कारोबार शुरू करने के लिए बेचना पड़ा था मंगलसूत्र, आज कमा रहीं हजारों

वर्धा (महाराष्ट्र)। "सरकार हथकरघा लगाने के लिए 30 टका (सब्सिडी) दे रही थी, लेकिन 70 टका हमें खुद से लगाने थे, लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। इसलिए हमने अपना मंगलसूत्र और दूसरे जेवर बेच दिए। गांव के लोग तब हसते थे, लेकिन अब वो अपनी महिलाओं को हमारे पास काम मांगने भेजते हैं, "शुभांगी बड़े आत्मविश्वास के साथ बताती हैं।

स्वरोजगार के जरिए अपने गांव में उद्ममिता यानी खुद का काम करने की अलख जगाने वाली शुभांगी महाराष्ट्र के वर्धा जिले के साटोडा गांव में रहती है। ये गांव महात्मा गांधी की कर्मभूमि सेवाग्राम से 8 किलोमीटर दूर है। शुभांगी ने अपने घर पर चार हथकरघे लगा रखे हैं। जिन पर वो और गांव की तीन महिलाएं कपड़ा बुनती हैं, जो महाराष्ट्र के कई इलाकों में जाता है।

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"अभी हम ने मुंबई के अस्तपाल के लिए 400 टॉवल का आर्डर दिया है। ऐसे कई दूसरे जगहों से हमें आर्डर मिलते हैं। हम लोग रोजाना 14-15 मीटर कपड़ा बुन लेते हैं।" शुभांगी अपने बढ़ते कारोबार और कपड़े की मांग पर बताती हैं।

शुभांगी के मुताबिक फिलहाल उन्हें हर महीने 18-22 हजार रुपए प्रति माह बच जाते हैं। अपने परिवार का सहारा बनी शुभांगी गांव की तीन महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। आज उनके नाम की चर्चा है। वर्धा के कलेक्टर तक उनकी संघर्ष की तारीफ करते हैं। वर्धा के जिलाधिकारी रहे शैलेश नवल ने अपने कार्यकाल में उन्हें सम्मानित भी किया था। सोटडा के साथ ही दूसरे गांव के लोग उनके काम को देखने आते हैं। उनसे काम की बारीकियां सीखते हैं।

लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था, गरीबी से जूझते परिवार में न तो हथकरघा खरीदने के पैसे थे और ना ही कोई जानकारी। शुभांगी का गांव नागपुर-अमरावती हाईवे पर है। उनके पति विजय सर्जेराव बड़े के परिवार की स्थिति अच्छी नहीं था। वो सब्जियां बेचने का काम करते थे। 1995 में शादी के बाद शुभांगी ने परिवार को गरीबी से निकालने की ठानी। उनके घर में कपास की खेती होती थी, शुभांगी ने इसे रोजगार का जरिया बनाने की सोची। एक संस्थान से ट्रेनिंग ली और शुरु में खुद की कपास से सूत और कपड़ा बनाना शुरु किया, लेकिन वो चल नहीं पाया। थोड़ा बहुत पैसा था वो भी खर्च हो गया। लोग मजाक उड़ाने लगे थे।

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"शुरु में काम चला नहीं तो हताश होने लगी। गांव के लोग भी हंसने लगे थे। एक रात मैं खूब रोई और फिर पूरी रात जागी और हथकरघा चलाकर कपड़े का छोटा टुकड़ा बनाया। जब ये बात गांव के कुछ लोगों को पता चली उन्होंने खूब मजाक उड़ाया कि एक महिला की बस की बात नहीं कि ये अकेले कर पाए। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और जुटी रही। पास की एक सस्था निवेदिता निलयम में फिर से प्रशिक्षण लिया।" शुभांगी बताती हैं।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहती है, "महाराष्ट्र में गांव में चल रहे स्वयं सहायता समूहों के लिए एक योजना था, जिसमें 30 फीसदी लागत सरकार और 70 फीसदी खुद को लगाना होता था। गांव के लोगों ने मना दिया, क्योंकि इसमें ज्यादा पैसा खुद को लगाना था, लेकिन मैंने जिलाधिकारी से मुलाकात की। फिर पैसे का जुगाड़ करने के लिए मंगलसूत्र और जेवर बेच दिए। जिलाधिकारी शैलेश नवल ने बहुत मदद की, उनकी वजह से मैं सफल हो सकी।"


शुभांगी बताती हैं, योजना के मुताबिक 30 फीसदी का चेक सरकार देती थी, लेकिन मैंने पैसे की बजाय जिलाधिकारी से हथकघरा मशीन की मांग की थी, मेरी बात सुनकर वो काफी खुश हुए और बोले मैं पहली ऐसी महिला देखकर रहा हूं।"

इसके बाद शुभांगी अपने हिस्से की लागत का 70 फीसदी डीएम साहब को दिया और उन्होंने हथकरघा मशीन दिलवा दी।

आज शुभांगी का कारोबार चल निकला है। उन्होंने धूमधाम से कुछ साल पहले अपनी बेटी की शादी और बेटा आईटीआई कर रहा है। हथकरघा का काम शुभांगी ने खुद संभाला तो घर की खेती में पति की मदद की। उनके पास चार एकड़ जमीन है, जिसमें एक ट्यूबवेल लगा है। सब्जी बेचने वाले पति अब कई तरफ की फसलें उगाते हैं। कपास के अलावा फूलों की खेती से उनका परिवार अब अच्छा मुनाफा कमा रही हैं।

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