सौर ऊर्जा आधारित बिजली से झारखंड के आदिवासी गाँवों में रोशनी के साथ मिला आजीविका का नया जरिया

झारखंड के सबसे पिछड़े जिलों में से एक सिमडेगा के आदिवासी गाँवों में बिजली नहीं है। लेकिन, एक सौर परियोजना ने उनके जीवन में रोशनी ला दी है क्योंकि अब 13 गाँवों में बिजली आ गई है और दस और गाँवों में बिजली आ जाएगी।

Manoj ChoudharyManoj Choudhary   28 Jun 2022 10:03 AM GMT

कुरडेग (सिमडेगा), झारखंड। झारखंड के सबसे पिछड़े जिलों में से एक सिमडेगा की जंगली पहाड़ियों में दो आदिवासी गाँवों सरैपनी और बड़ाईक टोली की कच्ची सड़क के दोनों तरफ विशाल, पुराने बरगद के पेड़ हैं।

दो साल पहले तक बरकिबिउरा पंचायत के अंतर्गत आने वाले ये गाँव बाहरी दुनिया से कटे हुए थे, बिजली नहीं थी और सूर्यास्त के बाद क्षेत्र में अंधेरा छा जाता था।

जून 2020 में सोलर पैनल के आने से चीजें बदल गईं। सौर पैनलों, औजारों और अन्य उपकरणों के परिवहन की सुविधा के लिए, ग्रामीणों ने श्रमदान के माध्यम से एक कच्ची सड़क का निर्माण किया। सरैपनी और बारैकटोली के 90 से अधिक आदिवासी घरों को आखिरकार रोशन किया गया।

सरैपनी गाँव में प्रकाश सौर ऊर्जा समिति के अध्यक्ष अदमन बारा ने गाँव कनेक्शन को बताया, "सौ साल से ज्यादा समय तक, जब हमारे पूर्वज इन पहाड़ियों में बसे थे, हम एक पुराने युग में रहते थे जहां बिजली नहीं थी। हमने अपने गाँव में कभी बिजली का बल्ब नहीं देखा था। लेकिन अब हमारे पास दिन-रात 24 घंटे बिजली की आपूर्ति है।"

70 प्रतिशत महिला सदस्यों के साथ ग्रामीणों के जरिए बनाई गई यह समिति, सौर ऊर्जा ग्रिड के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करती है। इस परियोजना की कल्पना ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन (टीआरआईएफ) द्वारा की गई थी, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है, इस कल्पना को टाटा कैपिटल के वित्तीय सहायता और ग्राम ऊर्जा सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (एक ग्रामीण ऊर्जा समाधान कंपनी) के तकनीकी मार्गदर्शन के साथ पूरा किया गया।

सरैपनी गाँव के संजय टोप्पो ने बताया कि सौर ऊर्जा परियोजना से ग्रामीणों के लिए कमाई के अवसर बढ़े हैं। सभी फोटो: मनोज चौधरी

अदमान बारा ने बताया, "हमारा जीवन बेहद कठिन था। अंधेरा होने के बाद महिलाएं खाना नहीं बना पाती थीं, बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। आपात स्थिति में, डिबरी रोशनी का एकमात्र जरिया था। जानवरों के हमले के दौरान परिवार के सदस्यों और अनाज को बचाना मुश्किल था।"

लेकिन अब, सौर ऊर्जा स्थानीय प्राथमिक विद्यालय, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य उप केंद्र, मंदिर और चर्च को पावर सप्लाई कर रही है। कृषि कामकाज में वृद्धि हुई है और इसके साथ ही ग्रामीण परिवारों की आय में भी वृद्धि हुई है।

सरैपनी और बड़ाईक टोली के अलावा, सिमडेगा जिले के कुर्डेग ब्लॉक के 11 और आदिवासी गाँवों को टीआरआईएफ के माइक्रो सोलर पावर ग्रिड परियोजना के तहत विद्युतीकरण किया गया है, इस परियोजना को जून 2020 में शुरू किया गया था।

झारखंड में टीआरआईएफ के निदेशक अशोक कुमार ने गाँव कनेक्शन को बताया, "अब तक, कुरडेग ब्लॉक के 13 गाँवों के 712 परिवार सौर ग्रिड परियोजना से लाभान्वित हुए हैं। हम सिमडेगा और केरसाई ब्लॉक के 512 घरों को कवर करने के लिए 10 और गांवों में परियोजना का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।"

टीआरआईएफ के निदेशक ने बताया, "यह परियोजना राज्य के दूर-दराज के इलाकों में बिजली की आपूर्ति के लिए शुरू की गई थी, और विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों जैसे कोरवा और अन्य को इससे फायदा हुआ है।"

धूप के साथ आती है मुस्कान

सरैपनी गाँव के संजय टोप्पो ने बताया कि सौर ऊर्जा परियोजना से ग्रामीणों के लिए कमाई के अवसर बढ़े हैं, जिनमें से कई ने दुकान खोल ली हैं और वह अब देर शाम तक सामान बेच सकते हैं। संजय टोप्पो बताते हैं, "अब गाँव की महिलाएं धान को संसाधित करने के लिए लंबे समय तक हाथ का इस्तेमाल करने के बजाय मशीनों का उपयोग कर रही हैं। इससे ग्रामीणों के समय और ऊर्जा दोनों की बचत हो रही है और उन्हें कमाई के अवसर मिल रहे हैं।"

उन्होंने बताया, ग्रामीणों के जीवन को आरामदायक बनाने के लिए टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, पंखे और अन्य उत्पाद भी उपलब्ध हैं।

जून 2020 में सोलर पैनल के आने से चीजें बदल गईं। सौर पैनलों, औजारों और अन्य उपकरणों के परिवहन की सुविधा के लिए, ग्रामीणों ने श्रमदान के माध्यम से एक कच्ची सड़क का निर्माण किया।

संजय टोप्पो ने बताया,"पहले किसान अपने खेतों की सिंचाई के लिए भूजल निकालने के लिए डीजल जनरेटर का इस्तेमाल करते थे, जो काफी महंगा था। लेकिन अब अपनी फसलों की सिंचाई के लिए जमीन से पानी निकालने के लिए सस्ते सोलर पंपों का इस्तेमाल कर रहे हैं।"

सोलर पावर प्रोजेक्ट

सौर ऊर्जा परियोजना के बारे में बात करते हुए, कुर्डेग ब्लॉक के टीआरआईएफ ब्लॉक कोऑर्डिनेटर, जावेद सैय्यद ने बताया, "टीआरआईएफ ने प्रत्येक सौर ग्रिड के लिए लगभग 30 से 40 लाख रुपये खर्च किए हैं, जिनकी क्षमता 8 किलोवाट से 15 किलोवाट के बीच है, जो कि गाँव में घरों की संख्या के आधार पर है। हर ग्रिड में बैटरी को रिचार्ज किए बिना लगातार पांच दिनों तक बिजली की आपूर्ति करने की क्षमता है।

ब्लॉक कोऑर्डिनेटर के अनुसार, संबंधित ग्राम समितियों द्वारा एक परिचालक नियुक्त किया गया है जिसे बिजली कनेक्शन शुल्क के माध्यम से उत्पन्न धन से भुगतान किया जाता है। जिस प्लॉट पर बिजली घर है, उसके मालिक को भी उसकी जमीन पट्टे पर देने का भुगतान किया जा रहा है।

सरैपनी और बारैकटोली के 90 से अधिक आदिवासी घरों को आखिरकार रोशन किया गया।

सरैपनी गाँव की प्रकाश सौर ऊर्जा समिति के कोषाध्यक्ष तारामणि तिग्गा ने बताया कि हर परिवार ने बिजली कनेक्शन के लिए 1,000 रुपये दिया है. इसके अलावा, हर परिवार रखरखाव शुल्क के तौर पर 100 रुपये के साथ प्रति यूनिट 10 रुपये मासिक शुल्क का भुगतान करता है। उन्होंने बताया, "समिति के खाते में अब लगभग 1 लाख रुपये हैं और इस पैसे का उपयोग तमाम कार्यों, जैसे ऑपरेटर को वेतन आदि के लिए किया जा रहा है।"

पढ़ाई में मिल रही मदद

सरायपानी में युवा महिलाओं सहित आईटीआई और कॉलेज के कुछ छात्र हैं, जो अपने गाँव में बिजली आने के बाद से कह रहे हैं कि वे अब उज्जवल शौक्षणिक भविष्य के साथ साथ सरकारी नौकरी के भी सपने देख सकते हैं।

एक कॉलेज के छात्र आशेर टोप्पो, जो कभी गाँव में अपने घर से दूर रहते थे क्योंकि वह बिजली नहीं होने के कारण वहाँ पढ़ नहीं सकते थे, उन्होंने ने कहा कि अब ऐसा नहीं है। वह और दूसरे लोग जब तक चाहें देर रात तक पढ़ाई कर सकते हैं।


एक अन्य छात्रा रश्मि तिर्की ने कहा कि झारखंड के प्रत्येक गाँव को सोलर पावर से विद्युतीकृत किया जाना चाहिए क्योंकि यह अगली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करता है।

एक समय था जब कुर्डेग में 10 किलोमीटर दूर स्कूल जाने वाले बच्चे पिछले दिन का बचा हुआ खाना खा कर जाते थे, क्योंकि उनकी मां सुबह के अंधेरे में खाना नहीं बना सकती थीं।

अब और नहीं, अब बच्चे ताज़ा बना नाश्ता करने के बाद खुशी खुशी निकल जाते हैं।

स्कूलों, आंगनबाड़ियों और स्वास्थ्य केंद्रों का विद्युतीकरण

सोलर पावर से विद्युतीकृत हुए बरैकटोली गाँव के परमानंद दास ने बताया कि विद्युतीकरण से गाँव के सभी लोगों को फायदा हुआ है और सरकार को राज्य के हर गाँव में बिजली पहुंचानी चाहिए।

दास ने बताया, "ग्रामीण अब गाँव में विकास गतिविधियों की योजना बनाने में समय बिता रहे हैं। यह उनका समय, पैसा और ऊर्जा को बचा रहा है और समाज में सद्भाव फैला रहा है। समिति की बैठकों और अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए महिलाएं भी अपने घरों से बाहर आ रही हैं।"

बारैकटोली के जिलानी कीरो ने बताया कि बिजली आपूर्ति ने ग्रामीणों को एकजुट किया है. उन्होंने बताया, "प्रत्येक लाभार्थी ग्राम स्तर की मासिक बैठक में हिस्सा लेता है, जहां बिजली आपूर्ति शुल्क संग्रह की मासिक रिपोर्ट पेश करने के अलावा, वे अपने गांव की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अन्य मामलों पर भी चर्चा करते हैं।"


बारैकटोली गाँव की शोभा रानी लकड़ा ने बताया, "2020-21 तक गाँव के स्कूल, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य उपकेंद्र और धार्मिक स्थल बिना बिजली के चल रहे थे, लेकिन अब उनका विद्युतीकरण हो गया है।"

रावण खोटा टोला के रामू कोरवा ने बताया, "अब दिन और रात में कोई फर्क नहीं है, हम 24 घंटे बिजली का आनंद ले रहे हैं और अब हम कीड़ों और जानवरों से महफूज हैं।"

केरेना पम्पा, रावण खोटा स्थित उन्नत प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक गाँव के स्कूल में बिजली आने पर खुशी से झूम उठे हैं। उन्होंने बताया, "यह हाथियों और अन्य जंगली जानवरों को गाँव से दूर रखने में भी मदद करता है, और संग्रहीत धान को जानवरों के नुकसान से बचाता है।"

प्रकाश सौर ऊर्जा समिति के सचिव शिशिर टोप्पो ने बताया कि टीआरआईएफ पांच साल तक सोलर ग्रिड के कामकाज की निगरानी करेगी। उसके बाद, ग्रामीण हर घर से वसूली शुल्क के माध्यम से परियोजना का रखरखाव करेंगे।

(यह कहानी ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन (TRIF) के सहयोग से की गई है।)


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