कोविड-19, घटती आमदनी और एलपीजी की बढ़ती कीमतों के चलते ग्रामीण महिलाएं फिर से धुएं में खाना बनाने को मजबूर, क्या उज्जवला 2.0 से हालात सुधरेंगे?

पांच साल पहले जब उज्ज्वला योजना का पहला चरण शुरू किया गया था, तो लाखों ग्रामीण महिलाओं के लिए इससे एक उम्मीद जगी थी। उन्हें एलपीजी सिलेंडर बांटे गए थे। लेकिन इनमें से अधिकांश महिलाएं प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक ईंधन की तरफ फिर से लौट आई हैं। वह लकड़ी और गोबर के उपलों का इस्तेमाल कर रही हैं। गांव कनेक्शन ने यूपी, एमपी और बिहार के कई गांवों की यात्रा की और उज्जवला योजना का फायदा उठा चुकी कई महिलाओं से बात की। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अगस्त को एक वर्चुअल समारोह में, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) के दूसरे चरण उज्ज्वला 2.0 की शुरूआत की। भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पांच दिन पहले आयोजित इस वर्चुअल इवेंट में, पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में दस महिलाओं को एलपीजी सिलेंडर सौंपे। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के संसाधनों का लाभ सभी नागरिकों तक पहुंचे। योजना का पहला चरण मई 2016 में शुरू किया गया था।

महोबा में समारोह से लगभग 270 किलोमीटर की दूरी पर जहां महिलाओं को गैस चूल्हे के साथ मुफ्त एलपीजी सिलेंडर बांटे गए थे, बाराबंकी के बेलहारा गांव की 35 वर्षीय रेशमा अपने बच्चों के लिए चावल पका रही थी। जमीन पर बैठी रेशमा झुककर चुल्हा जलाने की कोशिश कर रही थीं। उसमें उन्होंने कुछ पॉलीथीन की थैलियां डाली और आग जल उठी। धुंए से उनकी आंखें जल रही थी और उनमें पानी आ गया। 2019 में उज्ज्वला योजना के तहत उन्हें भी एक एलपीजी सिलेंडर, मिला था। जो अब उनकी रसोई के किसी एक गंदे कोने में पड़ा है। रेशमा ने कहा कि सिलेंडर महीनों से खाली है।

रेशमा ने गांव कनेक्शन को बताया, "बहुत परेशान हैं भैया, पूरा महीना अबकी काम नहीं लगा। उधार ले के काम चला रहे। अब गैस देखें, अपना पेट देखें, ये आराम देखें। पैसा ही नहीं है सिलेंडर भरने का।" रेशमा के पति एक दिहाड़ी मजदूर हैं।

घरेलू वायु प्रदूषण के कारण लगभग 40 लाख लोग बीमारी से समय से पहले मर जाते हैं। फोटो: वीरेंद्र सिंह

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में रहने वाली रेशमा प्लास्टिक जलाने और उसके जहरीले धुएं से सेहत को होने वाले नुकसान से अनजान है। उन्होंने बताया कि पिछले पांच महीनों से, कई बार उनके पास इतने पैसे भी नहीं होते कि वह जलाने के लिए एक किलो लकड़ी भी खरीद सके। जिसकी कीमत 10 से 20 रुपये है। तब वह गांव से पॉलीथिन की थैलियां का कचरा इकट्ठा करती हैं ताकि खाना बनाने के लिए उन्हें जला सके।

29 अगस्त को लखनऊ में 14.2 किलोग्राम वजन वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमत 897.50 रुपये थी।

मई 2016 में, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने ग्रामीण और वंचित परिवारों (गरीबी रेखा से नीचे) के लिए 'प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना' शुरुआत की थी।इसका उद्देश्य उन लोगों को रसोई गैस जैसा स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था जो खाना पकाने के लिए पारंपरिक ईंधन मसलन लकड़ी, कोयला, गोबर से बने उपले का इस्तेमाल करते हैं। पारंपरिक ईंधन के धुंए से घर में वायु प्रदूषण होता है। यह ग्रामीण महिलाओं की सेहत के साथ-साथ पर्यावरण पर भी हानिकारक प्रभाव डालता है।

29 अगस्त को लखनऊ में 14.2 किलोग्राम वजन वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमत 897.50 रुपये थी।

यह योजना 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई थी। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, अब तक पूरे भारत में 80,699,686 परिवारों को मुफ्त गैस सिलेंडर आवंटित किए जा चुके हैं। उज्जवला 2.0 के तहत एक करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन के साथ भरा हुआ एक सिलेंडर मुफ्त दिया जा रहा है।

निष्पक्ष तौर पर किए गए कई अध्ययन बताते हैं कि ग्रामीण भारत में इस योजना के तहत जिन महिलाओं को मुफ्त सिलेंडर दिया गया था, वह फिर से प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक ईंधन का इस्तेमाल करने लगी हैं। कोविड-19 महामारी और ग्रामीण भारत में आजीविका के नुकसान से महिलाओं के स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन यानी गैस सिलेंडर तक पहुंच पर सीधा असर पड़ा है।


कोविड-19, लॉकडाउन और आजीविका का नुकसान

मध्य प्रदेश के सतना जिले के छोटे लालपुर गांव में रहने वाली विमला दोहर की उम्र 60 साल है। उनके पति की मृत्यु हो चुकी है।उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया कि पिछले साल (3 अगस्त, 2020) रक्षा बंधन के बाद से उसने अपना सिलेंडर नहीं भरवाया है। जिले में उज्ज्वला योजना के तहत कुल 226,000 परिवारों को एलपीजीसिलेंडर दिए गए थे।

चूल्हे में लकड़ी से आग जलाने के लिए फूंक मारते हुए वह कहती हैं, "मेरे पति अब नहीं रहे। बेटों को भी कोई काम नहीं मिल रहा है। आजकल मजदूरों को कोई पूछ ही नहीं रहा है। आमदनी का और कोई जरिया नहीं है। ऐसे में सिलेंडर भरवाने के बारे में सोचना पागलपन है।"सतना में एक रसोई गैस सिलेंडर को भरवाने पर 885.50 रुपये का खर्च आता है।

2000 के बाद से भारत का ऊर्जा उपयोग दोगुना हो गया है, 80 प्रतिशत मांग अभी भी कोयले, तेल और ठोस बायोमास द्वारा पूरी की जाती है। फोटो: वीरेंद्र सिंह

पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में पाटन जिले के सांकरा गांव की रहने वाली ललिता बघेल ने गांव कनेक्शन को बताया कि वह तीन-चार महीने में एक बार ही सिलेंडरभरवा पाती हैं।

उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "मेरे पति और बेटा दिहाड़ी मजदूर हैं। हमारी कमाई बस इतनी है कि बमुश्किल अपना पेट ही भर पाते हैं। एलपीजी की कीमतें बहुत अधिक हैं। मेहमानों के आने पर ही इसका इस्तेमाल करते हैं ताकि चाय या नाश्ता जल्दी से तैयार किया जा सके। बाकी समय तो चुल्हे पर ही खाना बनता है।"

उनके पड़ोस में रहने वाली मोमिन बाई ने गांव कनेक्शन को बताया कि उसे सिलेंडर भरने के लिए पैसे जुटाने में महीनों लग जाते हैं, इसलिए वह चुल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बनाना पसंद करती है।

छत्तीसगढ़ की ललिता बघेल को लगता है कि एलपीजी सिलेंडरों की कीमत बहुत अधिक है। फोटो: प्रफुल ठाकुर

वह आगे कहती हैं, "अगर सरकार वास्तव में चाहती है कि हम खाना बनाने के लिए गैस का इस्तेमाल करें तो इसके लिए किसी तरह से हमारी आमदनी बढ़ाई जाए या फिर सरकार सिलेंडर भरने का खर्च उठाए।"

कुछ ऐसी ही कहानी बाराबंकी के बेलहारा गांव की 35 वर्षीया रेशमा की है। उनके परिवार में कुल दस सदस्य हैं। वह कहती हैं, "महामारी और पिछले साल मार्च में हुए लॉकडाउन के कारण, हमारी कमाई कम हो गई है। मेरे पति मजदूर हैं। वह चिनाई का काम करते हैं। काम ढूंढ़ने में काफी मुश्किल आ रही है। पैसे नहीं हैं। जिस वजह से मैं पिछले पांच महीनों से अपना सिलेंडर नहीं भरवा पा रही हूं।

रेशमा आगे कहती हैं, "कहीं पैसा कमाने का ज़रिया ही नहीं है, किसी तरह गुज़रा हो रहा बस।"

उज्जवला 2.0 के वर्चुअल लॉन्च के दौरान पीएम मोदी।

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के फाटा गांव के 35 वर्षीय किसान मनोज सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया, "हम खाना पकाने के लिए अब फिर से लकड़ी का इस्तेमाल करने लगे हैं। लाकॉडाउन के बाद से हमने अपना सिलेंडर नहीं भरवाया है। परिवार की महिलाएं लकड़ी लेने के लिए रोजाना कम से कम चार किलोमीटर का सफर तय करती हैं।" सिंह कहते हैं, "जलाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करना मेहनत का काम है। इसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। पहाड़ी इलाकों में एक बड़ा लकड़ी का गट्ठर लेकर जाना जोखिम भरा है, इसलिए महिलाओं को रोजाना बाहर जाना पड़ता है।"

ऐसी गरीब ग्रामीण महिलाओं की संख्या भी काफी ज्यादा हैं जिन्हें अभी तक उज्ज्वला योजना का कोई लाभ नहीं मिला है। सिमरा पंचायत क्षेत्र के सुपौल जिले के राही टोला गांव में लगभग सौ गरीब परिवार आज भी खाना बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं। अधेड़ उम्र की गीता देवी ने गांव कनेक्शन को बताया कि वह पास के एक बाग से जलाने के लिए लकड़ियां इकट्ठा करती हैं।

वह कहती हैं, "उसके लिए गाली भी सुनना पड़ता है।" (बाग के मालिक मुझे गाली देते हैं क्योंकि उन्हें मेरा बगीचे में आना पसंद नहीं है)

उसके विपरीत, पास के नारायणपुर गांव में रहने वाली तीन बच्चों की मां सुनीता देवी को उज्ज्वला योजना के तहत सिलेंडर तो मिला है, लेकिन वह इसे फिर से नहीं भरवा पाई हैं।

वह बताती हैं, "मेरे पति दिल्ली में मजदूरी करते हैं। वह उतना पैसा घर नहीं भेज पा रहे, जितना सिलेंडर को फिर से भरने में लगता है। चूल्हे पर खाना बनाना काफी सस्ता है।"

दुलारी देवी नारायणपुर गांव में शिक्षिका हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को जानकारी दी कि इस योजना में गांव के जिन लोगों को सिलेंडर दिया गया था उसमें से 85 प्रतिशत उन्हें फिर से भरवा पाने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने ईंधन के लिए फिर से लकड़ी जलाना शुरु कर दिया है।

सिलेंडर की आसमान छूती कीमतें

भारत में ऊर्जा की खपत साल 2000 से दोगुनी हो गई है। इसमें से 80 प्रतिशत मांग को अब भी कोयले, तेल और जैव ईंधन से पूरा किया जा रहा है। गांव कनेक्शन पर छपे एक हालियाकॉलम में कहा गया, "भारत में 65 प्रतिशत परिवार ऊर्जा की बहुत ज्यादा किल्लत झेल रहे हैं। इसीलिए ऊर्जा निर्धनता और उससे जुड़ी समस्याओं पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।" लेखक ने लिखा है, "ग्रामीण और शहरी ऊर्जा खपत के बीच भी एक बड़ा अंतर है ... भारत में एक बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी के बीच पर्याप्त बिजली की आपूर्ति और स्वच्छ ऊर्जा ईंधन की कमी है। इस वजह से वह ऐसे ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर हैं जो उनकी सेहत और पर्यावरणदोनों को प्रभावित कर रही है।"


उज्ज्वला योजना इस शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटने और देश में ऊर्जा निर्धनता दूर करने के लिए है।

हालांकि, बड़ी संख्या में वोग्रामीण महिलाएं, जिन्हें उज्ज्वला योजना का लाभ मिला था, पारंपरिक ईंधन यानी लकड़ी और गोबर के उपलेकी तरफ वापस चली गई हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को महामारी का खामियाजा भुगतना पड़ा है। मई 2016 में जब इस योजना को शुरु किया गया था उस समय एक सिलेंडर की कीमत 527 रुपये थी। अब एलपीजीरिफिलसिलेंडर की कीमत बढ़कर 859 रुपये (दोनों कीमतें दिल्ली से हैं) हो गई। यह स्थिति उज्ज्वला 2.0 को शुरु करने के बाद की है। पिछले नौ महीनों में एलपीजी की कीमतों में लगभग 140 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है।

नवंबर, 2020 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक घरेलू एलपीजीसिलेंडर की कीमत 632 रुपये थी और अब 18 अगस्त को बढ़कर यह 897 रुपये हो गई है। सरकार इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को जिम्मेदार बताती है।

बिहार के भागलपुर जिले के भ्रमरपुर गांव में एलपीजी एजेंसी के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया कि गांव में इस योजना का लाभ लेने वालों में से शायद ही कोई सिलेंडर को फिर से भरवाने की स्थिति में होगा।

एलपीजी गैस कनेक्शन के डीलर भी मानते है कि सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण गांव के लोग सिलेंडर नहीं भरवा पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इंडेनगैस सर्विस के फील्ड ऑफिसर सुमित कुमार सोनकर ने गांव कनेक्शन को बताया, 'पिछले साल जब एलपीजी सिलेंडर रिफिलिंग की कीमतें बहुत ज्यादा नहीं थीं, तो लगभग 24 फीसदी सिलेंडर रिफिल हो जाते थे। लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 16 फीसदी रह गया है।" उन्होंने बताया कि जिले में सात लाख एलपीजी गैस कनेक्शन हैं, जिनमें से 2 लाख 25,000उज्ज्वला योजना के तहत आवंटित किए गए हैं।


लेकिन उत्तर प्रदेश के कुछ जिलोंमें इस योजना ने अच्छा काम किया है। सीतापुर जिले की एलपीजी बिक्री प्रबंधक हिना उत्तम ने गांव कनेक्शन को बताया कि 1 मई, 2016 से अब तक जिले में 98 प्रतिशत सिलेंडर की रिफिलिंग दर दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि जिले में योजना के 500,700 लाभार्थी हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के 25 अगस्त के प्रेस बयान के अनुसार, राज्य में कम से कम 20 लाख महिलाओं को इस योजना का लाभ मिला है। प्रेस रिलीज में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हवाले से कहा गया था," साल 2014 से पहले (जब बीजेपी ने केंद्र में सरकार बनाई थी) देश भर में सिलेंडरभरवाने के लिए लोगों की लंबी कतारें लगना आम बात थी। हमने इस देश की माताओं और बहनों को जहरीले धुएं से बचाया है, जिसमें वह खाना बनाने के लिए मजबूर थीं।"

उज्जवला योजना की अड़चनें

कई स्वतंत्र शोध अध्ययनों ने उज्ज्वला योजना के फायदे और समस्याओं का विश्लेषण किया है। नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने नवंबर 2018में एकअध्ययन किया था। 'एक्सेस टू क्लीन कुकिंग एनर्जी एंड इलेक्ट्रिसिटी - सर्वे ऑफ स्टेट्स' नामक एक अध्ययन में कहा गया है:-

"जबकि पीएमयूवाई ने घर की महिलाओं के नाम से कनेक्शन देकर उन्हें सशक्त करने का एक प्रयास किया था। अध्ययन में पाया गया कि केवल एक तिहाई महिलाएं ही एलपीजी भरवाने के संबंध में निर्णय ले पाती हैं। ग्रामीण परिवारों के बीच एलपीजी के निरंतर उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए घरेलू निर्णय लेने और उसमें पुरुषों के वर्चस्व को समझना होगा।

मई 2020 में, राजस्थान विश्वविद्यालय में व्यवसाय प्रशासन विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन, 'वुमन एम्पावरमेंट थ्रू प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) स्कीम इन राजस्थानः अ स्टडी ऑन रुरल हाउस होल्ड इन स्लेक्टिड रीजन' में निष्कर्ष निकाला गया कि सिलेंडर भरवाने में असमर्थता, उपलब्धता की कमी और एलपीजी के संभावित लाभों और खाना पकाने के अन्य ईंधन से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता की कमी के कारण इस स्वच्छ ऊर्जा का निरंतर इस्तेमाल नहीं किया सका है।

राजस्थान विश्वविद्यालय के अध्ययन में कहा गया है, "इसके अलावा, घरेलू स्तर पर महिलाओं के सामने बड़ी संख्या में सामाजिक-आर्थिक मुद्दे और सामाजिक ताना-बाना पीएमयूवाई की प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं।"

उज्ज्वला 2.0 के वर्चुअल लॉन्च पर महोबा की 10 महिलाएं जिन्हें एलपीजी कनेक्शन मिला।

11 दिसंबर, 2019 को योजना पर अपनी ऑडिट रिपोर्ट में, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने पाया कि मार्च 2020 तक आठ करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले योजना के तहत कुल 7.2 करोड़ (72 मिलियन) कनेक्शन जारी किए गए हैं। (90 प्रतिशत लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया है)। इसके अलावा, यह भी पाया गया कि देश में एलपीजी कवरेज मई 2016 में 62 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2019 में 94 प्रतिशत हो गया है।

हालांकि, सीएजी की रिपोर्ट में पाया गया कि गैर-पीएमयूवाई उपभोक्ताओं की तुलना में पीएमयूवाई लाभार्थियों की औसत वार्षिक रिफिल खपत कम रही है, जो योजना के तहत लाभार्थियों द्वारा एलपीजी के निरंतर उपयोग की कमी की ओर इशारा करता है।

इसके अतिरिक्त, 15 जुलाई, 2019 को नेचर एनर्जी जर्नल में प्रकाशित एक अन्य लेख, 'यूजिंग सेल्स डाटा टु एसेस कुकिंग गैस एडेपशन एंड द इंपेक्ट ऑफ इंडियाज उज्ज्वला प्रोग्राम इन रुरल कर्नाटका' में निष्कर्ष निकाला गया कि पीएमयूवाई से जुड़े लाभार्थी काफी कम संख्या में एलपीजी रिफिल कराते हैं। यह संख्या सामान्य ग्रामीण उपभोक्ताओं के मुकाबले आधी से भी कम है।

ग्रामीण कर्नाटक के अध्ययन में कहा गया है, "हम एलपीजी उपभोक्ताओं के नामांकन में तेजी से वृद्धि पाते हैं, लेकिन यह एलपीजी की बिक्री में वृद्धि से मेल नहीं खाता है, यह दर्शाता है कि एलपीजीकी पहुंच होने के बावजूद भी वह प्रदूषणकारी ईंधन के इस्तेमाल से दूर नहीं हो पाए हैं।" शोधकर्ताओं ने नियमित एलपीजीके इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए मध्य में ही नीति संशोधन का सुझाव दिया।

यह भी पाया गया कि ग्रामीणों के बीच इस योजना के बारे में जागरूकता की कमी है। बिहार के सुपौल जिले के राही टोला गांव में 70 वर्षीय अजीता देवी ने गांव कनेक्शन को बताया कि उन्होंने कभी 'उज्ज्वला' के बारे में नहीं सुना। वह कहती हैं, "मैंने इस योजना के बारे में कभी नहीं सुना। मुझे न तो गैस के चूल्हे पर खाना बनाना आता है और न ही मुझे किसी ने सिलेंडर लेने के लिए कहा है। मैं खाना पकाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करती हूं।"

रसोई के धुंए के कारण समय से पहले मरते लोग

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर सालदुनिया भर में करीब 40 लाख लोग जैव ईंधन और मिट्टी के तेल के साथ-साथ प्रदूषणकारी स्टोव का उपयोग करके अकुशल तरीकों से खाना पकाते हैं और घरेलू वायु प्रदूषण के कारण बीमारी से समय से पहले मर जाते हैं।

डब्ल्यूएचओ ने 8 मई, 2018 को प्रकाशित अपनी एकफैक्ट शीट में कहा है, "खाना बनाने से घर में होने वालेधुएं में छोटे कण और अन्य प्रदूषकतत्व होते हैं जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते है, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को धीमा करते हैं और रक्त की ऑक्सीजन-वहन क्षमता को भी कम करते हैं। घरेलू वायु प्रदूषण के कारण जन्म के समय कम वजन, तपेदिक, मोतियाबिंद, नासॉफिरिन्जियल और स्वरयंत्र कैंसर होने के भी प्रमाण मिले हैं।"

उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले की सदर तहसील के दुर्जन खेड़ा गांव की रहने वाली प्रतिमा देवी पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उसने गांव कनेक्शन को बताया। कि वह जानती है कि लकड़ी और गोबर के उपले पर खाना पकाना सेहत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है।


28 वर्षीय प्रतीमा कहती हैं, "हर महीने सिलेंडर भरवा पाना मुश्किल होता है। इसलिए मैं चूल्हे पर खाना बनाती हूं। जब मुझे जल्दी खाना बनाना होता है या फिर कोई मेहमान आते हैं तभी मैं सिलेंडर का इस्तेमाल करती हूं।" वह आगे कहती हैं, "लेकिन चूल्हे पर खाना बनाना आसान नहीं है। मेरी आंखों में तेज जलन होती है।जब भी जलती हुई लकड़ी से बहुत अधिक धुआं निकलता तो आंखों से आंसू बहने लगते हैं। धुएं के कारण बर्तन बहुत गंदे हो जाते हैं और उन्हें साफ करने में बहुत मेहनत लगती है।"

उनकी हालत मिर्जापुर की मरिहान तहसील के पटेहरा गांव की रहने वाली अधेड़ उम्र की आदिवासी गुलाब देवी जैसी ही है। उन्हें अभी तक एलपीजीसिलेंडर नहीं मिला है।

आदिवासी महिला ने गांव कनेक्शन को बताया,"लकड़ी जलाकर खाना पकाने के कारण मुझे अक्सरसिरदर्द और सीने में दर्द कीशिकायत रहती है। मेरी आंखों में दिन भर खुजली रहती है। जंगल से लकड़ियांभी लानीपड़ती हैं। यह एक बहुत ही मुश्किल काम है। मुझे बहुत खांसी होती है और कभी-कभी मेरे पेट में दर्द भी हो जाता है।"

उज्ज्वला योजना में उन ग्रामीण महिलाओं के अंधेरे और खतरनाक जीवन को रोशन करने की काफी संभावनाएं हैं जो खाना पकाने के पारंपरिक ईंधन से होने वाले प्रदूषण को झेलने के लिए मजबूर हैं। सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षणऔर आर्थिक समानता के लिए देश के हर घर को सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा प्रदान करना महत्वपूर्ण है।

यह लेख प्रत्यक्ष श्रीवास्तव ने बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) से वीरेंद्र सिंह, उन्नाव (यूपी) में से सुमित यादव, सीतापुर (यूपी) से मोहित शुक्ला, मिर्जापुर (यूपी) से बृजेंद्रदुबे, सतना (एमपी) से सचिनतुलसा त्रिपाठी, दुर्ग (छत्तीसगढ़) से प्रफुल ठाकुर और सुपोल (बिहार) से राहुल कुमार के सहयोग से लिखा है।

अनुवाद: संघप्रिया मौर्या

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