Folk Studio: हाथ में तलवार लिए ये गायिका सुना रही है अद्भुत 'आल्हा गीत'

क्या आपने कभी आल्हा गीत सुना है? कभी बुंदेलखंड जाएं, तो वहां का लोकप्रिय लोकगीत 'आल्हा' ज़रूर सुनिएगा। वीर रस से भरे हुए ये लोक गीत बुंदेलखंड का अभिमान भी हैं और पहचान भी। ढोलक, झांझड़ और मंजीरे की संगत में आल्हा गायक तलवार चलाते हुए जब ऊंची आवाज़ में आल्हा गाते हैं, तो माहौल जोश से भर जाता है। ये गीत कई सदियों से बुंदेलखंड की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।

गांव कनेक्शन स्टूडियो की नई पेशकश 'फ़ोक स्टूडियो' के पहले एपिसोड में आपको बुंदेलखंड की इस मशहूर लोककला से रूबरू करवाया जा रहा है। आल्हा लोकगीत की एक विधा है, जिसकी शुरूआत बुंदेलखंड के महोबा में हुई थी, आल्हा व उदल महोबा के राजा परमाल के सेनापति थे। बस यहीं से आल्हा गीत की शुरूआत हुई। आल्हा बुंदेलखंड के दो भाइयों (आल्हा और ऊदल) की वीरता की कहानियां कहते हैं। यह गीत बुंदेली और अवधी भाषा में लिखे गए हैं और मुख्यरूप से उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड और बिहार व मध्यप्रदेश के कुछ इलाक़ों में गाए जाते हैं। आल्हा और ऊदल बुंदेलखंड के दो वीर भाई थे।

एक छोटे से गाँव की रहने वाली शीलू ने जब आल्हा गायिका बनने का सपना देखा तो उसने नहीं सोचा था कि वो दूसरी लड़कियों के लिए मिसाल बनने वाली हैं। ढोलक, झांझड़ और मंजीरे की संगत में आल्हा गायक तलवार चलाते हुए जब ऊंची आवाज़ में आल्हा गाते हैं, तो माहौल जोश से भर जाता है। शीलू बताती हैं, "आल्हा गाते हुये देखा तो मैंने कहा पापा से कि मुझे भी आल्हा गाना है, तो पापा ने कहा कि नहीं ऐसी बात मत करो, क्योंकि आल्हा तो बस आदमी ही गाते हैं, लड़की नहीं गा सकती और उनके पास जाओगी तो वो डाटेंगें भी।"

शीलू से पहले इस गीत को सिर्फ पुरुष गाया करते थे, लेकिन आज शीलू भी आल्हा की प्रसिद्ध गायक हैं।

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