पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों को भा रही काला नमक धान की खेती

पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों को भा रही काला नमक धान की खेती

गुणानंद ध्यानी, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

सिद्धार्थनगर(उत्तर प्रदेश)। कभी जिले के पांच गांवों तक सिमटे काला नमक चावल की खेती को आज पूर्वांचल के 11 जिलों के किसान पैदा कर रहे हैं और अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं।

काला नमक चावल को विश्वव्यापी बनाने के लिए यूनाइटेड नेशन के मुख्य सलाहकार पद से रिटायर प्रोफेसर व कृषि वैज्ञानिक रामचेत चौधरी ने अपना 23 साल दिया है और आज इसमें कई रिसर्च कर इसकी पैदावार को दोगुना कर दिया है। गोरखपुर महाराजगंज और सिद्धार्थनगर के हजारों किसान आज काला नमक की व्यापक खेती कर रहे हैं और जिंक, आयरन से भरपूर इस चावल की आज हर जगह डिमांड बढ़ गयी है।

प्रो रामचेत चौधरी बताते हैं, "अगर कोई किसान दो एकड़ में काला नमक धान की खेती कर ले तो वो लखपति बन सकता है। अभी जो काला नमक की नई किस्म काला नमक किरण है, इस किस्म को विकसित करने में हमें लगभग 19 साल लगे हैं। इतने सालों के अनुसंधान के बाद हमने तीन किस्में दी हैं, पहली जो किस्म थी उसमें स्वाद-सुगंध तो अच्छा था लेकिन पैदावार कम थी, अभी जो नई किस्म आयी है बौना काला नमक 101, बौना काला नमक 102, बौना काला नमक 103 और काला नमक किरण, जिनकी पैदावार अधिक है।"


सिद्धार्थनगर के पांव गाँवों से निकलकर काला नमक चावल की सुगंध अब जापान, थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान सहित बौद्ध धर्मावलम्बियों के तमाम देशों तक पहुंचने लगी है। बुद्ध से जुड़ाव के चलते यह 'पवित्र चावल' के नाम से और भी मशहूर हो रहा है। मान्यता है कि महात्मा बुद्ध को यह चावल काफी प्रिय था। ज्ञान प्राप्ति के दिन सुजाता ने महात्मा बुद्ध को जो खीर भेंट की थी वह कालानमक चावल से बनी थी और महात्मा बुद्ध ने भी अपने अनुयायियों को इसी चावल को प्रसाद के रूप में दिया था।

इस चावल की लोकप्रियता से उत्साहित कृषि विज्ञानी और किसान सुगन्ध, स्वाद और सेहत से भरपूर इस चावल की नई किस्मों की खोज में भी जुट गए हैं। रसायनों की बजाय नीम, सरसों की खली और गोबर की खाद का इस्तेमाल कर आर्गेनिक खेती पर जोर है ताकि ये हर परीक्षण पर खरा उतरे। यूएन में मुख्य सलाहकार पद से रिटायर होने के बाद प्रो रामचेत चौधरी इसके शोध में पिछले 23 साल से जुटे हैं। केएन-2, केएन-3 और किरन नामक प्रजाति के कालानमक चावल के बीज तैयार कर किसानों को दे रहे हैं। सुगन्ध, स्वाद, पोषक तत्वों और लागत के मामले में ये प्रजातियां खरी उतरीं हैं और इनको अब किसानों को देकर व्यापक स्तर पर उत्पादन करवाया जा रहा है।

वो आगे कहते हैं, "इसकी नई प्रजाति की पैदावार एक एकड़ में 18 कुंतल तक होती है जो परंपरागत खेती से दुगनी पैदावार मानी जा रही है। इसकी वजह से अब काला नमक की खेती करने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।"


रामचेत चौधरी की वजह से काला नमक के लिए सिद्धार्थनगर सहित कुल 11 जिलों को जीआई टैग मिला है। इनमें गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, देवरिया, संतकबीरनगर, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच और बलरामपुर शामिल हैं। ये जिले कालानमक चावल का उत्पादन और बिक्री दोनों कर सकते हैं।

इसकी खेती करने वाले उन्नत किसानों का कहना है कि कम जमीन में अधिक उत्पादन होने की वजह से और सौ रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिकने के कारण काला नमक धान किसानों के लिए इस समय फायदे का सौदा बना हुआ है। जिस तरह से इस धान को उन्नत बनाने के लिए नए रिसर्च हो रहे हैं, आने वाले समय में काला नमक धान की खेती पूर्वांचल के किसानों के लिए काफी मुफीद साबित होने वाली है।

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