँ नहीं मिलती। वहीं बीते एक साल से पशु अस्पताल खुला ही नहीं है। लगभग सौ छोटे बड़े मन्दिर वाले बटेश्वर गाँव को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए सरकार की ओर से कोई योजना नहीं है। मूलभूत जरूरत की पानी टंकी भी इस समय खराब पड़ी है।

विकास के इंतजार में बटेश्वर गाँव.

गाँव कनेक्शन की टीम अपनी विशेष सीरीज कोरोना फुटप्रिंट में जून के दूसरे सप्ताह में चंबल से सटे बीहड़ के दर्जनों गांवों की स्थिति समझने के लिए जब चौथे दिन बटेश्वर गाँव पहुंची तो यहाँ मिले मुकेश वाजपेयी (40 वर्ष) ने नाराजगी जताते हुए कहा, "अटल जी के गाँव में न जाने कितने लोग आये, सब विकास के लिए बोलकर चले जाते पर आजतक हुआ कुछ नहीं। अब तो कोई भी आता है हमलोगों को तो भरोसा ही नहीं होता है कि यहां कुछ होगा भी।"

जिस मोहल्ले में मुकेश रहते हैं वो वाजपेयी मोहल्ला के नाम से जाना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी के परिवार के कई सदस्य अभी भी यहाँ रहते हैं। मुकेश ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी रिश्ते में मेरे ताऊ जी लगते थे।

मुकेश ने गाँव की बदहाली के तमाम किस्से गिनाए। अपने घर के सामने बने पशु चिकित्सालय की तरफ इशारा करते हुए मुकेश बोले, "इस पशु अस्पताल का एक साल से ताला नहीं खुला है। सिर्फ नाम की कुछ चीजें गांव में बन गयी हैं पर इनके होने न होने से कोई फायदा नहीं। सरकारी अस्पताल भी बना है पर कभी जरूरत पर जरूरी दवा नहीं मिलती।"

इन्हीं कटीली झाड़ियों के बीच अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक घर खंडहर में तब्दील हो चुका है.

पूर्व प्रधानमंत्री व भारत रत्न से सम्मानित स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे, पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए 1998 से 1999 और आखिरी बार 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया। इस दौरान उन्होंने ये साबित किया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलता से चलाया जा सकता है।

दूसरी बार बने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में इन्होंने छह अप्रैल 1999 को बटेश्वर में रेलवे लाइन का शिलान्यास किया था। शिलान्यास के बाद व्यवस्था इतनी बदहाल रही कि रेलवे लाइन का काम की रफ्तार ही कम हो गयी। जिसका नतीजा यह हुआ कि यहाँ 18 साल बाद पैसेंजर ट्रेन शुरू हो सकी। बटेश्वर से करीब पांच किमी दूर बिजकौली में रेलवे स्टेशन बनना था, लेकिन वहां हॉल्ट बन सका। यहां से बटेश्वर के लोगों को पांच किलोमीटर दूर तक पैदल ही सफर करना पड़ता है। बिजकौली से बटेश्वर तक आवागमन का कोई साधन नहीं है।

एक मन्दिर के पास पेड़ की छाँव में बैठे छत्रपाल यादव ने इस रेलवे लाइन के बारे में कहा, "यहाँ से पांच किलोमीटर दूर रेलगाड़ी निकलती है वहां तक पहुंचने का कोई साधन नहीं। स्टेशन की छोड़िए गाँव में जो अस्पताल है वहां कुत्ता काटने का इंजेक्शन तक तो मिलता नहीं है। न कोई स्कूल न कॉलेज कुछ भी तो नहीं है गाँव में, तभी तो सब गाँव छोड़कर बाहर बसे जा रहे हैं।"

ये है वो वाजपेयी मोहल्ला जहां इनके परिवार के कई लोग रहते हैं.

देश की राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय चेहरों में से एक अटल बिहारी वाजपेयी ने 93 साल की उम्र में 16 अगस्त, 2018 को अंतिम साँसे ली। उनके निधन के बाद इस गाँव के लोगों की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गयी। इनके निधन के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आठ सितंबर 2018 को इनकी अस्थि विसर्जन के लिए बटेश्वर आए थे। इस दौरान उन्होंने यहां अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी यादों को सहेजने के साथ ही क्षेत्र के समूचे विकास की घोषणा की थी। पर दो साल बाद भी केवल वो घोषणाएं बनकर ही रह गईं।

आठ हजार आबादी वाले बटेश्वर पंचायत के ग्राम प्रधान लक्ष्मी नारायण यादव भी इस गाँव की बदहाली की कई और परते खोलते हैं, "गाँव में ऐसा कुछ विकास नहीं हुआ है जिसे गिनाया जाये। डॉ महीने में कभी-कभार ही आते हैं। मन्दिर से कुछ लोगों को रोजगार मिला है पर लॉकडाउन में सब बंद रहा। अभी तो सब बहुत मुश्किल में हैं।"

एक चारपाई पर बैठी सुलोचना (55 वर्ष) बोलीं, "अभी अस्पताल से ही लौटकर आ रही हूँ। बुखार की दवा खत्म हो गयी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि यहाँ दवा खत्म हुई हो। इसमें इतनी सुविधा नहीं है कि अगर किसी गर्भवती महिला की डिलीवरी करानी हो तो आसानी से हो जाये। लोग उसे या तो बाह कस्बे में 12-13 किलोमीटर दूर ले जाते हैं या फिर 80 किलोमीटर दूर आगरा।"

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