दरक रहे घर, धंस रही जमीन; उत्तराखंड के जोशीमठ पर मंडरा रहा खतरा

उत्तराखंड में जोशीमठ का धार्मिक और पर्यटन दोनों महत्व है। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों और इस क्षेत्र का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है यह धीरे-धीरे बैठ रहा, धंस रहा। रविग्राम, गांधीनगर और सुनील के वार्डों में सबसे ज्यादा धंसाव देखा गया है जिसकी वजह से हजारों लोग विस्थापित हो सकते हैं।

Megha PrakashMegha Prakash   4 Dec 2022 4:30 AM GMT

जोशीमठ (चमोली), उत्तराखंड। नेहा सकलानी आजकल परेशान हैं। इस समय सुबह-सुबह पहाड़ों पर धुंध छा जाती है और सर्दियों की तैयारी में मोटे गर्म कपड़े निकल आते हैं, लेकिन जोशीमठ के आकर्षक सुनील गाँव में रहने वाली नेहा को डर है कि इस साल सर्दियों की बर्फ की वजह से उनकी छत गिर ना जाए।

उनके घर की छत ही नहीं धंस रही है बल्कि घर की ईंट-पत्थर की दीवारों में भी गहरी दरारें आ गई हैं। कॉलेज की छात्रा नेहा ने कहती हैं कि उनके घर की नींव के नीचे की जमीन धंस रही है। छत को सहारा देने के लिए एक अस्थायी उपाय के रूप में परिवार ने बांस के खंभे खड़े किए हैं।

"घर कभी भी गिर सकता है। इसलिए हम बाहर निकलने से पहले जल्दी से सफाई करते हैं, नहाते हैं और खाना बनाते हैं, "उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया। नेहा को उनकी मां ने सख्त हिदायत दी गई है कि जब तक परिवार के सभी सदस्य शाम को घर वापस नहीं आ जाते, तब तक वह घर के अंदर न जाए।

केवल कॉलेज का छात्रा ही चिंतित नहीं हैं। उसी गाँव में रहने वाले नेहा के चचेरे भाई इस्मित सकलानी भी चिंतित हैं। "अगर हमारा घर गिर गया तो हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं होगी। स्थानीय प्रशासन का कोई भी व्यक्ति स्थिति की गंभीरता पर ध्यान नहीं दे रहा, "इस्मित ने गाँव कनेक्शन को बताया।

रविग्राम में लगभग हर घर की बाहरी और भीतरी दीवारों में दरारें पड़ रही हैं

उनकी एक दुकान की दीवारों पर दरारें आ गई हैं, जिसके कारण वे एक तरह के डर में जी रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि वे सीमित संसाधनों या आय वाले संयुक्त परिवार से हैं। उन्होंने कहा कि अगर घर या दुकान ढहती है तो यह बहुत ही कष्टकारी होगा।

चमोली जिले के जोशीमठ प्रखंड का रविग्राम वार्ड सुनील गाँव से बहुत ज्यादा दूर नहीं है जहां के निवासी लगातार डर के साए में जी रहे हैं। गाँव में लगभग 150 घर हैं। वहां रहने वाले लोगों का दावा है कि ये धीरे-धीरे धंस रहे हैं।

दो बच्चों की मां सुमेधा भट्ट ने चिंतित होकर कहा, "हालांकि, दरारें 2020 में दिखाई देने लगीं थीं, लेकिन 7 फरवरी 2021 को रैनी बाढ़ के बाद दरारों की चौड़ाई और गहराई बढ़ गई।"

उत्तराखंड में जोशीमठ का धार्मिक और पर्यटन दोनों महत्व है। जोशीमठ में नरसिंह मंदिर भगवान बद्रीनाथ की शीतकालीन पीठ है और हर साल लाखों तीर्थयात्री यहां आते हैं। जोशीमठ एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। उत्तराखंड की शीतकालीन खेलों की राजधानी औली जोशीमठ से मुश्किल से 16 किलोमीटर दूर है। लेकिन स्थानीय ग्रामीण और इस क्षेत्र का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। यह बैठ रहा, धंस रहा।

नेहा को चिंता है कि इस साल घर की छत शायद बर्फ का बोझ नहीं सह पाएगी

रुड़की स्थित सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक देबी प्रसाद कानूनगो ने गाँव कनेक्शन से कहा, "जोशीमठ अत्यधिक रूपांतरित चट्टानों पर बसा हुआ है जो भारी और लगातार बारिश की वजह से बदल रहा है।"

जोशीमठ और आस-पास के गाँवों में बहने वाले कई बारहमासी जल स्रोत समय के साथ ढलानों पर मिट्टी की ऊपरी परत (रेत, गाद, मिट्टी) को हटा देते हैं और बड़ा गैप बना देते हैं जो डूब की वजहों में से एक है। देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के लैंडस्लाइड विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने गाँव कनेक्शन को बताया।

रविग्राम, गांधीनगर और सुनील के वार्डों में सबसे ज्यादा धंसान देखी गई है। इसके अलावा औली-जोशीमठ सड़क के किनारे व्यापक दरारें और धंसान दिखाई दे रहा है, जैसा कि इस साल अगस्त में जोशीमठ क्षेत्र का सर्वे करने वाले भूवैज्ञानिकों की एक विशेषज्ञ टीम ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है। इस बहु-संस्थागत टीम का गठन उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने किया था।

पीयूष रौतेला (कार्यकारी निदेशक, उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) और एमपीएस बिष्ट (निदेशक, उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र) ने 2009 में जलविद्युत परियोजना के लिए राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) द्वारा खोदी गई एक भूमिगत सुरंग के विनाशकारी परिणाम की चेतावनी दी थी। सुरंग खोदने की प्रक्रिया में, मशीनरी ने जलभृत को पंचर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिदिन लगभग 60-70 मिलियन लीटर पानी का निर्वहन हुआ। करेंट साइंस में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह बड़े पैमाने पर निर्वहन, जिसका प्रभाव उस समय के आसपास नगण्य रूप से दिखाई दे रहा था, भविष्य में धंसने का कारण बनेगा। इस साल अगस्त में इलाके का सर्वे करने वाली टीम में रौतेला भी शामिल थे।

ढांचे को बचाये रखने के लिए किनारों पर पोल खड़ा किया गया है.

हाल ही में, एक स्थानीय गैर-लाभकारी जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने राज्य के मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर जोशीमठ क्षेत्र में बसने वाले गाँवों के बारे में सूचित किया। संगठन के सदस्य, जो स्थानीय गाँवों से ताल्लुक रखते हैं, ने कुछ सड़क कार्यों को रोकने, प्रभावित लोगों के पुनर्वास और प्रभावित क्षेत्र के सभी घरों के सर्वेक्षण की मांग की है।

पर्यावरणविद् जोशीमठ में आने वाली आपदा की चेतावनी दे रहे हैं जिस पर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं गया है। औली का रास्ता वार्ड सुनील से होकर गुजरता है जो भीषण डूब का सामना कर रहा है। जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के सक्रिय सदस्य अतुल सती ने गांव कनेक्शन को बताया, "अगर यह शहर डूबता है तो यह लगभग 25,000 लोगों को विस्थापित कर देगा।" 2011 की जनगणना के अनुसार रविग्राम की जनसंख्या (2,920); सुनील (3,030); गांधीनगर (1,520); सिंहधर (2,300); मारवाड़ी (2,400) है।

पैरों तले की जमीन खिसक रही है

रविग्राम की 40 वर्षीय सुमेधा भट्ट गाँव कनेक्शन को बताती हैं, "हमारे बाथरूम का दरवाजा करीब पांच से छह इंच नीचे धंस गया है और अब हमें दरवाजे को नीचे से काटकर फर्श को ऊपर उठाना पड़ा है।" उन्होंने बताया यह बहुत खतरनाक होता जा रहा क्योंकि दरवाजे और चौखट के बीच गैप के कारण कई दरवाजे बंद नहीं होते हैं।

रविग्राम वार्ड के कोठी गाँव की रहने वालीं नीलम भुजवान को दरवाजों में खराबी की समस्या ने अपने परिवार के स्वामित्व वाले घर से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया है।

"दरवाजा बंद नहीं किया जा सकता है इसलिए मैंने 4,000 रुपये में एक कमरा किराए पर लिया है। यह मुश्किल है क्योंकि मैं अपने पति की पेंशन और सहायक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में एक छोटे से वेतन पर निर्भर हूं, "भुजवान ने बताया जिन्होंने हाल ही में अपने पति को खो दिया है।

धसान के पीछे का विज्ञान

जोशीमठ का धंसना कोई नई घटना नहीं है। यह एक पुरानी समस्या रही है, लेकिन अब फरवरी 2021 की बाढ़ के बाद दरारें और गहरी हो गई हैं।

भूविज्ञानी और सामाजिक विज्ञान विभाग की प्रमुख सरस्वती प्रकाश सती गाँव कनेक्शन को बताती हैं कि इस क्षेत्र के धंसने और इसकी नाजुकता का एक इतिहास है। "जोशीमठ और तपोवन के बीच का इलाका पुराने भूस्खलन सामग्री पर स्थित है और यह 60 के दशक के अंत की बात है जब जोशीमठ कई स्थानों पर धंसना शुरू हुआ था, "उन्होंने कहा।

लिविंग रूम अब रहने लायक नहीं रहा

1982 में जर्नल ऑफ फोटो-इंस्टीट्यूट एंड रिमोट सेंसिंग की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि कैसे सुनील-जोशीमठ पहाड़ी एक प्राचीन भूस्खलन क्षेत्र पर स्थित है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह क्षेत्र विशाल शिलाखंडों पर टिका हुआ है जो ढीली रेत-मिट्टी में जड़े हुए थे। आसपास के क्षेत्रों में झरन होने के कारण अत्यधिक रिसाव हुआ जिससे बोल्डर विस्थापित हो गए और स्थानीय क्षेत्र डूब गए।

रिपोर्ट के लेखक ए भट्टाचार्य और डीके जुगरान ने ढलान और मिट्टी के स्थिरीकरण की जांच करने वाले वजहों का जल्द से जल्द पता लगाने की सिफारिश की है। उन्होंने एक उचित जल निकासी प्रणाली के महत्व पर जोर दिया जिससे झरनों और छोटी धाराओं से पानी अलकनंदा नदी में निर्बाध रूप से प्रवाहित हो सके।

कटाव में जोड़ा गया क्षेत्र का तेजी से शहरीकरण हो रहा। यह ओवर-बिल्डिंग के खतरों पर कई रिपोर्टों के बावजूद है। 1976 में क्षेत्र में शहरीकरण और क्षरण से चिंतित तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित मिश्रा समिति (वर्ष 2000 तक, उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा था) ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसकी एक प्रति गांव कनेक्शन के पास उपलब्ध है। उसमें यह स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि जब तक साइट की स्थिरता की उचित जांच नहीं की जाती है तब तक क्षेत्र में आगे कोई निर्माण नहीं होना चाहिए।

समिति ने घरों के निर्माण के लिए ढलानों पर खुदाई को प्रतिबंधित करने और भूस्खलन वाले क्षेत्रों में पत्थरों को हटाने और पेड़ों की कटाई को रोकने की भी सलाह दी।

कानूनगो ने गाँव कनेक्शन को बताया, "तेजी से शहरीकरण कम असर क्षमता वाले कमजोर पहाड़ी ढलानों पर बहुत अधिक दबाव डाल रहा है।"

जारी है भारी निर्माण

बहुत अधिक निर्माण के कारण कई बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुए हैं। 2009 और 2012 के बीच, CSIR के मुख्य वैज्ञानिक कानूनगो द्वारा चमोली-जोशीमठ क्षेत्र में 128 भूस्खलन दर्ज किए गए थे। उन्होंने 2014 में लैंडस्लाइड्स: जर्नल ऑफ़ द इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑन लैंडस्लाइड्स में इसका जिक्र है।

2018 में करंट साइंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस क्षेत्र में बड़े भूस्खलन पर प्रकाश डाला गया था। इसने जोशीमठ से आठ किलोमीटर दूर धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों के संगम विष्णुप्रयाग में 19 मई 2017 को बड़े पैमाने पर भूस्खलन की बात कही।

रविग्राम में कुछ परिवारों ने अपना घर छोड़ दिया है और सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं

लेखकों ने नोट किया: "...हाथी पर्वत एक भूस्खलन क्षेत्र है क्योंकि ढीले बोल्डर और ढलानों पर बड़े रॉक ब्लॉक मौजूद हैं। भारी वर्षा भूकंप और मानवजनित कारकों जैसे ट्रिगरिंग कारकों के कारण भविष्य में ढलान विफल हो सकता है। विशेष रूप से चमोली से बद्रीनाथ तक का सड़क क्षेत्र कमजोर भूगर्भीय संरचना पर है। यह अत्यधिक भूस्खलन वाला क्षेत्र है।

विरोध प्रदर्शन और आंदोलन

1999-2000 में हाथी पर्वत में सुरंग बनाने का विरोध हुआ था। सुरंग को नदी की दिशा बदलकर जोशीमठ करना था।

कानूनगो ने कहा, भूमिगत सुरंगें होल बनाती हैं। इसलिए सुरंग की सिधाई को समझना होगा। "क्षेत्र की ठीक से जांच और निरीक्षण करना आवश्यक है और उसके बाद ही आगे धंसने की जांच के लिए इंजीनियरिंग समाधान या उपायों को डिजाइन किया जा सकता है, "उन्होंने कहा।

कानूनगो को डर था कि कई विकास निकाय जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) वास्तव में इलाके, पहाड़ी ढलानों या भूस्खलन के पीछे के कारणों को नहीं समझते हैं। जागरूकता की यह कमी बड़े खतरे का कारण हो सकता है।

वैज्ञानिक ने कहा, "उपचारात्मक उपायों के लिए बुनियादी ढांचे की प्रक्रिया में भूस्खलन को समझना और उस पर ध्यान देने की जरूरत है,"। उन्होंने यह भी कहा कि केवल एक रिटेनिंग वॉल लगाना पर्याप्त नहीं है। हर जगह भूस्खलन अलग तरह का होता है, इसलिए इसका प्रभाव भी अलग होगा।

पर्यावरणविदों की शिकायत है कि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सिफारिशों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जोशीमठ में अभी भी उचित जल निकासी व्यवस्था का अभाव है और, विकास परियोजनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला चल रही है।

13 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने हेलंग-मारवाड़ी बाईपास सड़क के निर्माण को हरी झंडी दे दी। यह जोशीमठ से पहले 13 किलोमीटर की दूरी पर है। ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के तहत बाईपास बनने से बद्रीनाथ मंदिर शहर की दूरी 30 किलोमीटर कम हो जाएगी।

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