दिव्यांग बच्चों का भविष्य गढ़ने का काम कर रही है, गुजरात की यह महिला

स्कूल तो कई सारे देखे होंगे, हर स्कूल अपने में अलग विशेषता भी समेटे हुए रहता है। लेकिन कुछ स्कूल सभी स्कूलों से इतर कुछ ज्यादा खास होते हैं। ऐसा ही एक अनोखा स्कूल गुजरात अरवल्ली जिले में भी देखने को मिला जहां पर पढ़ने वाले सभी बच्चे दिव्यांग हैं या फिर शारीरिक तौर पर अक्षम

Ankit ChauhanAnkit Chauhan   6 Jun 2019 2:00 PM GMT

अंकित चौहान, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

गुजरात(अरवल्ली)। स्कूल तो कई सारे देखे होंगे, हर स्कूल अपने में अलग विशेषता भी समेटे हुए रहता है। लेकिन कुछ स्कूल सभी स्कूलों से इतर कुछ ज्यादा खास होते हैं। ऐसा ही एक अनोखा स्कूल गुजरात अरवल्ली जिले में भी देखने को मिला जहां पर पढ़ने वाले सभी बच्चे दिव्यांग हैं या फिर शारीरिक तौर पर अक्षम। ये स्कूल अन्य स्कूलों से बिल्कुल अलग है। इस स्कूल के पास न तो कोई आलीशान इमारत है, न ही सरकार से मिलने वाली वाली कोई सुविधा, न ही इस स्कूल में समान्य बच्चे पढ़ने आते हैं।

तीन साल पहले पड़ा था स्कूल का नींव

गुजरात के अरवल्ली जिले में जीवनदीप चाइल्ड स्कूल के नाम के इस स्कूल की नींव आज से तीन साल पहले नीलोफर सुथार नाम की एक महिला ने रखी थी। नीलोफर सुथार ने दिव्यांगो के लिए स्कूल क्यों खोला इसके पीछे की भी कहानी बेहद दिलचस्प है। नीलोफर सुथार का एक भतीजा है जो दिव्यांग है, उसके साथ होने वाले दोहरे व्यव्हार को जब नीलोफर ने देखा तो उसे बेहद दुख हुआ। किसी और के दिव्यांग बच्चों को इस तरह का व्यवहार न झेलना पड़े इसलिए उसने दिव्यांगों के लिए स्कूल खोलने का फैसला लिया।

कई बच्चों में आया बदलाव

निलोफर का कहना है कि "मेरे भतीजे से लोग मिलने से कतराते थे। मैंने सोचा जब मेरे यहां के बच्चे के साथ ये सलूक हो रहा है तो दूसरे के बच्चों के बच्चों के भी साथ होता होगा। दिमाग में आए इस ख्याल ने हिम्मत दिलाई और मैंने ये काम करना शुरू कर दिया।" नीलोफर बताती हैं कि यहां पर आने के बाद बच्चों में काफी बदलाव भी आता हैं। कई बच्चों में देखा गया जो पहले वायलेंट होते थे अब बेहद शांति से पेश आते है। बच्चों के अभिभावको है कि स्कूल आने के बाद उनके बच्चों में काफी बदलाव आया है। वह उठने बैठने का तरीका सीख गए हैं।

7 बच्चों से शुरू हुए स्कूल में अब पढ़ते हैं 44 बच्चे

7 बच्चों से शुरू हुए इस स्कूल में अब 44 बच्चे पढ़ाई करते हैं, पढ़ाई करने वाले सभी बच्चे दिव्यांग हैं। इस स्कूल में बच्चों को पढ़ाई के अलावा कला, फिजियोथेरापी, संगीत जैसी कई प्रकार की एक्टविटी कराई जाती है। बच्चों को भी यहां आना बेहद अच्छा लगता है। उन्हे कई नई बातें जानने को मिलती है। दोहरा व्यवहार नहीं झेलना पड़ता है। शुरूआत में नीलोफर को बच्चे नहीं मिलते थे। वह घर घर जाकर सर्वे करती थी कि किन घरों में दिव्यांग बच्चे रहते थे।उन बच्चों के अभिभावकों से वह उन्हें उन्हें स्कूल भेजनेे के लिए बनाती थी। तब जाकर आज वह कई बच्चों की स्थितियों में सुधार करने मे वह कामयाब हुई।

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गरीब परिवारों के दिव्यांग बच्चों से नहीं लिया जाता कोई शुल्क

इस स्कूल में पढ़ने वाले ज्यादातर गरीब परिवार से हैं, उनकी फीस नीलोफर नहीं लेती हैं। इसके अलावा उन बच्चों के आने जाने का किराया और नाश्ता भी स्कूल की तरफ से दिया जाता हैं। हां जो लोग फीस देने के काबिल हैं उनसे भी कोई फिक्स शुल्क नहीं लिया जाता है। वो भी अपनी इच्छा के अनुसार फीस देकर स्कूल का सहयोग करते हैं। समाज की ओर से उपेक्षित दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल खोलकर, उनको पढ़ाकर उनकी स्थितियों में सुधार कर नीलोफर एक मिसाल पेश कर रही हैं।

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