आजादी के 72 साल बाद भी बिहार के इस गांव को बुनियादी सुविधाओं का इंतजार

Ankit Kumar Singh

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Ankit Kumar Singh   

22 April 2019 10:00 AM GMT

कैमूर (बिहार)। देश में चुनावी माहौल हमें कई रूप में देखने को मिलता है। चाहे वह विधानसभा चुनाव हो, लोकसभा चुनाव हो या पंचायत स्तर के चुनाव हों। हर बार मुख्य रूप से बिजली, शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मुहैया कराने की बात की जाती है। लेकिन गांव कनेक्शन की टीम ने जब बिहार के कैमूर जिले के एक गांव का दौरा किया तो वहां देखा कि आजादी के 72 सालों बाद भी यह गांव मूलभूत सुविधाओं को तरस रहा है।

इस गांव का नाम है हसनपुरा जो रातन पर्वत श्रृंखला विंध्य की एक कड़ी कैमूर पर्वत के गोद में है। यह गांव रामपुर प्रखंड के अंतर्गत अमांव पंचायत के अधीन आता है।

भभुआ जिला से लगभग 40 किलोमीटर दूर बसा यह गांव। हमारी भी यात्रा जब इस गांव की तरफ शुरू हुई तो साधन हमारे पास बाइक थी। तापमान लगभग 40 डिग्री के पार और इस गर्मी। सड़कों के समानांतर कैमूर की पहाड़ी अपने इतिहास को बता रही थी। जो गवाह थी अपने गोद में बसे गांव की और कैमूर जिले के विकास की।

लगभग एक घंटे के यात्रा के बाद हम लोगों से पूछते हुए आखिर हसनपुरा गांव पहुंचे जहां गांव की मुख्य सड़क मिट्टी की है। जिसे देखकर उसकी बदहाली का पता लगाया जा सकता है। मन में सवाल भी था कि क्या यही वह गांव है जिसकी स्टोरी हम करने आए हैं। वजह यह थी कि गांव के नाम से कोई बोर्ड नहीं दिखा। लोगों से पूछने पर तसल्ली मिली कि नहीं यही हसनपुरा गांव ही है।

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गांव के लोगों ने बताया कि यहां न तो आंगनबाड़ी केंद्र है और ना ही सड़क। ना कोई स्कूल है ना ही उप स्वास्थ्य केंद्र, ना ही पंचायत भवन। मोटे तौर पर कहा जाए तो आजादी के सात दशक बाद भी कोई सरकारी भवन नहीं है। पिछले 2 से 3 महीने पहले गांव में सरकार का बिजली का पोल आया यानि गांव में बिजली आई है। हमारी मुलाकात 70 वर्षीय राजवंश यादव से हुई जो नेत्रहीन हैं। वे कहते हैं "अगर हमारे गांव या नजदीक में स्वास्थ्य केंद्र रहता तो आज मैं अंधा नहीं होता।"

इसी क्रम में गांव की मीरा देवी के घर पहुंचे तो अपने घर की जमीन और चूल्हे को गोबर से पोत रही थीं। उनकी बेटी दिव्या दृष्टि भी इसी काम में लगी हुई थी। जब इन से हमारी बात हुई तो मीरा देवी कहती हैं "गर्भवती महिलाओं को बरसात के समय हॉस्पिटल चारपाई पर ले जाना पड़ता है क्योंकि गांव में गाड़ी नहीं आ पाती।"

वे आगे कहती हैं कि हमारे घर की बेटियों की शादी भी करने में परेशानी हो रही है क्योंकि आठवीं के बाद आगे का स्कूल बहुत दूर हैं। साथ ही दिव्य दृष्टि कहती हैं कि पढ़ना तो है मगर क्या करें, आठवीं के बाद आगे का स्कूल बहुत दूर है। जहां जाना संभव नहीं हम आठवीं तक का स्कूल अपने गांव में नहीं बल्कि 3 किलोमीटर दूर अमांव से किया है। वहीं बरसात के समय मैं तो स्कूल जाती ही नहीं है क्योंकि रास्ता नहीं रहता है पानी और कीचड़ से भरा रहता है।

गांव के लोग कहते हैं कि हमें वोट देने के लिए तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। 500 से ज्यादा आबादी वाला या गांव जहां लगभग 300 मतदाता हैं। सासाराम संसदीय क्षेत्र में आता है तो सुरक्षित सीट है। हम आपको बताते चलें कि सासाराम संसदीय क्षेत्र में कैमूर जिला के 4 विधानसभा सीट मोहनिया भगवा चैनपुर रामगढ़ है जिसमें रामगढ़ विधानसभा बक्सर संसदीय क्षेत्र में तो वहीं मोहनिया, भाभुआ, विधानसभा, सासाराम संसदीय क्षेत्र में आता है जिस के वर्तमान सांसद छेदी पासवान हैं जो भाजपा से हैं।

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वहीं इससे पहले प्रथम महिला लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार यहां के सांसद रह चुकी हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग 1402789 वोटर हैं। पूरे सासाराम संसदीय क्षेत्र में जिसमें पुरुष मतदाता 750643 तो 652146 महिला मतदाता हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत सभी पंचायतों को गांव से जोड़ने का प्लान तो सरकार ने बनाया मगर सरकार की योजना इस गांव तक नहीं पहुंच पा रही। ग्रामीण कहते हैं कि छोटा गांव होने से नेता या प्रशासन हमारे दुख को नहीं सुन रहे। आजादी के पहले अंग्रेजों के गुलाम थे और अब शासन प्रशासन के हैं। वहीं ग्रामीण इस बार नोटा पर वोट करने का इरादा बना रहे हैं।

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