शाम की पाठशाला: अंगूठाछाप महिलाएं अब अंग्रेजी में बताती हैं नाम

पूर्णिया (बिहार)। पूर्णिया के बैरगाछी में महादलित और दलित समुदाय की महिलाएं आजकल हर हाल में शाम तक चौका-बर्तन कर लेती हैं। क्योंकि शाम को उन्हें पाठशाला भी जाना होता है।

वे महिलाएं जो बचपन में नहीं पढ़ सकीं, शाम की पाठशाला उन्हें साक्षर बना रहा है। नयी बहुएं हों या दादी, पाठशाला में हर उम्र की महिलाएं पढ़ने आती हैं। बिहार का पूर्णिया जिला राजधानी पटना से लगभग 400 किमी दूर है और पूर्णिया जिला मुख्यालय से बैरगाछी लगभग 50 किमी दूर है।

बैरगाछी में पिछड़े, महादलित और दलित समुदाय की संख्या ज्यादा है। महिलाओं में ज्यादातर निरक्षर हैं। ऐसे में शाम की पाठशाला उनके जीवन में एक नये सवेरा जैसा है। जो हाथ पहले बस मजदूरी और चौका बर्तन किया करते थे, वे अब कलम और किताब भी थाम भी पढ़ रहे हैं।

"माय नाम इज पूर्णी देवी" पूर्णी देवी (45) शाम की पाठशाला की नियमित छात्रा हैं। बच्चे भी स्कूल जाते हैं और खुद खेतों में मजदूरी भी करती हैं। पूर्णी देवी कहती हैं "शाम की पाठशाला में मैं 6 महीने से पढ़ रही हूं। पहले तो अक्षर भी नहीं पहचान पाती थी। लेकिन अब अंग्रेजी में अपना नाम बताती हूं और साइन भी कर लेती हूं। यहां आयी तो क, ख, ग सीखा।"


पूर्णी देवी की ही तरह तेत्री देवी भी हैं। तेत्री देवी भी मजदूरी करती हैं और उनके बच्चे स्कूल पढ़ने जाते हैं। मजदूरी और हर के काम के बाद तेत्री देवी पढ़ने के लिए भी समय निकाल लेती हैं। तेत्री कहती हैं हम तो शाम की पाठशाला में काफी समय पढ़ रहे हैं। पहले तो कुछ भी नहीं आता था लेकिन अब सब कुछ जैसे धीरे-धीरे बदल रहा है। हमें यहाँ तो पढ़ाई के आलावा स्वास्थ्य की भी जानकारी दी जाती है।"


शाम की पाठशाला की नींव रखी थी पेशे से इंजीनियर शशि रंजन ने। शशि कहते हैं "हम लोग उन लोगों पर ध्यान दे रहे हैं जहां अभी भी शिक्षा नहीं पहुंच पायी है। कुछ लोगों को तो पता ही नहीं है कि ऐसा कोई स्कूल भी है। ये लोग दिनभर खेत में काम करते हैं, पढ़ाई लिखाई से मतलब ही नहीं है। ये महिलाएं दिनभर काम करती हैं और शाम को लौटते ही मंडली बनाकर बैठ जाती हैं। तो ऐसे में हम लोगों ने उन्हें एक जगह बैठाने का प्रयास किया है शाम की पाठशाला के माध्यम से। पाठशाला में हर उम्र वर्ग की महिलाएं आती हैं। यहाँ तक कि 80 और 60 साल की भी महिलाएं आती हैं। यही नहीं, 22 से 28 साल तक की युवतियां जिनकी शादी हो चुकी है वे भी पढ़ने आती हैं।"

शशि आगे बताते हैं कि हम पाठशाला में बीच-बीच में विशेषज्ञों को भी बुलाते हैं। इसके आलावा हेल्थ कैंप का भी आयोजन करते हैं। पाठशाला में बिहार के मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की बहू गुड़िया इन महिलाओं की पढ़ाती हैं। गुड़िया कहती हैं " महिलाएं चाह रही हैं कि हम जो नहीं पढ़ पाये हैं उसको यहां आकर शाम की पाठशाला में पढ़ें और बहुत सी बातों को जानें। शाम की पाठशाल का कॉन्सेप्ट ही है- दिनभर करेंगे काम, शाम को पायेंगे अक्षर का ज्ञान। "


गुड़िया आगे कहती हैं "यहाँ हम लोग सिर्फ शिक्षा पर ही काम नहीं करते। हम स्वास्थ्य संबंधी बातें भी करते हैं। क्योंकि वे जो महिलाएं पढ़ने आती हैं उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी आ जाते हैं। हम बच्चों को नहीं पढ़ाते क्योंकि बच्चों के स्कूल हैं यहां पर्याप्त संख्या में। हर रविवार हम विशेष क्लास का आयोजन करते हैं।"

गिरींद्र नाथ झा : एक किसान जो खेत में साहित्य लिखता है


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