शुभ और मंगल की प्रतीक हैं बिहार की पारम्परिक लहठी

बिहार की रहने वाली सभी शादीशुदा महिलाओं के पहनावे में जो एक चीज़ सामान्य है वो है वहां की पारंपरिक लहठी। लहठी बिहार में बनने वाली लाह की चूड़ियों का स्थानीय नाम है जिन्हें विवाहिता महिलायें हमेशा पहने रखती हैं।

मधुबनी। लहठी में रंग भरने के लिए जमुनी अपने हाथों से लाह के टुकड़ों को कोयले की धीमी आंच पर घुमा-घुमा कर पिघलाती हैं। आज तीस जोड़े बना कर तैयार करने हैं उसे।

बिहार की रहने वाली सभी शादीशुदा महिलाओं के पहनावे में जो एक चीज़ सामान्य है वो है वहां की पारंपरिक लहठी। लहठी बिहार में बनने वाली लाह की चूड़ियों का स्थानीय नाम है जिन्हें विवाहिता महिलायें हमेशा पहने रखती हैं। "हमारे यहाँ (बिहार में) लहठी पहन कर ही विवाह-त्यौहार, लहठी से ही सब कुछ होता है। इसको शुद्ध मन जाता है और इसलिए पावन-त्यौहार सब लहठी पहन कर ही होता है। जब तक पति ज़िंदा रहता है, औरतें लहठी ही पहनती हैं। आज हमें तीस जोड़े पूरे करने हैं," झुर्रियों भरे हाथ तेज़ी से चलते हुए जमुनी देवी बताती है।


जमुनी देवी मधुबनी जिले के पंडौल गाँव में अपने बेटे, बहु और पोतियों के साथ रहती हैं और सभी मिलकर लहठी बनाने का काम करते हैं। "बलरामपुर में चपरा बनता है, वहां से फिर मुजफ्फरपुर में आता है, दरभंगा में और मधुबनी में भी आता है। वहीँ से हम लोग लेकर आते हैं और काम जो है न, शुरू करते हैं। इसमें कलर में जो है न, उसमे चपरा मिलाना पड़ता है और फिर पाउडर मिलकर लाह में रंग आता है। ये सब माँ करती है फिर हम लोग उसका चूड़ी काटते हैं और रिंग में बैठाते हैं," राजू, जमुनी देवी के बेटे ने गर्म लाह से चूड़ियों को पतला करके फिर उन्हें गोल आकर देते हुए बताया।


"हम सब मिलकर एक दिन में 30 से 40 जोड़े बना लेते हैं। एक जोड़े में चार से लेकर छः और 12 लहठी तक होते हैं," जमुनी देवी बताती हैं।

वैसे तो पूरे बिहार भर में लाह की रंग बिरंगी लहठियाँ मिल जाएँगी लेकिन इनको बनाने का काम मुजफ्फरपुर के गाँवों के अलावा दरभंगा और मधुबनी के ही कुछ गाँवों में होता है।


उत्तर प्रदेश के कई जिलों में काम कर चुके मधुबनी के रहने वाले साहित्यकार डॉक्टर अजय मिश्र बताते हैं, "लहठी शुभ होने के साथ प्राकृतिक भी है जिस वजह से यह कलाईयों पर किसी भी तरह का दुष्प्रभाव नहीं डालती है। और सरसब पाही की बनी लहठीयां अपने आप में ही ख़ास हैं जो हर खास मौके के लिए अलग-अलग तरह की बनायी जाती हैं। जैसे शादी के लिए तीसी के फूलों की लहठी और माला पारम्परिक तौर पर प्रयोग में लाये जाते हैं। इसके अलावा यह मुजफ्फरपुर और दरभंगा के गाँवों में भी बनाई जाती हैं।"


पूजा भी साथ मिलकर पंडौल में लहठी बनाती है और महीने का दोनों सात से आठ हज़ार कमा लेते हैं। "इनमें सभी साइज आते हैं, मतलब सवा दो, ढाई, दो आना दो, दो-दस.. यही सब होता है। रिंग में फिट करके हम फिर उसे बेलन से सही आकर देते हैं, उसके बाद पोलिश करते हैं। कोई-कोई लहठी 90 रुपये की होती हैं, 80 रुपये की होती है और हमें 5 से 10 रुपये का फायदा हो जाता है हर जोड़े पर," पूजा बताती है।

मधुबनी के ही सरसब पाही गाँव की रौशनआरा बेगम और उनके परिवार द्वारा बनायीं गयीं लहठी हर शादी के घर जाता है। लाह की चमक लिए चटकीली गुलाबी, लाल, हरी लहतियों को देखकर कोई उन्हें खरीदे बिना शायद ही रह पाए।

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