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चंबल में 550 से ज्यादा डाकुओं के थे सरदार, आज बन गए हैं संत

Ankit ChauhanAnkit Chauhan   4 Dec 2019 10:04 AM GMT

मोडासा (गुजरात)। चंबल में 100 से ज्यादा हत्या के आरोपी और 550 डाकुओं के गैंग के सरदार रहे पूर्व डाकू पंचम सिंह अब अध्यात्म की बातें करते हैं। एक समय एसा था कि वे चंबल घाटी में अपना सिक्का जमा कर बैठे थे, तब पूरी घाटी में पंचमसिंह का खौफ था, सरकार ने एक समय उन्हें पकड़ने के लिए 2 करोड़ का इनाम भी लगाया था।

पंचम सिंह ने 14 साल तक चंबल के बीहड़ों पर राज किया। कत्ल, अपहरण और डकैती के लगभग 300 से ज्यादा केस उनके खिलाफ दर्ज हुए। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में उनका आतंक था, लेकिन गांधीवादी समाजसेवी डॉ सुब्बाराव के संपर्क में आने के बाद वे डाकू पंचम सिंह से संत पंचम भाई बन गए। अब वे ब्रह्मकुमारी आश्रम के माध्यम से लोगों को आध्यात्म पर प्रवचन दे रहे हैं। वे अब तक 500 से ज्यादा जेलों में प्रवचन दे चुके हैं।

पंचम सिंह बताते हैं, "1958 में पंचायत चुनाव की रंजिश में दूसरे पक्ष के लोगों ने उनके साथ बेरहमी से मारपीट की। उनके पिता पंचम सिंह को बैलगाड़ी में अस्पताल ले गए। जब वे वापस गांव लौटे तो फिर दूसरे पक्ष के लोगों ने उन्हें और उनके पिता को पीटा। इसके बाद भी जब न्याय नहीं मिला तो उनके मन में बदला लेने की भावना पैदा हुई और वे चंबल के बीहड़ में चले गए और डकैत बन गए।


माफ हो गई फांसी की सजा

पंचम के कारनामों की फेहरिस्त छोटी नहीं है। कई अपराधों के आरोपी होने के बाद कोर्ट ने उन्हें फांसी की जा सुनाई थी। लेकिन, सात साल की सजा काटने के बाद राष्ट्रपति को आवेदन किया गया और उनकी फांसी की सजा माफ कर दी गई थी।

जेल से बाहर आने के बाद दान कर दिया मकान

गांधीवादी समाजसेवी डॉ. सुब्बाराव के संपर्क में आने के बाद 1972 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के सामने मुरैना जिले के जौरा आश्रम पर पंचम सिंह, भोर सिंह और माधौ सिंह ने सरेंडर किया। 125 से ज्यादा हत्याओं का आरोप होने पर पंचम सिंह, भोर सिंह और माधौ सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन डॉ सुब्बाराव ने राष्ट्रपति से मिलकर आजीवन कारावास में उनकी सजा परिवर्तित कराई। इसके बाद मुंगावली की खुली जेल में वे रहे।

जेल में उनका संपर्क ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुख्य संचालिका दादी प्रकाश से हुआ। उन्हें इंदिरा गांधी ने चुनौती दी थी कि डाकुओं का मन बदल कर दिखाएं। दादीजी से प्रेरित होकर वे संत बन गए। 1980 में जब जेल से बाहर आए तो दो साल बाद ब्रह्मकुमारी आश्रम के लिए करीब 50 लाख रुपए की कीमत का अपना मकान ही दान कर दिया।

कल का डाकू आज का संत

जिसके नाम से कभी चंबल और आसपास के क्षेत्रों के सैकड़ों गांव के लोग कांपते थे, आज वही कुख्यात डाकू संत बन गया है। वह ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संपर्क में आने के बाद आज लोगों को काम, क्रोध, लोभ और मोह माया से दूर रहने की शिक्षा देता है। उस दौर में इंदिरा गांधी ने ब्रह्मकुमारी को डाकुओं का मन बदलवाने की चुनौती दी थी। इसके बाद डाकुओं का मन बदल गया और डाकू योगी बनकर संत जीवन जी रहे हैं।

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