न डॉक्टर हैं न दवाएं, प्रसव के लिए महिलाओं को जाना पड़ता है 100 किमी. दूर

राकेश पंत, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल)। "नाम के लिए तो ये तीस बेड का अस्पताल है, तीस बेड के अस्पताल होने के बावजूद न यहां पर एक्स-रे मशीनें अच्छी हैं, न ही कोई और सुविधा, एक प्रसव के लिए भी हमें 100 किमी. दूर तक जाना पड़ता है, "कमला देवी कहती हैं।

कमला देवी पौढ़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा ब्लॉक की रहने वाली हैं, जहां पर 16 जून 1906 को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के नाम 30 बेड का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जनता को समर्पित कर तो दिया मगर लगभग 13 साल बीत जाने के बाद भी डॉक्टर और अन्य स्टाफ की कमी के कारण आज यह समुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अपनी बदहाली का रोना रो रहा है। मानकों के हिसाब से जिस स्वास्थ्य केंद्र में 6 विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए थे वह मात्र एक विशेषज्ञ डॉक्टर के सहारे चल रहा है।


स्थानीय निवासी सुरेंद्र पटवाल कहते हैं, "एक डॉक्टर हैं यहां पर, जो यहां के प्रभारी हैं वो ज्यादातर मीटिंगों में व्यस्त रहते हैं, बाकी दो डॉक्टर संविदा पर हैं उनके भी आने जाने का टाइम नहीं है।"

कमला देवी आगे बताती हैं, "प्रसव के लिए भी हमें 100 किमी. दूर जाना पड़ता है, या तो कोटद्वार रेफर कर देते हैं या फिर रामनगर हल्द्वानी रेफर कर देते हैं।"

लाखों की लागत से एक्स रे मशीन तो लगा दी गई मगर टेक्नीशियन ना होने के कारण एक्स-रे मशीन धूल फांक रही है बंद पड़े एक्स-रे रूम के ताले पर भी जंग लगने लगा है गायनोलॉजिस्ट ना होने के कारण प्रसव के लिए महिलाओं को सौ सौ किलोमीटर दूर कोटद्वार रामनगर के मैदानी क्षेत्रों की तरफ ले जाना पड़ता है इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं पहाड़ी क्षेत्रों के दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है।


यही हाल उत्तराखंड के ज्यादातर जिलों का है। चंपावत जिले के पान सिंह (60 वर्ष) कहते हैं, "हमारे यहां सरकारी अस्पताल हैं लेकिन वहां दवा नहीं मिलती। डॉक्टर भी नदारद रहते हैं। गंभीर रूप से बीमार होने पर हम लोग यहां से 128 किलोमीटर हल्द्वानी लेकर जाते हैं। सरकारी अस्पतालों का बहुत बुरा हाल है।"

स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं के मोर्चे पर उत्तराखंड एक नयी तुलनात्मक रिपोर्ट में पहले से अधिक फिसड्डी साबित हुआ है। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल निराशाजनक है। उत्तराखंड में हुए गाँव कनेक्शन के एक सर्वे के अनुसार 44.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि बीमार होने पर जब वे सीएचसी और पीएचसी पहुंचते हैं तब वहां कभी कभार ही डॉक्टर मिलते हैं। 23 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अस्पताल में डॉक्टर रहते हैं लेकिन दवाइयां नहीं मिलती हैं। सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण सामान्य बीमारी तक के लिए लोग व्यक्ति प्राइवेट अस्पताल जाने के लिए मजबूर हैं।

वहीं जब वहां बैठे मेडिकल इंचार्ज डॉ. शादब अहमद बताते हैं, "इस हॉस्पिटल में रोज 30 से 40 मरीज आते हैं जहां तक एक्स-रे मशीन बंद होने की बात है तो यहां टेक्नीशियन नहीं है प्रशासन को इस बारे में अवगत करा दिया गया है।"

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