झारखंड की इस आदिम जाति की समस्याएं कभी नहीं बनतीं चुनावी मुद्दा

जमशेदपुर (झारखंड)। जिस सबर बस्ती में आज से पांच साल पहले 25 परिवार रहते थे अब उनकी संख्या पांच बची है। झारखंड में आदिम जाति सबर विलुप्ति के कगार पर है और इनके बारे में सुध लेने की किसी को फुर्सत नहीं है। अगर आपको भारत के गाँव में रहने वाले आख़िरी कतार में खड़े लोगों की असली तस्वीर देखनी है तो इन आदिम जनजातियों से मिलिए आपको पता चलेगा आज भी ये किन हालातों में जीने को मजबूर हैं।

रांची से लगभग 160 किलोमीटर दूर जमशेदपुर के घाटशिला प्रखंड के दारी साईं सबर बस्ती में जब हम पहुंचे तो वहां सरकारी घर तो बने थे लेकिन उनमें रहने वाले लोगों की संख्या गिनी चुनी थी। खाली पड़े घरों को देखकर जब हमने वहां खड़े स्थानीय नागरिक निर्मल चन्द्र सिंह से पूछा तो वो बताने लगे, "इनकी संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है। आज से चार पांच साल पहले इन सभी घरों में लोग रहते थे लेकिन अब गिनती के पांच घरों में ही लोग बचे हैं।" यहाँ रहने वाले लोग पलायन कर गये क्या इस सवाल के जबाब में उनके चेहरे पर निराशा और बेबसी दिखी। उन्होंने बताया, "ज्यादातर लोगों की मौत हो गई है। इनका खानपान अच्छा नहीं है। ये साफ़-सफाई का ध्यान नहीं रखते हैं। यहाँ रहने वाले ज्यादातर लोगों को टीवी है और बच्चे कुपोषित हैं।"


इस बस्ती में रहने वाले लोगों की जीविका का मुख्य जरिया जंगल है। ये सुबह पांच बजे जंगल से पत्ते लकड़ी और झाड़ू बनाने का सामान ले आते हैं। दोपहर में बाजार में बेचते हैं जो पैसा मिलता है उसमें कुछ की शराब पीते और कुछ का तेल नमक ले आते। रोज का कमाना रोज का खाना ऐसी जिन्दगी ये वर्षों से जी रहे हैं पर इनकी बेहतर जिन्दगी के लिए सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जब मेरी नजर इस भीषण गर्मी में लगभग आठ साल के उस बच्चे पर पड़ी जो स्वेटर पहने था। पूंछने पर वहां बैठी निशोदा सबर (55 वर्ष ने बताया), "यही कपड़े हैं उसके पास. जो कपड़े हैं वही पहनेगा बिना कपड़ों के थोड़े रहेगा। इसके पास तो ये कपड़े भी हैं कई लोगों के पास तो ये कपड़े भी नहीं होते।" इस बस्ती में जितने लोगों के पैरों पर हमारी नजर पड़ी किसी के पैर में चप्पल नहीं थी। कपड़े भी न मात्र के थे।

सरकारी आवास में बने घरों की दीवारें भले ही पक्की हों पर उसके अन्दर के हालात बेहद निराशाजनक थे। लेटने के लिए हर घर में कम्बल था जिसे बिछाकर वो लेटते हैं। एक कोने में खाने के कुछ बर्तन, थोड़े बहुत पुराने कपड़े, नमक मिर्च, शीशी में सरसों का थोड़ा तेल ये पूरा सामान कमरे में अस्त व्यस्त था। जब हम मोंगली सबर के (65 वर्ष) में घुसे तो साँस लेना मुश्किल हो रहा था क्योंकि वो जिस अँधेरे कमरे में रहती हैं वहीं से पेशाब की बदबू आ रही थी। स्थिति ये थी कि अगर वो ऐसे ही हालातों में रोज रहती हैं तो उनमे अनगिनत बीमारियाँ होने की पूरी सम्भावना थी।


जब उस बस्ती में रहने वाले लोगों से मैं एक-एक करके मिली और उनके घरों के अन्दर जाकर उनकी स्थिति देखी तो वो वाकई चिंताजनक थी। इनकी अपनी भाषा है जिससे ये बाहरी लोगों से सम्वाद नहीं कर पाते। इस वजह से भी ये समाज की मुख्य धारा से कटे रहते हैं। इस बस्ती में रहने वाले लोगों की समस्याएं हमें पता चल सके इसको समझने के लिए हमने इसी गाँव में रहने वाले निर्मल चन्द्र सिंह की मदद ली जो हमारे सवाल उनसे पूंछते और उनके जबाब हमें बताते। क्योंकि हम एक दूसरे की भाषा नहीं समझ पा रहे थे। रोड पर खड़े जब मेरी नजर एक कुपोषित बच्चे पर पड़ी जो अपनी माँ की गोद में था। उसकी ये हालत देखकर हमने पूंछा इसका इलाज नहीं करवा रहे तो उस बच्चे के पिता लालतू सबर (20 वर्ष) ने कहा, "एक बार डॉ को दिखाया था डॉ ने कहा कोई बीमारी नहीं है इसे।" इस कुपोषित बच्चे के मम्मी पापा दोनों शराब के नशे में थे।

जिन्हें अभी विशेष जनजाति का दर्जा मिला है पहले इन्हें आदिम जनजातियां कहते थे। ये जनजातियां असुर, बिरहोर, बिरजिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, कोरवा सबर, हिल खड़िया, परहिया हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में विशेष जनजाति की आबादी दो लाख 92 हजार है जिसमें सबर की आबादी तीन प्रतिशत ही है। अगर सरकार ने इन्हें विलुप्ति से बचाने के लिए कोई अहम कदम नहीं उठाया तो इन्हें बचाना मुश्किल हो जाएगा।


निर्मल चन्द्र सिंह ने बताया, "शराब पीना इनमें वंशानुगत है। कम उम्र में शादी हो जाती है। खान-पान का ये कोई ध्यान नहीं देते जो कुछ रूखा-सूखा इन्हें मिल जाता वही खाकर अपना पेट भर लेते। अभी हर महीने इन्हें 35 किलो चावल मिल रहा है। ये बाजार से नमक तेल खरीद लेते कभी-कभी आलू ले लेते। जैसे बना पाते वैसे बनाते और खा लेते।" उन्होंने आगे बताया, "अगर सरकार इनपर ध्यान दे तो इनकी असमय होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। इन्हें सबसे ज्यादा रोजगार और शिक्षा की जरूरत है। ये तभी जागरूक होने और इनकी स्थिति बेहतर होगी।"

इनके रोजगार और शिक्षा पर दिया जाए ध्यान तो बच सकती है ये आदिम जनजाति

ये आज भी वैसी ही जिन्दगी जी रहे हैं जैसे वर्षों से जीते आये हैं। निर्मल चन्द्र ने बताया, "इनके लिए कोई भी चुनाव आये जाए किसी भी पार्टी की सरकार बने उससे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ये हर साल वोट देते हैं। पर इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता। ध्यान तब देते जब कोई मरने वाला होता तो डॉ की टीम हाईलाईट होने के लिए आ जाती।" उन्होंने कहा, "इनकी शिक्षा और रोजगार पर अगर ख़ास ध्यान दिया जाए तो इनके रहन-सहन में सुधार हो सकता है। ये समाज की मुख्य धरा से पूरी तरह से कटे हैं पहली तो भाषा समस्या दूसरा जागरूकता का अभाव।"


पब्लिक हेल्थ रिसोर्स की रिपोर्ट के अनुसार 10 लोगों की प्रतिवर्ष हो रही मौत

पब्लिक हेल्थ रिसोर्स नेटवर्क (पीएचआरएन) के द्वारा वर्ष 2017 में किये गये एक शोध में ये निकला है कि एक हजार सबर लोगों में हर साल 10 लोगों की मौत हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार शून्य से पांच वर्ष के सबर समुदाय के 68 प्रतिशत बच्चे अपने सामान्य वजन से कम हैं। क्रोनिक हंगर के कारण 56 प्रतिशत बच्चों में नाटापन की समस्या है और 42 प्रतिशत बच्चों में दुबलेपन की समस्या है। प्रति एक हजार पर 131 लोग बीमार हैं। इस जाति में टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियाँ ज्यादा हैं। 68 प्रतिशत बच्चे कुपोषित पाए गये। ये सर्वे पूर्वी सिंहभूम जिले के डुमरिया प्रखंड 284 सबर परिवारों के बीच किया गया था। झारखंड में कुल सबर की जनसंख्या 8117 है।


नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (एनएफएचएस) के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 32 प्रतिशत महिला और 24 प्रतिशत पुरुष ऐसे हैं जिनका बीएमएस कम है। इसकी मुख्य वजह उचित पोषण न मिलने की वजह से ऐसा होता है। इस आदिम जाति की महिलाएं गरीबी की वजह से केवल चावल खाती हैं।

ये हैं सबर जनजाति

झारखंड की सबसे पुरानी व विशेष संरक्षित जनजातियों में से सबर समुदाय एक है। इनकी संख्या दूसरी जनजातियों की अपेक्षा बहुत कम है। आज भी ज्यादातर परिवारों का जीवन जंगलों और पहाड़ों पर गुजरता है। कुछ जगहों पर सरकार ने इनके लिए सरकारी आवास भी बना दिए हैं जिनमें गिने-चुने लोग ही रहते हैं।

ये भी पढ़ें : आखिर क्यों हैं भारत के आदिवासी कुपोषित

ये भी पढ़ें : 'अगर एक दिन लकड़ी न बिके तो पति और बच्चे भूखे रह जाएंगे'


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top