हवा में लहराने पर बजती है बस्तर की ये बांसुरी

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला जब भी सुर्खियों में आता है, नक्सलियों की वजह से आता है। लेकिन इसी नारायणपुर में बनी बांस की बांसुरी देश ही नहीं दूसरे कई देशों तक मशहूर हो रही है।

Divendra SinghDivendra Singh   1 March 2019 10:15 AM GMT

नारायणपुर (छत्तीसगढ़)। अभी तक आपने ऐसी बांसुरी देखी होगी, जिसमें मुंह से फूंक मारने पर धुन निकलती है, लेकिन ये बांसुरी बिल्कुल अलग है इसे बजाने के लिए सिर्फ हवा में घुमाना होता है। इस बस्तरिया बांसुरी मांग इटली समेत कई पश्चिमी देशों में बढ़ रही है।

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला जब भी सुर्खियों में आता है, नक्सलियों की वजह से आता है। लेकिन इसी नारायणपुर में बनी बांस की बांसुरी देश ही नहीं दूसरे कई देशों तक मशहूर हो रही है।


नारायणपुर जिले के गढ़ बेंगाल गाँव मनिराम बांस की कई कलाकृतियां बनाते हैं, उसी में से एक ये बांसुरी भी है। मनिराम बताते हैं, "हमारे यहां बनाई गई बांसुरी दूर-दूर तक मशहूर हो रही है, एक जनवरी से 31 जनवरी तक दिल्ली में लगे एक्जिबीशन में ले गए थे बजाकर भी दिखाया, बहुत अच्छी डिमांड है। सारी बांसुरी बिक गई।

एक बांसुरी बनाने में कई घंटे का समय लगता है। बांस काटने-छाटने, उसमें डिजाइन बनाने में काफी समय लगता है। लेकिन उस हिसाब से उसका दाम नहीं मिलता है, एक बांसुरी सौ से तीन सौ रुपए तक बिकती है। पहले बांसुरी में कोई डिजाइन नहीं बनाते थे, लेकिन अब बांस में कलाकारी करके डिजाइन भी बनाते हैं। इससे बाजार में इसका अच्छा दाम मिल जाता है।


गढ़बेंगाल गाँव के शिल्पकार पंडीराम मडावी इसी कला के प्रदर्शन के लिए दो बार इटली और एक बार रूस की भी यात्रा कर चुके हैं। पंडीराम मडावी के बेटे मानसिंह मंडावी बताते हैं, "हम लोग बांस के अलावा लकड़ी का भी काम करते हैं हम लकड़ी का बहुत सामान बनाते हैं, पिता जी दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ ही कई बार विदेश भी गए हैं।"

जादुई बांसुरी की डिमांड न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अधिक है। नई दिल्ली, कोलकाता और मुंबई से अक्सर एक्सपोर्ट हाउस की ओर से इसकी मांग आती है।


भले ही बस्तर में इसकी कीमत न मिलती हो, लेकिन विदेशों में इसे एक हजार रुपए में बेचा जाता है। इटली के मिलान शहर में तो ये बांसुरी हर घर की शोभा है। नई दिल्ली के एक एक्सपोर्ट हाउस ने हाल ही में दो हजार बांसुरी का ऑर्डर दिया है। अभी शिल्प ग्राम में शिल्पी बांसुरी तैयार कर रहे हैं।

अब पहले कारीगर ही बांसुरी बनाने वाले रह गए है। नई पीढ़ी अब बांसुरी बनाने का काम नहीं करना चाहते हैं। मनिराम बताते हैं, "पहले तो हमारे, दादा, दादी लोग करते थे, हमारे बड़े पिता जी लोग, अब काम तो मैं भी सीखा हूं। बांस के और भी लोग हैं, लेकिन वो ध्यान नहीं देते हैं। सब अब कहीं अलग-अलग, कहीं मजदूरी का काम करते हैं और कहीं आउट एरिया में हैं बाहर करते हैं।"

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