नाक से बांसुरी बजाते हैं बृजलाल, पीएम मोदी भी कर चुके हैं तारीफ

तामेश्वर सिन्हा

कम्युनिटी जर्नलिस्ट

विश्रामपुरी (कोंडागाँव)। बांसुरी की मधुर धुन सुनना हर किसी को अच्छा लगता है। अक्सर आपने कई कलाकारों को बांसुरी की मधुर धुन बजाते देखा होगा। लेकिन आपने कभी नाक से बांसुरी बजाते किसी को नहीं देखा होगा। ऐसे ही एक कलाकार बस्तर के बीहड़ों में है जो आंखों की दिव्यांगता को चुनौती देते मुंह नहीं नाक से बांसुरी बजाते हैं।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर संभाग का मध्य बस्तर में स्थित जिला कोंडागांव के विश्रामपुरी ब्लॉक के बड़ागांव के 45 वर्षीय बृजलाल नेताम जो बचपन से आंखों से देख नहीं सकते हैं। जीभ न पलटने के चलते बांसुरी बजाने की बृजलाल को ललक इतनी है वो नाक से बांसुरी बजाते हैं।


बृजलाल कहते हैं, "आंखों की रोशनी बचपन में ही खो दी थी, शुरूआत से ही बांसुरी बजा कर जीवनयापन कर रहा हूं। पहले मुंह से बांसुरी बजाता था, लेकिन एक बार मेरा दुर्घटना हुआ और मेरे अंदर एक नया हुनर आ गया।

बृजलाल एक दिन सड़क पार करते हुए दुर्घटना का शिकार हो गए। दुर्घटना में जबड़ा और दांत टूट जाने के कारण वो बांसुरी बजाने में असमर्थ हो गए। लेकिन इसके बाद भी बृजलाल ने हार ना मानते हुए नाक से बांसुरी बजाने का अभ्यास किया और अब वो नाक से बांसुरी बजा कर जीवन-यापन कर रहे हैं।

बृजलाल के बांसुरी से स्थानीय बस्तर की बोली गोंडी- हल्बी हो या बॉलीवुड के गाने बजा कर हर धुन निकल लेते हैं।

इनके हुनर के कायल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी

अक्टूबर 2017 में दिल्ली के पूसा ग्राउंड में नानाजी देशमुख की जन्मशती के मौके पर प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसमें छत्तीसगढ़ के बस्तर से बृजलाल प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभान्वित के रूप में वहां पहुंचे थे। जहां वो नाक से बांसुरी बजा रहे थे। दिव्यांग बृजलाल अपनी धुन में मगन था। तभी प्रदर्शनी का भ्रमण कर रहे पीएम नरेंद्र मोदी ने उनकी धुन सुनकर पास आकर उनसे मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद उनके हुनर को देखते प्रशासनिक अफसर से लेकर नेताओ ने उन्हें झूठे वादों की भंवर में फंसाए रखा मसलन आज तक बृजलाल के पास एक इंदिरा आवास और पेंशन कर आलावा कुछ नही मिला है।


बृजलाल नेताम कहते हैं कि उन्हें दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिले थे। प्रधानमंत्री ने उनसे हाथ भी मिलाया जो दूसरे दिन अखबार में भी छपा था उसके गांव और आस-पास के सभी लोग उसे जानते हैं। लेकिन पेट पालने के लिए हाथ मिलना नहीं रोटी चाहिए जिसके लिए वह अब भी नाक से बांसुरी बजाते हैं।

बृजलाल कहते हैं, "पहले मेरे नाक से बांसुरी बजाने के हुनर को देखते लोग कुछ पैसे दे देते थे, जिससे घर-बार चल जाता था। लेकिन अब कोई नहीं देता। अभी मेरा 500 रुपए पेंशन आ जाती है। कभी-कभी आस-पास के मेला/बाजार में जा कर बांसुरी बजा कर कुछ सब्जियां भी इकट्ठा कर घर ले लेता हूं।

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