यूपी के इस किसान ने खरबूज-तरबूज की खेती को बनाया कमाई का जरिया

बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। पिछले कुछ वर्षों में खेती का स्वरूप तेजी से बदला है। किसान धान-गेहूं और गन्ने की जगह ऐसी फसलें उगाने लगे हैं जिनमें लागत ज्यादा लगती है तो मुनाफा भी ज्यादा होता है। खरबूत और तरबूजा ऐसी ही ऐक फसल है। 60-90 दिन की इन फसलों को किसानों को एक एकड़ में 50 हजार से एक लाख तक का मुनाफा हो सकता है।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सूरजगंज ब्लॉक के गंगापुर गांव में रहने वाले अश्विनी वर्मा पिछले 4-5 वर्षों से इन फसलों से मुनाफा कमा रहे हैं। वो खेती में लागत कम करने के लिए मल्च और लोटनल विधियों का भी इस्तेमाल करते हैं। ताकि पौधे बेमौसम भी हो सकें और उनमें खरपतवार भी कम हों।

अश्विनी बताते हैं, "जब चार-पांच साल पहले हमने लोटनल और मल्चिंग की सहायता से खेती करना शुरू किया तो लोग तरह-तरह की बातें करते थे और हंसते थे, पता नहीं क्या ये झिल्ली तानकर क्या पैदा करने जा रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे लोगों की सोच बदली और अब हमारे 10 घरों वाले छोटे से गांव में करीब 400 से 500 बीघे तक तरबूज और खरबूज की खेती की जा रही है।"


बाराबंकी जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित गंगापुर गांव के युवा किसान अश्वनी के मुताबिक कुछ साल पहले तक उनके आसपास के गांवों में इस सीजन (फरवरी से मई) तक 99 फीसदी किसान मेंथा उगाते थे लेकिन जब उन्होंने तरबूज-खरबूजे की खेती शुरु की तो उनके देखादेखी तमाम गांवों ये फसल उगाने लगे हैं।

अश्वनी बताते हैं, "इसमें शुरुआत में थोड़ी ज्यादा लागत आती है। एक एकड़ में 40-50 हजार की लागत आ जाती है। लेकिन उत्पादन भी सवा से डेढ़ लाख का हो जाता है। इस तरह प्रति एकड़ किसान एक लाख रुपए तक का शुद्ध मुनाफा कमा लेते हैं। इसका सबसे अच्छा लाभ मुझे ये दिखता है कि ये फसल 60-65 दिन में तैयार हो जाती है इतने कम समय में दूसरी जगह मुझे लाभ नहीं दिखता है।"

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अश्वनी अपनी खेती में कई बातों का ध्यान रखते हैं ताकि नुकसान की गुंजाइश कम रहे। जैसे वो जब खेत में इन फसलों की सीधी बुवाई करते हैं तो कुछ पौधे नर्सरी में भी तैयार कर लेते हैं। "खरबूजे की सीधी बुवाई खेत में करते हैं तो कुछ पेड़ नहीं उगते हैं। उस जगह को मेंनेट करने लिए हम उसी दिन नर्सरी उगा लेते हैं और जहां पौधा नहीं उगता है उसी स्थान पर ये पौधा लगा देते हैं।"

वो नर्सरी भी खेत के एक हिस्से में तैयार करते हैं। पॉलीथीन के छोटे-छोटे बैग में मिट्टी भरकर बीज डाल देते हैं, फिर उसे पॉलीथीन से ढक देते हैं। इससे ये पौधे जल्द तैयार हो जाते हैं।

मल्च की सहायता से खेती करने के गणित को समझाते हुए अश्वनी बताते हैं, "मल्च का फायदा ये है कि गर्मियों में पानी की समस्या रहती है। तरबूज में 8 से 10 सिंचाई करनी पड़ती है, लेकिन मल्च लगाने पर 4-5 सिंचाईयों में तरबूज तैयार हो जाता है। साथ ही खरपतवार भी नहीं जमता है।"


वो आगे बताते हैं, "दूसरा इसका लाभ ये मिला है कि सूर्य से जो हमारी गर्मी प्राप्त होती है, मल्च उसे अंदर तो ले लेती है लेकिन वापस नहीं करती। इससे बाहर बोए गए पौधों की अपेक्षा अंदर वाले पौधे जल्दी तैयार होते हैं। इसके फायदे जानने के लिए किसानों को चाहिए कि वो एक बेड में मल्च लगाकर खेती करें और उसके बराबर में बिना मल्च के। आपको ज्यादा अंतर दिखेगा, मल्च वाले में डेढ़ गुना ज्यादा पैदावार मिलेगी।"

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अश्वनी अपने दूसरे खेत की फसल को दिखाते हुए कहते हैं, "ये पौधा हमारा 20 दिन का हुआ है, लेकिन हमने इसपर हमने लो टनल में लगा रखा था। इस समय बाकी किसान बुवाई कर रहे हैं, जबकि हमारे पौधा 2-3 इंच का हो चुका है। हम हमें फायदा ये होगा कि ये 15 दिन पहले फसल तैयार हो जाएगी, जल्द होने से रेट अच्छा मिलेगा तो हमारा मुनाफा बढ़ेगा।"

वो आगे बताते हैं अगर थोड़ी सावधानी रखें तो ये मल्च अगली फसल में काम आ जाएगी तो हमारी लागत घटेगी।

यहां हैं बाराबंकी


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