वैज्ञानिकों ने विकसित की मिर्च की नई किस्म, खाने के साथ ही लिपस्टिक बनाने में भी होगा इस्तेमाल

आईसीएआर-आईआईवीआर के वैज्ञानिकों ने मिर्च की एक नई किस्म काशी सिंदूरी विकसित की है जिसकी खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। यही नहीं इस किस्म की मिर्च से प्राप्त रंगों का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधनों में भी किया जा सकता है।

Pavan Kumar MauryaPavan Kumar Maurya   10 Nov 2022 7:30 AM GMT

वाराणसी, उत्तर प्रदेश। वैज्ञानिकों ने मिर्च की एक ऐसी किस्म विकसित की है, जो खाने के काम तो आएगी ही साथ ही इससे मिलने वाले सुर्ख रंग का इस्तेमाल सौंदर्य प्रशाधन बनाने में भी किया जाएगा।

मिर्ची की अनोखी इस हाइब्रिड प्रजाति का नाम वीपीबीसी-535 है, इसका नाम काशी सिंदूरी भी है। इसे वाराणसी स्थित आईसीएआर-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। विदेशों में मिर्च से रंग बनाने की कई प्रजातियों पर काम हो रहा है, लेकिन भारत में काशी सिंदूरी मिर्च की एकमात्र प्रजाति है, जिसे उत्तर प्रदेश के जलवायु को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसकी खेती को लेकर किसानों में भी उत्साह है।

आईवीवीआर के निदेशक तुषार कांति बेहरा गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "आईआईवीआर लंबे समय से मिर्च पर काम कर रहा है और इस अवधि में कई सारी किस्में भी किसानों को उपलब्ध कराई गई है। मिर्च काशी सिंदूरी यानि पैप्रिका प्रजाति की खेती पहली बार हो रही है।"

वो आगे कहते हैं, "जब यह मिर्च पक जाती है तो, इसका पूरा रंग लाल हो जाता है। इसमें एक औषधिय गुण होता है, जिसे ओलियोरेजिन कहते हैं। औषधिय गुण के कारण दवाई में और लाल रंग के रूप में सौंदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा सकता है। सिंदूरी काशी मिर्च रंग के पिग्मेंट को सब्जी, सौंदर्य प्रसाधन में लिपस्टिक और मेडिसिन में इस्तेमाल करने से प्राकृतिक कलर मार्केट में क्रांति सी आ जाएगी। सिंथेटिक रंग के हानिकारक प्रभावों से करोड़ों नागरिकों को आसानी से बचाया जा सकता है। मिर्च की इस किस्म को यूपी ट्रॉपिकल के हिसाब से तैयार किया गया है।"

मिर्ची की अनोखी इस हाइब्रिड प्रजाति का नाम वीपीबीसी-535 है, इसका नाम काशी सिंदूरी भी है। इसे वाराणसी स्थित आईसीएआर-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है।

भारतीय सौंदर्य और व्यक्तिगत देखभाल बाजार 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कुल मूल्य के साथ दुनिया का आठवां सबसे बड़ा बाजार है और यह 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इस वृद्धि को बढ़ावा देने वाले त्वचा देखभाल और सौंदर्य प्रसाधनों के साथ बाजार 2030 तक दोगुना होने की उम्मीद है। भारतीय उपभोक्ताओं के बीच हर्बल कॉस्मेटिक उत्पादों की बढ़ती मांग भी निर्माताओं के लिए व्यापक विकास अवसर पैदा कर रही है।

वाराणसी से चालीस किमी दूर मिर्जापुर जनपद में मेड़िया गाँव चालीस फीसदी किसान मिर्च की खेती कई दशकों से करते आ रहे हैं। यही नहीं यूपी के बाराबंकी, वाराणसी, प्रयागराज, मिर्जापुर जैसे जिलों में किसान मिर्च की खेती से जुड़े हुए हैं। इन जिलों से मिर्च दुबई, ओमान, कतर, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में निर्यात की जाती है।

वो आगे कहते हैं, "सरकार को सब्जियों का समर्थन मूल्य घोषित करना चाहिए। लेकिन, काशी सिंदूरी मिर्च की खेती एक संभावना है। यदि काशी सिंदूरी मिर्च की खेती होती है तो पूर्वांचल में मिर्च की खेती करने वाले लाखों किसानों मालामाल हो सकते हैं। इनके दिन फिर जाएंगे और सही मायने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने के प्रयासों पर भी मुहर लगेगी।"

पप्पू सिंह ने आईआईवीआर से मिले बीजों से काशी सिंदूरी मिर्च की खेती प्रायोगिक तौर पर शुरू कर दी है। बेहरा ने बताया कि उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों के अलावा कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनिंदा किसानों को काशी सिंदूरी की किस्म वितरित की गई है।


नियमित मिर्च के 50 किलो के बैग की कीमत को तोड़ते हुए, पप्पू सिंह ने कहा, "बीज, सिंचाई, कीटनाशक, खाद, तुड़ाई और ढुलाई का खर्च जोड़ दे तो हमें मुनाफा नहीं मिल रहा है। इन दिनों सामान्य मिर्च की खेती में एक पचास किलोग्राम बैग पर लागत इस प्रकार है- तुड़ाई का दो सौ रुपए, ढुलाई का चालीस रुपए, सिंचाई, दवा और अपनी मेहनत को जोड़ दें तो हमें आशातीत मुनाफा नहीं हो रहा है।"

किसान को लगा कि काशी सिंदूरी मिर्च की खेती किसानों के लिए बहुत पैसा कमाने का रास्ता हो सकती है। पप्पू सिंह के अनुसार, सामान्य मिर्च 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है, लेकिन अधिक होने पर 10 रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर सकती है।

दूसरी ओर काशी सिंदूरी 90 रुपये प्रति किलो तक बिक सकती है, उन्होंने कहा। लेकिन ऐसा होने के लिए किसानों के पास एक अनुबंध होना चाहिए जो उन्हें आश्वस्त करे कि उनकी पूरी उपज बड़ी कंपनियों द्वारा खरीदी जाती है।

वाराणसी जिले के लोहटा गाँव के एक युवा किसान बबलू ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने शिकायत की, "तीखी मिर्च की खेती से शुरुआत में मिलने वाले उत्पादन से ठीक आय हो जाती है। जैसे ही मंडियों में मिर्च की आवक बढ़ती है। आढ़तिये औने-पौने दामों में माल खरीदने लगते हैं। लेकिन, काशी सिंदूरी की खेती हमारे जैसे हजारों किसानों के जीवन में बदलाव का सबब बन सकती है। इसके लिए सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियों को किसानों के संपर्क में लाया जाय। जनपद में मिर्च से रंग बनाने की इकाई लगाई जाए। इसके बाद फिर आय बढ़ाने के लिए पैप्रिका मिर्च की खेती के लिए किसानों को जागरूक और प्रत्साहित किया जाए।"

वाराणसी के जिला उद्यान निरीक्षक ज्योति कुमार सिंह ने गाँव कनेक्शन को बताया, "अगर सरकार से आधिकारिक समर्थन और प्रोत्साहन मिलता है, तो काशी सिंदूरी की खेती को बहुत बढ़ावा मिल सकता है।"

काशी सिंदूरी की खेती कैसे करें

आईसीएआर-आईआईवीआर, वाराणसी द्वारा विकसित इस मिर्च को वीपीबीसी-535 कहा जाता है। इसमें उच्च मात्रा में ओलेरोसिन (15 प्रतिशत) होता है। यह प्रति हेक्टेयर 150 क्विंटल तक उपज दे सकता है। सामान्य मिर्चों का उत्पादन थोड़ा अधिक हो सकता है क्योंकि उनमें अधिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। काशी सिंदूरी के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 400-500 ग्राम बीज की जरूरत होती है।

काशी सिंदूरी की खेती रबी और खरीफ दोनों मौसमों में की जा सकती है।

जो किसान वैज्ञानिक रूप से इस किस्म की खेती करने की योजना बना रहे हैं, उन्हें जुलाई/अगस्त के महीनों में नर्सरी तैयार करनी चाहिए।

यह अनुशंसा की जाती है कि बीज बोने के 30 दिनों के बाद, पौधे को 45 सेमी की दूरी पर प्रत्यारोपित किया जाना चाहिए, प्रत्येक पंक्ति 60 सेमी की दूरी पर होनी चाहिए।

जब खेत तैयार किया जा रहा हो तो लगभग 20-30 टन प्रति हेक्टेयर कम्पोस्ट या गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए।

मिर्च को प्रति हेक्टेयर 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है।


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