'रोड नहीं तो वोट नहीं': यूपी के इन गांवों तक अब तक नहीं पहुंची सड़क तो लोगों ने किया चुनाव का बहिष्कार

उत्तर प्रदेश में 300,000 किलोमीटर से अधिक का सड़क नेटवर्क है। लेकिन मिर्जापुर के मतवार ग्राम पंचायत के 13 गांवों के 40,000 से अधिक आदिवासी निवासियों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है, जिनके गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं है। वे शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, बाजारों और रोजगार के अवसरों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं। अब, उन्होंने आगामी विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने की धमकी दी है।

Brijendra DubeyBrijendra Dubey   18 Jan 2022 9:42 AM GMT

हलिया (मिर्जापुर), उत्तर प्रदेश। आठ जनवरी को राज्य की राजधानी लखनऊ से लगभग 290 किलोमीटर दूर मिर्जापुर में कलेक्टर कार्यालय, नारे से गूंज उठा: 'रोड नहीं तो वोट नहीं'। ग्रामीणों का एक समूह जिनमें से कई कोल आदिवासी समुदाय से थे, अपनी ग्राम पंचायत के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर जिला मुख्यालय पर इकट्ठा हुए थे।

विरोध करने वाले ग्रामीणों ने शिकायत की कि देश की आजादी के सत्तर साल से अधिक समय के बावजूद उनकी मतवार ग्राम पंचायत में 40,000 की आबादी वाले 13 गांवों में गाड़ी चलने लायक सड़क नहीं है। ग्रामीणों ने कहा कि हम लंबे समय से एक सही सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन सब बहरे हो गए हैं।

सड़क न होने के कारण जिन 13 बस्तियों का ब्‍लॉक से संपर्क में नहीं हैं, वे हैं- मझीगवां, नदना, हर्रा, कटाई, बरुआ, औरा, रामपुर नौडीहा, कुशियरा, बेलाही, परसिया कला, सगरा, मटिहरा, बडौही। आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण ये गांव जंगलों से घिरे हुए हैं और यह मतवार ग्राम पंचायत के रास्ते में हैं जहां पक्की सड़क की मांग की जा रही।

रोड नहीं तो वोट नहीं के नारों के साथ प्रदर्शन करते मतवार ग्राम पंचायत के ग्रामीण

"बड़ा लंबा समय हो गया है। हमने बहुत कुछ सहा है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों का भविष्य बेहतर हो, इस बार अगर हमें सड़क नहीं मिली तो यह पूरी ग्राम पंचायत मतदान नहीं करेगी, "नदना गांव के निवासी आगत सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया।

अब से लगभग एक महीने बाद 10 फरवरी से 7 मार्च के बीच, भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सात चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन मिर्जापुर के हलिया प्रखंड के मतवार ग्राम पंचायत में ग्रामीण नागरिकों ने चुनाव का बहिष्कार करने की घोषणा की है।

"लड़कियां पढ़ नहीं पातीं क्योंकि स्कूल जाने और घर वापस आने में बारह घंटे से अधिक समय लग जाता है। जो जाते हैं वे सुबह नौ बजे निकल जाते हैं और रात नौ बजे घर लौटते हैं। नदना गांव निवासी 26 वर्षीय अनिल सिंह बिसेन, जो विरोध करने कलेक्टर कार्यालय आए थे ने गांव कनेक्शन को बताया कि हमारे क्षेत्र में महिला सुरक्षा एक उचित सड़क की कमी के कारण एक बड़ा मुद्दा है।

स्थानीय लोगों की कठिनाइयों के बारे में बताते हुए बिसेन ने आगे कहा: "ऐसे कई उदाहरण हैं जब गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं ले जाया सका और रास्‍ते में ही प्रसव कराना पड़ा। सड़क इतनी उबड़-खाबड़ है क‍ि रास्‍ते में ही गर्भपात हो सकता है। क्या ग्रामीण लोगों की कोई गरिमा नहीं है?"

यह पहली बार नहीं है जब मतवार ग्राम पंचायत के निवासियों ने अपने क्षेत्र में सड़कों की कमी का मुद्दा उठाया है।

स्कूल जाने और घर वापस आने में बारह घंटे से अधिक समय लग जाता है।

स्थानीय विधायक राहुल प्रकाश कोल ने कहा, "मुझे याद है कि जब मैं पिछले विधानसभा चुनाव के प्रचार के लिए इलाके में गया था, तो ग्रामीणों ने मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताया था, जो सड़क के अभाव के बारे में था।" अपना दल पार्टी से - जो सत्तारूढ़ भाजपा की सहयोगी है - ने गांव कनेक्शन को बताया।

"केंद्र सरकार से सड़क मंजूरी प्राप्त करने की प्रक्रिया चल रही है। हमने वन भूमि में सड़क निर्माण का प्रस्ताव भेजा है और जैसे ही केंद्र इसे मंजूरी देगा, सड़क निर्माण शुरू हो जाएगा, " विधायक ने आश्वासन दिया।

हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें चुनाव पूर्व किए गए इन वादों पर बहुत कम भरोसा है। "मैं पांच साल का रहा होगा जब इस देश को आज़ादी मिली। तब से मुझे एक पक्की सड़क का सुख नहीं मिला है, "मतवार ग्राम पंचायत के हर्रा बस्ती के नान्हू कोल ने गांव कनेक्शन को बताया।

नान्हू को अपनी सही उम्र का पता नहीं है, लेकिन वह स्पष्ट रूप से याद करते हैं कि 15 अगस्त, 1947 की सुबह अपने दोस्तों के साथ अपने गाँव में अंग्रेजी हुकुमत से स्वतंत्रता का जश्न मनाते हुए दौड़ रहा था। "हमने काफी सहा है। अब बहुत हो गया। इस बार हम आने वाले चुनावों में वोट नहीं देंगे अगर हमें सड़क नहीं मिली, "आद‍िवासी नान्हू कोल ने नाराज होकर कहा।

जब देश को आजादी मिली तो नान्हू 5 साल के रहे होंगे, इतने साल गुजर जाने के बाद भी उनके गाँव तक पक्की सड़क नहीं पहुंच पायी।

समाजवादी पार्टी के जिला स्तर के पदाधिकारी अभय यादव ने बताया कि ऐसे और भी कई गाँव हैं जहां गाँव में सड़कों की कमी एक बड़ी चिंता का विषय है। "हलिया जैसे कई ऐसे इलाके हैं जहां इस देश को आजादी मिलने के बाद से सड़कें नहीं बनी हैं। जो सड़कें बनी हैं वे खराब हो चुकी हैं जो जिले के आर्थिक विकास में बाधा डालती हैं, " यादव ने गांव कनेक्शन को बताया।

नौकरशाही की देरी में फंसी बेहतर भविष्य की राह

स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच की बात हो या बच्चों की शिक्षा की, बाजारों और प्रशासनिक केंद्रों तक आसान पहुंच से लेकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक - मिर्जापुर में मतवार ग्राम पंचायत के इन 40,000 ग्रामीणों की सभी आशाएं और आकांक्षाएं 25 किमी लंबी मोटर योग्य सड़क के निर्माण पर टिकी हुई हैं।

हलिया ब्‍लॉक मुख्‍यालय जहां स्कूल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी कार्यालय है, उसकी दूरी लगभग 12 किलोमीटर है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) 2.5 किमी दूर है।

मिर्जापुर के जिला मजिस्ट्रेट प्रवीण कुमार लक्षकर के अनुसार जिस जमीन पर सड़क बननी है वह वन विभाग के नियंत्रण में आती है और इसी वजह से सड़क निर्माण में देरी हो रही है।

"मुझे पता है कि लोग हलिया में सड़कों के अभाव का विरोध कर रहे हैं। इन लोगों को सूचित किया गया है कि वन विभाग और केंद्र सरकार की मंजूरी के अभाव में हम सड़क निर्माण शुरू नहीं कर पा रहे हैं।"

जब गांव कनेक्शन ने कैमूर वन्यजीव अभयारण्य के जिला वन अधिकारी से संपर्क किया, जिसके माध्यम से सड़क गुजरने वाली है, तो उन्होंने बताया कि लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने अभी तक वन विभाग से कोई अनुमति नहीं मांगी है।

"पीडब्ल्यूडी को सड़क बनाने के लिए वन विभाग से अनुमति लेनी होगी। मुझे पता है कि पीडब्ल्यूडी द्वारा एक प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, लेकिन यह अब तक हम तक नहीं पहुंचा है, "आशुतोष जायसवाल, जिला वन अधिकारी, कैमूर वन्यजीव अभयारण्य ने गांव कनेक्शन को स्पष्ट किया।

जहां नौकरशाही की देरी में सड़क फंसी हुई है, वहीं स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। "ब्लॉक मुख्यालय तक इन पच्चीस किलोमीटर की दूरी तय करने में मोटरसाइकिल पर साढ़े तीन घंटे लगते हैं। आप हमारे कष्टों की कल्पना कर सकते हैं, "नान्हू कोल ने कहा।

सड़क निर्माण में हो रही अंतहीन देरी से विशेष रूप से मतवार ग्राम पंचायत की महिलाएं नाराज हैं। "कई महिलाओं की अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। कल्पना कीजिए कि प्रसव पीड़ा हो और ऊबड़-खाबड़ सड़क पर चार घंटे सफर कराना हो।" कुशियारा गाँव की 35 वर्षीय भगवंती देवी ने नाराजगी जताते हुए कहा। "सब नेता लोग लुटेरे हैं, सब पैसा खा लेते हैं। जब तक रोड नहीं बनेगा हम वोट नहीं देंगे, "उन्‍होंने कहा।

सड़क नेटवर्क में सुधार

उत्तर प्रदेश सरकार के पास कोर रोड नेटवर्क (सीआरएन) में सुधार के लिए एक लंबा कार्यक्रम है और इस कार्यक्रम के हिस्से के रूप में राज्य सरकार को विश्व बैंक से पैया मिल रहा है। इस फंड का उपयोग पूरे लोक निर्माण विभाग में सुरक्षा इंजीनियरिंग प्रबंधन प्रणालियों और प्रथाओं में सुधार के लिए किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश पीडब्ल्यूडी की वेबसाइट के अनुसार राज्य के अंदर पूरे 7,550 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग इस सीआरएन परियोजना में शामिल नहीं हैं। कुल मिलाकर राज्य में लगभग 300,000 किलोमीटर का सड़क नेटवर्क है, जिसमें से 173,000 किलोमीटर पीडब्ल्यूडी के अधीन है।


पीडब्ल्यूडी के अंतर्गत आने वाली सड़कों में 7,550 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग, 7,530 किमी राज्य राजमार्ग, 7,544 किमी प्रमुख जिला सड़कें, 39,245 किमी अन्य जिला सड़कें और 118,166 किमी ग्रामीण सड़कें शामिल हैं।

केवल 60 फीसदी स्टेट हाईवे डबल लेन हैं। पूरे राज्य में 62 प्रतिशत प्रमुख जिला सड़कों और 83 प्रतिशत अन्य जिला सड़कों की चौड़ाई सात मीटर से कम है।

भारत में सड़क दुर्घटनाएं 2019 शीर्षक से एक रिपोर्ट में, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने कहा कि शहरी केंद्रों की तुलना में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाएं अधिक आम और घातक पाई जाती हैं।


"सड़क दुर्घटनाएं और दुर्घटना से संबंधित हत्याएं दोनों शहरी घटना की तुलना में एक ग्रामीण भारत में ज्‍यादा होती है। इस प्रकार 2019 में, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मारे गए लोगों की संख्या का हिस्सा 32.9 प्रतिशत और 67.1 प्रतिशत था, "मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है क‍ि उत्तर प्रदेश में 22,655 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई जो देश में सबसे ज्‍यादा है।

'सड़क परियोजना अधूरी, फिर भी उद्घाटन'

पिछले महीने 21 दिसंबर को केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने मिर्जापुर में राष्ट्रीय राजमार्ग 7 (NH-7) के तीन हिस्सों का उद्घाटन किया, जो 146 किलोमीटर की लंबाई को कवर करता है।

"हम उत्तर प्रदेश के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। ये सड़क परियोजनाएं राज्य के विकास को बढ़ावा देंगी और क्षेत्र में बेहतर संपर्क प्रदान करेंगी, "केंद्रीय मंत्री ने उद्घाटन समारोह के दौरान कहा।

लेकिन हाईवे के तीन में से एक हिस्सा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वाराणसी जिले के रामनगर को मिर्जापुर के डगमगपुर से जोड़ने वाले राजमार्ग के 35 किलोमीटर लंबे हिस्से का निर्माण होना बाकी है।


'अधूरे' प्रोजेक्ट के उद्घाटन से स्थानीय ग्रामीण परेशान हैं। "सड़क अभी पूरी नहीं हुई है। मुझे नहीं पता कि इसका उद्घाटन क्यों किया गया, "भइसोड़ बलाय पहाड़ गांव की निवासी कमला देवी ने गांव कनेक्शन को बताया। पानी की आपूर्ति के लिए उनकी उम्मीद सड़क पर टिकी हुई है। "मेरे पूरे गांव में पानी की नियमित आपूर्ति नहीं है और हम अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं। मुझे उम्मीद है कि यह सड़क बनने से हमें बराबर पानी मिलेगा।"

"भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में देरी के कारण डगमगपुर और रामनगर के बीच की सड़क अभी तक पूरी नहीं हुई है। परियोजना इस साल जून तक पूरी हो जाएगी, "निजी रियल एस्टेट कंपनी दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड के वरिष्ठ समन्वय प्रबंधक संजीव कुमार सिंह, जिन्हें परियोजना को पूरा करने के लिए टेंडर दिया गया है, ने गांव कनेक्शन को बताया।

'यूपी की सड़कें चुनावी मुद्दा'

विपक्षी दल अधूरे और खराब सड़कों को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। समाजवादी पार्टी के नेता और प्रवक्ता आनंद भदौरिया ने उत्तर प्रदेश में हाल ही में 30.37 अरब रुपये की लागत वाली 30.37 अरब रुपये की चार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के बारे में बात करते हुए कहा कि परियोजना का उद्घाटन बिना पूरा किए भाजपा की हताशा और आगामी चुनावों के लिए असुरक्षा को दर्शाता है।

"इस राजमार्ग परियोजना का उद्घाटन केवल विकास की नकली प्रदर्शनी बनाने के लिए किया गया है। परियोजना बिल्कुल भी पूरी नहीं है। अधूरी परियोजनाओं का यह जल्दबाजी में उद्घाटन मतदाताओं को किसी तरह आकर्षित करने का एक हताश प्रयास है, "समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा।

सड़क संपर्क और सड़क नेटवर्क की गुणवत्ता का मुद्दा केवल मिर्जापुर तक सीमित नहीं है।


बाराबंकी जिले के सूरतगंज कस्बे में दसवीं कक्षा के छात्र गोकरण शुक्ल ने गांव कनेक्शन को बताया कि उनके स्कूल की ओर जाने वाली सड़क की हालत बहुत खराब है और अक्सर उन्हें देर से आने के कारण शिक्षकों को फटकार लगती है।

"मेरा पेट अक्सर दर्द करता है क्योंकि मुझे इस खराब सड़क पर अपनी साइकिल चलानी पड़ती है। अगर मैं साईकिल धीरे चलाता हूं, तो मुझे स्कूल के लिए देर हो जाती है और मुझे सजा मिलती है। अगर मैं इस खराब सड़क पर तेजी से साइकिल चलाता हूं, तो मेरा पेट दर्द करता है और मुझे क्लास में पढ़ने में मुश्किल होती है। मेरी इच्छा है कि मेरी बिना किसी गलती के मुझे भुगतना न पड़े," छात्र ने कहा।

बाराबंकी से 220 किलोमीटर से अधिक दूर, शाहजहांपुर जिले के तिलहर के खांडसर गांव में, ग्रामीणों ने खराब सड़कों या गायब सड़कों की शिकायत की।

"मेरे क्षेत्र की सभी सड़कें टूटी हुई हैं। जब सड़क टूट जाती है तो सरकार गड्ढों वाले हिस्सों पर डामर के पैच लगा देती है, लेकिन सड़क के पूरे हिस्से की मरम्मत नहीं करती है। मरम्मत के ये पैच लंबे समय तक नहीं टिकते हैं, "खंडसर गांव के धर्मेंद्र सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया।

हालांकि, किसान ने आगे कहा कि "पिछली सरकारों के दौरान सड़कों की स्थिति और भी खराब थी। भाजपा सरकार ने कुछ मरम्मत की है, इससे यहां कोई इनकार नहीं कर सकता।

प्रत्यक्ष श्रीवास्तव ने शाहजहांपुर से रामजी मिश्रा और बाराबंकी से वीरेंद्र सिंह के इनपुट्स के साथ यह खबर लिखी है।

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