गांव का मेला घूमिए नीलेश मिसरा के साथ... देखिए Video

दोस्तों.. नमस्कार मेरा नाम है नीलेश मिसरा... मेरे गांव में एक मेले लगा था, वैसे तो हजारों लोग यहां आए थे, लेकिन जो लोग नहीं आ पाए.. उनके लिए मैं लाया हूं ये खास वीडियो..

दोस्तों, आप लोग कभी न कभी तो मेला जरुर गए होंगे… अरे मैं वो शहर में किली मॉल में लगने वाले मेले की बात नहीं कर रहा, मैं उस मेले की बात कर रहा हूं, जहां आप बचपन में जाते थे।

वही मेला जहां कभी आप बाबा का हाथ पकड़कर तो कभी पापा की घोड्या (कंधे पर बैठकर) चढ़कर गए होंगे। गांव के मेलों की अपनी रौनक होती थी। चाट-पकौड़ा, कंपट, लाइमनजूस, जलेबी खाने को मिलती थी तो लौटते वक्त कंचा और लट्टू खरीदकर लाते थे।

मेले में जादूगर सलमान ने भी खूब रंग जमाए। फोटो- वर्तिका तोमरमेले में जादूगर सलमान ने भी खूब रंग जमाए। फोटो- वर्तिका तोमर

मेले ग्रामीण अर्थव्वयस्था और सांस्कृतिक केंद्र हुआ करते थे। मनोरंजन, खरीदारी के साथ वहां कई रिश्ते भी पनपते थे, मैंने तो सुना है ऐसे मेलों में पहले कई लोगों की शादियां तय हुआ करती थी, गिले शिकवे मिटा करते थे, कई दिल मिला करते थे।

उसी मेले में तो बचपन की कई कहानियां और यादें बसा करती थीं। मैं तो अपने जुड़वा भाई के साथ ऐसे कई मेलों में गया हूं। उत्तर प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड के नैनीताल में पढ़ाई के दौरान हम खूब मेला घूमे हैं। मेरे तो कई दोस्त इन्हीं मेलों में मिला करते थे। और कई बार उन दोस्तों से कई महीनों से बंद पड़ा बातचीत, थोड़ी नाराजगी, थोड़ा सा जो क्लासरूम या फिर खेल के मैदान का गुस्सा हुआ करता था, ऐसे ही किसी मेले में आकर दूर हो जाता था। गर्मा गर्म जलेबी या फिर समोसा खाते हुए हम लोग सब शिकवा शिकायतें भूल जाते थे। फिर वर्षों हो गए किसी मेले में जाना नहीं हो पाया।

गांव का मेला है तो क्या हुआ, फोटो भी होंगी और सेल्फी भी। मैंने और यामिनी भी ने भी एक फोटो खिंचवा ही ली। फोटो- वर्तिका तोमरगांव का मेला है तो क्या हुआ, फोटो भी होंगी और सेल्फी भी। मैंने और यामिनी भी ने भी एक फोटो खिंचवा ही ली। फोटो- वर्तिका तोमर



वो बचपन, वो खुशी और वो खुशमिज़ाजी मुझे एक बार फिर गांव कनेक्शन मेले में मिली। देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म ने अपनी छठवीं वर्षगांठ पर 2 दिसंबर 2018 को इस ग्रामीण मेले का आयोजन किया था। ये मेला लखनऊ से 35 किलोमीटर दूर गदैला गांव के भारतीय ग्रामीण विद्यालय कुनौरा में लगाया गया था। भारतीय ग्रामीण विद्यालय वही स्कूल है, जिसे मेरे पिता ने आज से करीब 4 दशक पहले शुरु किया था, मेरे पापा डॉ. एसबी मिश्र ने कनाड़ा में शानदार नौकरी और रिसर्च छोड़कर इस स्कूल की स्थापना की थी।

मैं जो किस्से कहानियां आपको सुनाता हूं, उनमें ये मेले भी तो होते हैं। दो दिसंबर को इसी जगह भव्य मेले का आयोजन किया गया, और मुझे वो सब मिला जो मैं बचपन में भूल आया था। गांव कनेक्शन फाउंडेशन की तरफ से यहां कई तरह के मैच, जिनमें गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो, सुरबघ्घी में खूब सारे बच्चे शामिल हुए।

भई क्रिकेट का जलवा तो गांव में सिर चढ़कर बोलता है। कई जिलों के आठ स्कूल की टीमें आईं थीं, वैसे तो क्रिकेट का कच्चा खिलाड़ी हूं, लेकिन लोगों ने मुझी से इसकी शुरुआत करा दी.. भई बड़ा मजा आया।

कबड्डी देखकर तो मेरा मन हुआ कि मैं भी कूद जाऊं इसी में। लेकिन सबसे ज्यादा मजेदार थी गांव वो चाट, छेपुला के पत्तों पर मटर पर पड़ी लाल मिर्च और इमली की चटनी से खाने से पहले मुंह में पानी आ गया।

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