पानी बर्बाद करने से पहले ये वीडियो जरूर देखिएगा, प्यास बुझाने के लिए इन्हें क्या-क्या करना पड़ता है

सोनभद्र के पड़री गांव में लोग डैम और चुहाड़ का पानी पीने को मजबूर हैं। सालों से यहां पानी की समस्या बरकरार है लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। इस बार लोगों का कहना है कि अगर हमें पानी की सुविधा नहीं मिलेगी तो हम वोट नहीं देंगे।

Bheem kumarBheem kumar   12 April 2019 1:41 PM GMT

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)। गर्मियां आते ही देश में पानी की समस्या बढ़ने लगती है। हाल ही में आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने बताया कि लगभग आधा भारत सूखे की चपेट में है। हर साल भारत के कई इलाके सूखे की चपेट में आ जाते हैं। उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 400 किलोमीटर दूर सोनभद्र जिला है। यहां के म्योरपुर ब्लॉक के पड़री गांव में पानी की समस्या अभी से सामने आने लगी है।

सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज से करीब 120 किमी दूर म्योरपुर ब्लाक के पड़री गांव के बोदराटोला में पानी के लिए लोगों को बहुत परेशान होना पड़ता है। यहां रिहंद डैम बनने से लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।

ये भी पढ़ें- चिंताजनक : यहां सिर्फ 2 फीसदी बचा पीने का पानी

पड़री गांव की कुल आबादी करीब 9 हजार है। इन लोगों के लिए 55 हैंडपंप व 25 सरकारी कुंए हैं पर अप्रैल से हैंडपंप व कुंए सूखने लग जाते हैं। बोदराटोला के करीब 4 सौ लोगों को पहाड़ों के बीच से पत्थरों वाली सड़क पर पैदल चलना पड़ता है। वो सड़क ऐसी है कि उस पर चलने से लोगों का पैर कट सकता है। वहां एम्बुलेंस तक जाने से मना कर देती है। ग्रामीणों को डैम किनारे गड्ढे खोदकर चुहाड़ का पानी पीना पड़ता है। इसके लिए भी उन्हें तपती गर्मी में 1 किमी दूर जाना पड़ता है।

पड़री ग्राम के प्रधान प्रतिनिधि जमुना प्रसाद बताते हैं-

"बोदरा टोला की कुल आबादी लगभग 4 सौ है। इस गांव में अभी सड़क बिजली, पानी तक नहीं पहुंचा है, इसके लिए हमने 4 माह पूर्व में खंड विकास अधिकारी म्योरपुर को प्रस्ताव दिया है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।"

पड़री गांव की निवासी कविता देवी ने कहा, "पानी और सड़क की परेशानी बहुत है। हमारे घर मे बिजली का मीटर लगा है लेकिन अभी कनेक्शन नहीं मिला है। सड़क उबड़-खाबड़ हैं। पानी तो यहां है ही नहीं। हम लोगों को डैम का पानी पीना पड़ता है। हम मांग करते हैं कि हमें शुद्ध पानी और बाकी सारी सुविधाएं मिलें।"

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1 जुलाई 1954 को रिहंद डैम की आधारशिला रखी थी। डैम का उद्घाटन 9 वर्ष बाद 1 जनवरी 1963 को हुआ। रिहंद डैम 15 किमी चौड़ा और 30 किमी लंबा है। डैम के निर्माण के कारण आस-पास रहने वाले ग्रामीणों को वहां से हटना पड़ा। रिहंद डैम बनने के बाद डूब क्षेत्र से निकलकर पड़री गाँव मे बसे ग्रामीणों को अबतक भी मूलभूत सुविधाओं का लाभ नही मिल पाया है।

ये भी पढ़ें- सूखे पर क्या सोचा है, सरकार

वार्ड सदस्य सदानंद ने कहा कि, "यहां पानी की समस्या बहुत पहले से है। हम लोगों को 1960 में विस्थापित कर दिया गया। हम पड़री गांव में आकर बसे लेकिन इस गांव में अभी तक पानी की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है। सिंचाई के लिए हमने कुंआ भी खोदने का प्रयास किया लेकिन करीब 11 फुट खोदने पर हमें पत्थर ही मिले। लगभग 42 फीट खोदने पर पानी मिलने की उम्मीद है। अब इतना गहरा गड्ढा तो हम नहीं खोद पाएंगे तो हम चाहते हैं कि सरकार हमारे लिए पानी की व्यवस्था करे।"

"हम मांग करते हैं कि हमें सभी सुविधाएं मिले। हमने ब्लॉक में वीडियो, ग्राम प्रधान, सेक्रेट्री को कई बार लिखित रूप में दिया है लेकिन अभी तक हमें कोई सुविधा नहीं मिली। हम लोग डैम और चुहाड़ का पानी पीने के लिए मजबूर हैं। इस पानी को पीने से लोग बीमार हो जाते हैं, हमारे यहां इस कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। घर पर बिजली का मीटर लगा तो है लेकिन अभी तक कनेक्शन नहीं है। सड़क को लेकर भी हम लोग कई बार मांग कर चुके हैं लेकिन वो भी अभी तक पूरी नहीं हुई है। कच्ची सड़क है इस कारण हमारे गांव तक एम्बुलेंस भी नहीं आ पाती," - सदानंद आगे कहते हैं।

पड़री गांव के हरिप्रसाद बताते हैं, "पानी की समस्या बहुत भयंकर है। चुहाड़ व डैम का पानी पीना पड़ता है हमें। जब से पैदा हुए हैं तब से यही पानी पीते चले आ रहे हैं। इससे कई लोगों की मौत हो चुकी है। सांसद, विधायक वोट लेने आते हैं और उसके बाद दिखाई नहीं पड़ते। इस बार गांव में पानी नहीं आया तो हम लोग वोट नहीं करेंगे। हम वोट का बहिष्कार करेंगे।"

दसमतिया देवी ने बताया कि उन्हें आवास नहीं मिला। बिजली नहीं है, न ही पक्की सड़क है। उन्हें भी डैम से लाकर पानी पीना पड़ता है और किसी तरह की कोई सुविधा उनके पास नहीं है।

ललिता देवी ने बताया कि यहां पर पानी की बहुत दिक्कत है। वो कहती हैं, "हर बार यहां आकर लोग फोटो खींच कर ले जाते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। हम जब से पैदा हुए हैं तब से लेकर डैम और चुहाड से पानी पीते हैं। इस बार अगर पानी नहीं तो वोट नहीं। हम सब लोग चुनाव का बहिष्कार करेंगे।"

ये भी पढ़ें- पानी के संसाधनों की कमी से हो रही परेशानी, तालाब और कुएं भी पड़े हैं सूखे

बरती देवी ने बताया कि उन्हें डैम का कचरे वाला पानी पीना पड़ता है। वो कहती हैं, "प्रधान से कई बार कहा है लेकिन कुछ नहीं होता है।"

कुसुम देवी ने बताया कि, "प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद हम लोगों को मूल सुविधाएं तक नहीं दिला पाते।"

सुशीला देवी कहती हैं, "हम एक किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं। बच्चों और परिवार के लिए हमें अकेले ही पानी लाना पड़ता है, बहुत तकलीफ होती है। हम चाहते हैं कि हैंडपंप लग जाए।"

रामाधार बताते हैं, "यहां पानी का तकलीफ सबसे ज्यादा है। सरकार ने वादा किया था कि डूब क्षेत्र के लोगों को हर सुविधा देंगे पर हमें कुछ नहीं मिला है। यहां आज हम जैसे लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा और कुछ हो न हो पर पानी तो चाहिए ही।"

उदयभान यादव कहते हैं, "सरकार ने वादा किया था कि पानी, बिजली, आवास, शौचालय ज़रूर देंगे लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं मिला है। हम लोग खेती किसानी करते हैं, उसके लिए भी कोई साधन नहीं है। सुविधा नहीं होने से सिंचाई भी नहीं हो पाती है।"

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top