राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में बड़ी बात है 'लचित बोरफूकन अवार्ड' का मिलना

लचित बोरफुकन भारतीय इतिहास के वो नायक हैं जिन्होंने गुवाहाटी के आगे मुगलों को नहीं आने दिया। बेशक स्कूल की किताबों में इस हीरों का जिक्र न हो, उनके साहस और नेतृत्व की कहानी भारतीय सेना हमेशा याद रखती है, तभी तो नेशनल डिफेन्स अकादमी उनके नाम पर बेस्ट कैडेट को अवार्ड देती है।

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विशाल नदी ब्रह्मपुत्र की गोद में बसा असम प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और अपनी अनूठी संस्कृति के लिए मशहूर है।

लेकिन इसके इतर असम की एक और पहचान है जो है लचित बोरफुकन।

ब्रह्मपुत्र का बहता पानी और उसके बगल की उपजाऊ ज़मीन लचित बोरफुकन की वीरता, पराक्रम और कुशल सेना नेतृत्व की एक मात्र गवाह है।

भारत के असम राज्य में करीब 600 साल राज करने वाले अहोम साम्राज्य के बारें में कम ही लोग जानते हैं।

असम के गुवाहटी में ब्रह्मपुत्र नदी के लचित बोरफुकन मेमोरियल बनाया गया है। सभी फोटो: प्रत्यक्ष श्रीवास्तव

जहाँगीर के समय से औरंगजेब के समय तक मुग़ल साम्राज्य काफ़ी हद तक बदल चुका था। मुग़लों की विस्तार वाद की नीति के चलते उनकी नज़र अब भारत के पूर्वी क्षेत्र पर थी। लेकिन मुग़ल कभी भी पूरे भारत पर अपना आधिपत्य नहीं स्थापित कर पाए जिसका एक कारण अहोम साम्राज्य और लाचित बोरफुकन भी थे।

करीब 70 साल तक मुग़लों और अहोम साम्राज्य में झड़प होती रही। मुग़ल साम्राज्य हर पैमाने पर अहोम आर्मी से बड़ी और ताकतवर थी फिर चाहे वो संख्या बल हो या उस समय के आधुनिक हथियार। लगातार हमलों के क्रम में वर्ष 1667 में अहोम मुग़लों से हार गए, जिसके चलते उन्होंने गुवाहटी और कुछ इलाकों पर से अपना कण्ट्रोल खो दिया अहोम साम्राज्य ने, न सिर्फ अपना राज्य हारा बल्कि उसके साथ-साथ उन्हें मुग़ल साम्राज्य को अपने ख़ज़ाने से 3 लाख धनराशि भी देनी पड़ी।


लेकिन लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई थी अभी दुनिया को लचित बोरफुकन का साहस देखना बाकी था। अहोम सेना के सेना नायक लाचित ने फिर से पलटवार किया और इस बार उनकी गोरिल्ला वॉर फेयर (मारो और भाग जाओ) की तकनीक ने मुग़लिया सेना के दांत खट्टे कर दिए थे।

इस युद्ध को सराईघाट का युद्ध भी कहा जाता है, जिसमें लचित बोरफुकन ने मुग़ल सेना को मजबूर किया की वो सीधी ज़मीनी लड़ाई की बजाय ब्रह्मपुत्र के पानी और जँगल में लड़ाई करें; क्योंकि लचित जानतें थे कि मुग़ल सेना की नेवी उनकी कमजोर कड़ी है और लचित और उनकी सेना सराईघाट के भूगोल से अच्छी तरह वाकिफ़ थे।

युद्ध में ऐसा भी समय आया जब लचित बहुत बीमार पड़ गए और अहोम सेना के 1000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। सेना का मनोबल टूटने लगा तब लचित बोरफुकन ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए मुग़लों से अपनी सारी खुई हुई ज़मीन वापस हासिल कर ली।


सराईघाट के युद्ध के बाद मुग़लों ने पूर्वी भारत से अपना ध्यान हटा लिया और कभी अहोम राज्य पर आँख उठा के नहीं देखा।

ये दुःख की बात है की हमारे देश की मुख्यधारा के इतिहास में लचित बोरफुकन को वो स्थान नहीं दिया गया, जिसके वो हकदार थे लेकिन हमारी देश की सेना ने उनको वो जगह दी जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। लचित बोरफुकन एक कुशल सेनानायक और साहस के प्रतीक है शायद ये ही वजह है की नेशनल डिफेन्स अकादमी के बेस्ट कैडेट्स को दिए जाने वाले अवार्ड का नाम लचित बोरफुकन के नाम से प्रेरित है।

assam #history Lachit Borphukan 

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