छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का गढ़ है 'गढ़ कलेवा'

रायपुर(छत्तीसगढ़)। अगर आप खाने के शौकीन है तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगी। यहां छत्तीसगढ़ के सारे परंपरागत व्यंजन मिल जाएंगे।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महंत घासीराम स्मारक संग्रहालय में बनाए गए गढ़ कलेवा को गाँव का माहौल दिया गया है। यहां का संचालन स्वयं सहायता समूह की महिलाएं करती हैं।

गढ़ कलेवा की संचालिका सरिता शर्मा बताती हैं, "आप अगर गढ़ कलेवा के बारे में जानना चाहेंगे तो ये एक छत्तीसगढ़ी ठीहा है, जहां सिर्फ छत्तीसगढ़ी व्यंजन ही मिलते हैं और वो भी पारंपरिक। आज हम जहां भी जाते हैं हर जगह के पकवानों की अपनी अलग अलग पहचान हैं, वैसे ही हमारे छत्तीसगढ़ के भी बहुत सारे व्यंजन हैं, यहां हर एक त्योहार में अलग पकवान बनते हैं।"



साल 2016 में स्थापित गढ़ कलेवा की अपनी खासियत है। गढ़कलेवा रोज सुबह 11:00 बजे से खुल जाता है, और रात को 8:00-9:00 बजे तक यहां लोग आते रहते हैं। गढ़कलेवा का संचालन मोनिशा महिला स्वयं सहायता समूह संस्था द्वारा किया जा रहा है और यहां काम करने वाले अधिकतर लोग या कर्मचारी महिलाएं हैं। गढ़कलेवा में सामान्य दिनों में मिलने वाले खानपान की सामग्रियों के अतिरिक्त गर्मी के मौसम में बेल का शरबत, नींबू का शरबत, छाछ, लस्सी, आम पना, सत्तू जैसे शीतल पेय पदार्थ भी मिलते हैं।

गढ़ कलेवा को इस तरह बनाया गया है कि बिल्कुल गांव जैसा लगे। सरिता शर्मा आगे कहती हैं, "इस जगह में गाँव के जैसे माहौल दिया गया है। यहां आज भी फूल-कांसे की थाली में खाना दिया जाता है और फूल-कांस के लोटा और गिलास में पानी दिया जाता है। यहां जो भी मिलता है वो और कहीं नहीं मिलेगा, होटलों में आपको पनीर, डोसा, इडली सब खाने को मिलेगा लेकिन थाली में दाल चावल रोटी, सब्जी कढ़ी भाजी जैसी सब्जियां मिलती हैं।"

युवा वर्ग के बीच इस परिसर का विशेष आकर्षण है, जहाँ पर वे आउटिंग के साथ छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के आस्वादन के लिए अक्सर और काफी तादाद में आते हैं। गढ़कलेवा के माध्यम से छत्तीसगढ़ी खानपान की एक नई लोकप्रियता ने राह बनाई है।


पिछले कई साल से गढ़ कलेवा आ रहे साजिद बताते हैं, "मैं भी जब तीन-चार साल पहले यहां आया था, तब मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि यहां पर गाँव की फीलिंग आयी और चीज एवलेवल मिला हमें। जैसे छत्तीसगढ़ी डिश, छत्तीसगढ़ी व्यंजन

और भी कई सारी चीजे जैसे यहां का रहन सहन खान पान बहुत अच्छा लगा। मुझे और यहां की जो हरियाली है और कई प्रकार के लोग आते हैं टूरिस्ट लोग भी यहां आते हैं।"

यहां मिलेंगे ये व्यंजन

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, तभी तो गढ़ कलेवा के ज्यादातर व्यंजन चावल से ही बनते हैं। खाजा, बीड़िया, पिडीया, देहरौरी, पपची, ठेठरी, खुर्मी सदृश्य दर्जनों तरह के सूखे नाश्ते की वस्तुओं तथा मिठाइयाँ और ननकी या अदौरी बरी, रखिया बरी, कोंहड़ा बरी, मुरई बरी, उड़द दाल, मूंग दाल और साबूदाना के पापड़, मसाला युक्त मिर्ची, बिजौरी, लाइ बरी और कई तरह के अचार सम्मिलित हैं।



स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को भी मिला काम

गढ़ कलेवा में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं ही हैं। सरिता बताती हैं, "मोनिशा महिला स्वयं सहायता समूह में हम लोग तीन सौ महिलाएं हैं, जिसमें हमारे लिए कोई मालिक और कोई नौकर नहीं है ये हमारा सेल्फ ग्रुप है जिससे हम लोगों को ये रहता है कि हम लोग स्वावलंबी बनें। यहां पर पूरी ग्रामीण महिला काम करती हैं जो कभी सीखी पढ़ी नहीं हैं अपने घरों से निकलकर अचानक बाहर आकर उन्हें ये कदम उठाना पड़ता है कि घर की कम आमदनी की वजह से वो बाहर निकलती हैं।"

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