बस्तर में आज भी जिंदा है कई सौ वर्ष पुरानी ढोकरा शिल्प कला

Divendra SinghDivendra Singh   11 March 2019 6:22 AM GMT

कोंडागाँव (छत्तीसगढ़)। अगर आपने इतिहास में मोहनजोदड़ो के बारे में पढ़ा होगा तो आपको शायद वहां पर खुदाई में मिली डांसिंग गर्ल की कांस्य प्रतिमा भी याद होगी। कहा जाता है कि वो प्रतिमा ढोकरा शिल्प की थी। बस्तर में आज भी उस कला को जिंदा रखने की कोशिशें जारी हैं। भारत के अलावा विदेशों में भी इस कला की काफी मांग है।

साल 2012 में छत्तीसगढ़ के बस्तर से अलग हुए कोंडागाँव के भेलवापारा मोहल्ले में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो ढोकरा शिल्पकला से मूर्तियों में जान डाल देते हैं। इन शिल्पकारों की बदौलत ढोकरा शिल्प की पहचान देश-विदेश तक हो गई है।


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 215 किलोमीटर दूर कोंडागाँव जिले के भेलवापारा मोहल्ले में जैसे-जैसे अंदर जाएंगे हर घर में मूर्तियां ढालते, मोम और मिट्टी चढाते लोग मिल जाएंगे। सबके काम बंटे होते हैं, कोई मिट्टी बनाता है, तो सांचा तो कोई मोम से डिजाइन बनाता है। कई परिवार मिलकर मूर्तियां ढालने का काम करते हैं।

ढोकरा शिल्प की मूर्तियां जितनी खूबसूरत होती हैं, उतनी ही मेहनत इन्हें बनाने में लगती है। शिल्पकार तरूण नाग बताते हैं, "ढोकरा आर्ट को बनाने का काफी लंबा प्रोसेस होता है, कम से कम 12-14 प्रोसेस (प्रक्रिया) से गुजरना पड़ता है, भेलवापारा में सौ अधिक ऐसे परिवार हैं जो मूर्ति बनाने का ही काम करते हैं। यहां की मूर्तियां दूर-दूर से लेने लोग आते हैं।"

ढोकरा शिल्पकला में आदिवासी संस्कृति पर आधारित मूर्तियां बनती हैं। इनमें भी दो तरह की मूर्तियां बनती हैं, पहली देवी-देवताओं की, जिसमें पहला देवी-देवताओं के शिल्प जिनमें, घोड़े पर सवार देवियां हैं, या जो हाथों में खड्ग, ढाल, अन्न की बालियां व मयूर पंख धारण किए हुए हैं… जैसे तेलगिन माता मूर्ति, कंकालिन माता। और दूसरी पशु आकृतियां जिनमें हाथी, घोड़े की आकृति प्रमुख हैं। इनके अलावा शेर मछली कछुआ मोर भी बनाए जाते हैं।


भेलवापारा की मती और उनका परिवार भी मूर्तियां बनाने का काम करता है। एक मूर्ति को आखिरी रूप देती मती बताती हैं, "हमारे हर दिन दस से ज्यादा लोग मूर्तियां बनाने का काम करते हैं, दूर-दूर से व्यापारी आते हैं वो जितना आर्डर देते हैं उसी हिसाब से हम मूर्तियां बनाते हैं। कई बार तो एक साथ बहुत ज्यादा मूर्तियां बनाने का आर्डर आ जाता है्, कभी कम आता है।"

वो आगे कहती हैं, "वैसे तो साल भर काम चलता है, लेकिन बारिश में परेशानी होती है, बारिश में मूर्तियों को सुखाने में दिक्कत आती है।" यहां ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जहां कई पीढ़ियों से ढोकरा की मूर्तियां बनाने का काम चल रहा है, लोग अपने घरों में सीखते हैं। समय के साथ बदलाव होते आ रहे हैं।


कई घंटों की मेहनत से तैयार होती है मूर्तियां

एक मूर्ति बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। हर एक चरण में मिट्टी का प्रयोग होता है। शिल्पकार तरुन नाग बताते हैं, "सबसे पहले हम मिट्टी का एक ढांचा तैयार करते हैं, जिसमें काली मिट्टी को भूसे के साथ मिलाकर पहले उसका बेस बनता है। काली मिट्टी जब सूख जाती है तो उसके बाद लाल मिट्टी से उसपर लेपाई की जाती है, जिससे वो फटे नहीं। लाल मिट्टी से लेपाई करने के बाद मोम का उस पर लेप लगाते हैं। जब वो मोम सूख जाता है तो अगले प्रोसेस में मोम के पतले धागे से उसपर बारीकी से डिजाइन बनाते हैं। जब ये सूख जाता है तो अगले चरण में मूर्ति को मिट्टी से ढक देते हैं। इसके बाद इसे सुखाते हैं, सुखाने के लिए धूप का ही सहारा होता है।"


वो आगे कहते हैं, "उसके बाद उसे फिर मिट्टी से ढंकते हैं, मिट्टी से ढकने (छपाई करने) को छेना धराना बोलते हैं, उसके बाद उसको दो-तीन मिट्टी से कवर करने के बाद, हम पीतल, टीन, तांबे जैसी धातुओं को पहले हजार डिग्री सेल्सियस पर गर्म करके पिघलाते हैं। इनको गर्म करने के लिए ठोस धातु के पात्र में पिघलाते हैं, इसे पिघलाने में चार-पांच घंटे का समय लगता है। तब ये पूरी तरह से पिघलता है।"

"इसके साथ ही जो ढांचा होता है उसे भी अलग सी भट्ठी में गर्म करते हैं और जब ये पूरी तरह गर्म हो जाएगा जो मिट्टी के अंदर का मोम होता है, वो पिघलता है उसी खाली स्थान पर जो धातु पिघलाई गई है, उसे इस ढांचे में धीरे-धीरे डालेंगे, तो जो मोम की जगह होती है, पीतल उसे ढक देता है। फिर उसे चार-छह घंटे तक ठंडे होने के लिए रखते हैं, ठंडा होने के बाद छेनी-हथौड़ी से मिट्टी निकालते हैं अगर मिट्टी फिर भी नहीं निकलती है तो उसे ब्रश से साफ करते हैं। हम ज्यादातर मूर्तियों को पॉलिश करते हैं, "तरुण आगे कहा।

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