इन परिवारों के कमाई का बेहतर जरिया हैं महुआ के पेड़

झारखंड के जंगलों में इन दिनों ज्यादातर आदिवासी परिवार आपको जंगलों में महुआ बीनते हुए मिलेंगे। ये महुआ के सीजन में पेड़ के हिसाब से एक परिवार चार हजार से लेकर साठ हजार रुपए तक कमा लेते हैं।

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   11 April 2019 11:21 AM GMT

हजारीबाग (झारखंड)। मार्च के आख़िरी सप्ताह से लेकर अप्रैल महीने तक झारखंड के ज्यादातर परिवार आपको जंगल में महुआ बीनते हुए मिलेंगे। एक महीने गिरने वाले इस महुआ से यहाँ का एक परिवार महुआ बेचकर 4000-60000 रुपए कमा लेते हैं। यहाँ की महिलाएं इस महुए का अचार भी बनाती हैं जिसकी दिल्ली और मुंबई में खूब मांग है।

भरी दोपहरी में जंगल में महुआ बीन रही बंसती देवी (32 वर्ष) ने बताया, "इस एक महीने बिलकुल फुर्सत नहीं मिलती है। घर के सभी लोग सुबह चार बजे जंगल आ जाते हैं और शाम के पांच बजे तक महुआ बीनते रहते हैं।" उन्होंने आगे कहा, "हमारे महुआ के एक हजार पेड़ हैं। रोज एक हजार पेड़ से महुआ बीनने में पूरा दिन लग जाता है। हम अपने रिश्तेदारों को भी महुआ बीनने के लिए बुला लेते हैं क्योंकि एक महीने ही कमाई का मौका होता है। पिछले साल हमने 50,000 का महुआ बेचा था और हमारी जेठानी ने 60,000 से ज्यादा का महुआ बेचा था।" कुछ महिलाएं महुए का आचार भी बनाती हैं जिसकी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में खूब मांग रहती है।

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वर्षों से पुश्तैनी तरीके से बंटवारे में आये महुआ के पेड़ के हिसाब से इन आदिवासी परिवारों की आमदनी इस एक महीने के दौरान चार से साठ हजार रुपए तक हो जाती है। महुआ आमदनी का इनके लिए एक ऐसा जरिया है जिसमें लागत नहीं आती सिर्फ मेहनत ही लगती है। एक परिवार में जितने भी सदस्य होते हैं वो सब इन दिनों जंगल में महुआ बीनते ही मिलेंगे। हजारीबाग जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर चुरचू प्रखंड के सरवाहा गांव में 427 घर हैं जिसमें 400 परिवार महुआ बीनते हैं। ये झारखंड का पहला गाँव नहीं है जहाँ इतने ज्यादा लोग महुआ बीनते है बल्कि ये स्थिति यहाँ के लगभग हर गाँव की है जहाँ पर महुआ के पेड़ हैं।

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बसंती देवी जोहार परियोजना के अंतर्गत बनाये गये उत्पादक समूह की सदस्य हैं। यहाँ वर्ष 2018 में 'किसान महिला उत्पादक समूह' बनाया गया जिसमें सखी मंडल की 80 महिलाएं सदस्य हैं। उत्पादक समूह से जुड़ी सीमा देवी (28 वर्ष) ने बताया, "हमारे पास बहुत ज्यादा महुआ के पेड़ नहीं है फिर भी इस एक महीने में 10,000-12,000 रुपए कमा लेती हूँ। इसमें हमें कोई लागत नहीं लगानी पड़ती अगर महुआ पेड़ में आ जाए तो बस मेहनत करनी पड़ती है। जो पेड़ इस साल फूल देता है वो अगली साल फूल नहीं देता है। कई पेड़ ऐसे होते हैं जिसमें हमेशा महुआ आता है।"

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इस महुआ को बेचने के लिए इन्हें कोई बाजार नहीं तलाशनी पड़ती। पहले ये महुआ स्थानीय बाजारों में प्रति किलो 30-35 रुपए में बिक जाता था लेकिन अभी इसका दाम बढ़कर 70-80 रुपए हो गया है। कई बार इसका भाव इससे कम भी रहता है। उत्पादक समूह से जुड़े सीनियर आजीविका कृषक मित्र फेकनलाल महतो (62 वर्ष) बताते हैं, "महुआ से आमदनी करना यहाँ के लोगों का पुश्तैनी काम है। महुआ के सीजन में परिवार का कोई भी सदस्य खाली नहीं मिलेगा। बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं, महिलाएं कोई दूसरा काम नहीं कर पाती। क्योंकि इन्हें लगता है ये सिर्फ एक महीने का ही काम है इसलिए इसमें लापरवाही न करें।"

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स्थानीय स्तर पर ये महुए के कई तरह के उत्पाद भी बनाते हैं। पर ज्यादातर आदिवासी परिवार इसे बाजार में सीधा बेच देते हैं कुछ लोग इसका उपयोग आचार और शराब बनाने में भी करते हैं। महुआ बीन रही फूलेश्वरी देवी (66 वर्ष) इस बार अपनी बहन के घर महुआ बीनने आयी हैं क्योंकि इनकी बहन के भी लगभग 1000 महुए के पेड़ हिस्से में आते हैं। वो बताती हैं, "महुआ का दाम अगर बाजार में कम रहता है तो फिर हम महुआ सस्ते दामों में नहीं बेचते। क्योंकि इसे बीनने में बहुत मेहनत पड़ती है। इसलिए हम इसकी शराब बनाकर बेचते हैं जिसमें अच्छी आमदनी हो जाती है।"

अगर देखा जाए तो झारखंड में जंगलों से निकलने वाले महुआ का उत्पाद बहुत ज्यादा है अगर इसे बड़े स्तर पर अच्छा बाजार मिले तो इनकी आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी।

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