इन्होंने तोड़ दिया था फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का रिकॉर्ड

पंजाब के परमजीत सिंह के नाम कई सारी उपलब्धियाँ हैं, लेकिन उनका एक ऐसा भी रिकॉर्ड है, जिसने उन्हें मशहूर बना दिया। इसके लिए उन्हें अर्जुन अवॉर्ड और महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है।

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जब भी दौड़ की बात आती है ज़ेहन में सबसे पहले फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का ही नाम आता है, लेकिन आज आपको पंजाब के ऐसे ही शख़्स से मिलाते हैं, जिन्होंने मिल्खा सिंह का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

पंजाब के होशियापुर ज़िले के नैनोवाल जट्टां गाँव के रहने वाले 52 वर्षीय परमजीत सिंह ने 2008 में बैंकॉक एशियन गेम्स में मिल्खा सिंह का 400 मीटर का रिकॉर्ड तोड़कर 45.56 सेकेंड का रिकॉर्ड अपने नाम किया था।

परमजीत सिंह गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "मुझे बताया गया था कि 400 मीटर रेस में मिल्खा सिंह का रिकॉर्ड है, जिसे कोई नहीं तोड़ पाया, मुझे भी लगा हाँ भाई बहुत बड़ा नाम है, इनका रिकॉर्ड तोड़ता हूँ तो हिंदुस्तान में मेरा भी नाम हो सकता है। फिर क्या साल 1998 में मैंने वो रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।"

लेकिन यहाँ तक पहुँचने में उनकी अथक मेहनत और धैर्य है। परमजीत 10वीं तक सरकारी स्कूल में खो-खो, वॉलीबॉल और कबड्डी खेलते थे। टांडा साईं सेंटर में भाई को एथलेटिक्स में एडमिशन दिलाने गए और खुद भी ट्रिपल जंप के ट्रायल में सिलेक्ट हो गए। फिर 11वीं में टांडा उड़मुड़ सरकारी स्कूल में स्पोर्ट्स विंग में एडमिशन ले ले लिया और करीब 6 महीने तक ट्रिपल जंप किया उसके बाद एंकल इंजरी हुई। 1990 में बारहवीं की पढ़ाई के दौरान पंजाब स्कूल गेम्स और नेशनल स्कूल गेम्स में 50.02 सेकेंड में 400 मीटर में गोल्ड मेडल हासिल किया।


परमजीत की 1991 में सीआरपीएफ में हेड कांस्टेबल रैंक से शुरुआत हुई। 1994 में सब इंस्पेक्टर, 1995 में इंस्पेक्टर, 1998 एशियन गेम्स के बाद डीएसपी, एसपी बने और दिल्ली में कमांडेट पद पर रहने के बाद दिसंबर 2022 में वॉलंटियरी रिटायरमेंट ले लिया है।।

लेकिन आखिर उन्होंने रेस में कैसे शुरुआत की इस सवाल पर वो कहते हैं, "एक अक्टूबर, 1990 को मैंने सीआरपीएफ कांस्टेबल पद पर ज्वाइन किया, उसके बाद पहली बार नेहरू स्टेडियम में मुझे सिंथेटिक रनिंग ट्रैक ट्राई करने का मौका मिला, फिर धीरे-धीरे ऐसी अचीवमेंट मिलती रहीं और मुझे सब इंस्पेक्टर बना दिया गया।"

1992 में सीआरपीएफ इंटर सेक्टर चैंपियनशिप और आल इंडिया पुलिस गेम्स में 400 मीटर इवेंट में गोल्ड के साथ बेस्ट एथलीट बने। 1994 में भारतीय एथलेटिक्स टीम में शामिल हुए।

परमजीत आगे बताते हैं, "और उसके बाद मुझे नेशनल कैंप मिल गया और नेशनल कैंप में गया, फिर मेरी 400 मीटर में ऑल ओवर इंडिया 10वीं रैंक थी। उसके बाद में वहाँ पर मुझे फैसिलिटी मिलती गईं और मैं आगे बढ़ता गया वहाँ पर 6 महीने के अन्दर मैं नेशनल चैम्पियन हो गया और एक नंबर पर आ गया।"

"उसके बाद 1994 की जो एशियन गेम का मेरा पहला टूर था उसमें भी सेलेक्ट हो गया इंडिविज्यूल और हमारी रीले भी गयी थी जिसमें हमारा चौथा स्थान था , "उन्होंने आगे कहा।


फिर जैसे-जैसे अचीवमेंट मिलती गई आगे बढ़ते गए। 400 में उन्होंने मिल्खा सिंह का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया।

उस रिकॉर्ड के बारे में वे बताते हैं, "उस रिकार्ड के लिए मैंने चार से पाँच साल मेहनत की। जैसे मैंने रिकॉर्ड बनाया मेरे कोच मेरे पास आए बताया कि रिकॉर्ड टूट गया है। लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि इतने साल कैसे बीत गए, अब तो मुझे जानने लगे हैं।

एथलेटिक स्टार 1998 में अर्जुन अवॉर्ड और 2006 में महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड जीता। वो कहते हैं, "उसके बाद मुझे 1998 में मेरी सभी अचीवमेंट के लिए भारत सरकार नें मुझे अर्जुन अवार्ड दिया। अर्जुन अवार्ड के बाद पंजाब सरकार ने महाराजा रणजीत सिंह अवार्ड दिया।"

भारत की तरफ से खेलते हुए इंटरनेशनल स्तर पर 24 पदक, वर्ल्ड पुलिस गेम्स स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूएसए में 15 गोल्ड मेडल, 1997 जापान में एशियन ट्रैक एंड फील्ड में सिल्वर मेडल, 2002 साउथ कोरिया एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल हासिल करके देश का नाम रोशन किया। परमजीत सिंह 1994 से 2002 तक भारत की तरफ से एथलेटिक्स खेलते रहे।

"जब आप देश के लिए मेडल लेकर आ रहे हैं, वहाँ जैसे तिरंगा आप फैलाते हो और जब राष्ट्रगान चलता है। तो बहुत बड़ी बात होती है।" परमजीत ने आखिर में कहा।

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