इशरत जहां की कहानी मौसम की मार से पीड़ित हर एक किसान के दर्द की कहानी है

उनका धान पक चुका था और किसानों ने उसकी कटाई के बाद उसे अपने खेतों में बड़े करीने से व्यवस्थित बंडलों में रख दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि सूरज की रोशनी उनकी फसल में बची थोड़ी नमी को खत्म कर देगी। लेकिन पिछले तीन दिनों में हुई भारी बारिश ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है और वे कर्ज में दब गए हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट

Ramji MishraRamji Mishra   21 Oct 2021 11:36 AM GMT

मनकरा (रामपुर), उत्तर प्रदेश। भारी बारिश के कारण हुई तबाही पर गुस्से से घूरते हुए 45 वर्षीय इशरत जहां ने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बटाई पर खेत लिया था। पिछले तीन दिनों से उत्तर प्रदेश में हो रही भारी बारिश के कारण धान के खेत कीचड़ वाले पानी से भर गये हैं और धान की फसल खेतों में बिछ गई है, फसलें लगभग चौपट हो गई हैं।

"किसान क्या कर ले... हैं?" दिल रो रेया हैगा...पचास हजार रुपए लगे हैं खेत में, सब दरिया हो गया। तीन रातें हो गई, आंखें पत्थर हो गई, नींद न आई है... टेंशन के मारे... क्या करा जाए? पूरा घर रो रहा। चटनी से रोटी खा के पैसे खेत में लगे, इतनी मेहनतसे धन पाले... न भूख लग रही है, न प्यास लग रही है, " उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया।

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के मनकारा गाँव की रहने वाली राज्य की राजधानी लखनऊ से लगभग 325 किलोमीटर दूर, इशरत जहाँ ने जिस जमीन में धान लगाया था (लगभग आधा हेक्टेयर) वह उनकी नहीं है। उन्होंने जमींदार को कुछ पैसे देकर बच्चों का पेट पालने के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा लिया था। लेकिन पूरी फसल बह गई है।

इशरत जहां नुकसान के बारे में बताती हुई। सभी फोटो: रामजी मिश्रा

ये दुख बस 45 वर्षीय इशरत का ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सैकड़ों हजारों किसानों के खेत बारिश के पानी से भर गए हैं, कई जगहों पर घुटने तक कीचड़ भरा पानी है, जिससे राज्य में धान, गन्ना, केला और सब्जी की खेती को काफी नुकसान हुआ है। किसान एक बार फिर भारी नुकसान की ओर बढ़ रहे हैं।

इशरत ने बटाई प्रणाली के तहत किराए पर जमीन लिया, जिसमें उपज का एक जमीन का मालिक लेता है, साथ ही उसने जमीन पर खेती करने के लिए एक लाख रुपए का कर्ज भी लिया था।

इशरत कोशिश में है कि अब भी किसी तरह धान को बचा सकें।

"मेरी शादी योग्य उम्र की बेटियां हैं। मैंने अपनी बेटियों की शादी का खर्च उठाने के लिए फसल काटने और बेचने की योजना बनाई थी, " सात बच्चों की मां ने गांव कनेक्शन को बताया।

इशरत के अलावा उसके पति बाबू और बेटियों सहित उसके परिवार के अन्य सदस्य भी पानी में डूबे हुए खेत से धान के भीगे हुए पुआल को उठाने में लगे हुए थे, कुछ अनाज को पानी में से निकाल रहे थे जिन्हें बाद में सुखाया जा सकता था।

'धान की खेती सबसे कठिन फसल'

इस बीच इशरत जहां के गांव का 24 वर्षीय युवक इमरान दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करता है। जैसा कि फसल के मौसम में होता है, उनके जैसे प्रवासी मजदूरों की भीड़ खेती के काम हाथ बंटाने के लिए गांव लौट आती है।

इमरान

लेकिन अपने गांव वापस आना इस सीजन में इमरान के लिए बेकार साबित हुआ है।

"मैं धान की खेती में अपने परिवार की मदद करने के लिए यहाँ वापस आया था। हमने धान काटा था उपज को धूप में सुखाने के लिए खेत में ही छोड़ दिया था, लेकिन भारी बारिश ने यह सब खराब कर दिया, " इमरान ने कहा।

कुछ देर रुकने के बाद युवाओं ने धान की फसल के लिए अत्यधिक कठिन परिश्रम के बारे में बात की।


"धान की खेती सबसे कठिन फसलों में से एक है। यह गेहूं की तुलना में बहुत कठिन है। यह सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं है जो किया जा रहा है। हमारे पूरे परिवार ने धान लगाने के लिए अथक मेहनत की। यह सब कुछ नहीं के बराबर है। किसान होना बेहद चुनौतीपूर्ण है, " उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया।

किसान से मजदूर तक

इशरत जहां के परिवार के लिए फसल का ये नुकसान उनके पेशे को ही बदल देगा।

"अब हम सभी दिहाड़ी मजदूरों के रूप में काम करेंगे और किसी भी नौकरी को खोजने की कोशिश करेंगे जो हमें एक दिन के के काम के बदले पैसा देगा। 24 साल के इमरान ने कहा, अब साल भर जीवित रहने के लिए यह हमारी सबसे अच्छी शर्त है। "हम जैसे किसान हमारे द्वारा उगाई जाने वाली फसलों में बहुत अधिक खर्च करते हैं। फसल की विफलता का अर्थ है कई मोर्चों पर विफल होना और वह भी बिना किसी हमारी गलती के, "उन्होंने कहा।


उत्तर प्रदेश के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी भारी बारिश विनाशकारी साबित हुई है। उत्तराखंड और केरल सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं क्योंकि हाल ही में भारी बारिश और भूस्खलन के कारण दोनों राज्यों में कम से कम 60 लोगों की मौत हुई है।

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