48 फीसदी किसान परिवार नहीं चाहते उनके बच्चे खेती करें: गांव कनेक्शन सर्वे

खेती और किसानों को लेकर ये आंकड़े परेशान करने वाले हैं सरकार एक तरफ जहां किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात कर रही है वहीं किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं, जानिए क्यों

Arvind Shukla

Arvind Shukla   3 July 2019 5:37 AM GMT

देश का बजट पेश होने में कुछ समय बाकी है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई को वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए पूर्ण बजट ( budget 2019 ) पेश करेंगी। संसद के संयुक्त संत्र में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा था कि सरकार खेती में बेहतर उत्पादन के लिए 25 लाख करोड़ के निवेश की योजना बना रहा है। हर वर्ग की तरह भारत के आम किसानों को नई सरकार से बेहतरी की उम्मीद है। इस दौरान ये समझना भी जरुरी है कि भारत का किसान किस हाल में है और क्या उसकी मांगे हैं। गांव कनेक्शन सर्वे की ये ख़बर इसी पर केंद्रित है।

अरविंद शुक्ला /स्वाती सुभेदार, गांव कनेक्शन

लखनऊ। भारत के लगभग आधे किसान नहीं चाहते कि उनकी आने वाली पीढ़ियां खेती करें। किसानों की बड़ी संख्या रोजगार के नाम पर खेती के अलावा दूसरे विकल्प खोज रहे हैं। देश में 48 फीसदी किसान परिवार नहीं चाहते कि उनकी आने वाली पीढ़ी खेती करे। ये बात गांव कनेक्शन के सर्वे में निकल कर आई है। गांव कनेक्शन सर्वे के इन आंकड़ों पर गौर करने की जरुरत इसलिए भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि एक तरफ सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे दोहरा रही है, दूसरी तरफ खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। सर्वे में कई जगह किसानों ने ये भी कहा कि उन्हें नरेंद्र मोदी (Narendra Modi Sarkar) सरकार के आम बजट Budget 2019 से काफी उम्मीदे भी हैं।

गांव कनेक्शन ने मई महीने में देश के 19 राज्यों में 18 हजार से ज्यादा लोगों के बीच सर्वे किया। सर्वे में ज्यादातर किसानों ने बढ़ती लागत, फसल जोखिम, बाजार में अच्छे रेट का ना मिलना और पानी (सिंचाई) की समस्या को किसानों की राह की बाधा बताया। गांव कनेक्शन ने सर्वे के साथ-साथ हजारों किसानों, उनके परिजनों से खेती की समस्याओं को लेकर विस्तार से बात भी की। भारत की जनगणना (2011) के मुताबिक देश में किसान (14.5 करोड़) और खेतिहर मजदूरों की संख्या करीब 27 करोड़ है। लेकिन खेती पर निर्भरता की बात करें तो करीब 60 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से इससे जुड़े हैं।

48 फीसदी किसान परिवार नहीं चाहते उनके बच्चे करें खेती

सर्वे में किसानों से सवाल किया गया था कि क्या वो चाहते हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ियां खेती करें? इसके जवाब में 48 फीसदी लोगों ने कहा हम नही चाहते कि हमारी आने वाली पीढ़ी खेती करे। जबकि इस दौरान 13.9 फीसदी ने लोगों कहा कि वो चाहते हैं कि उनके बच्चे खेती करें, लेकिन बच्चे नहीं चाहते। इस दौरान 38 फीसदी लोगों ने कहा कि वो (किसान) और उनके बच्चे दोनों चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी खेती करे। चार्ट 1 देखें- पिछले कुछ वर्षों में किसानों की लगातार घटती संख्या, शहरों की तरफ पलायन भी खेती में कम होती दिलचस्पी का इशारा करते हैं।


खेती की जगह मजदूरी में ज्यादा फायदा देख रहे कई राज्यों में किसान

देश के प्रख्यात खाद्य और निर्यात नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भारत में किसानों की घटती संख्या पर कहते हैं, " किसान खेती छोड़ नहीं रहे, उन्हें साजिशन खेती छोड़ने पर विवश किया है। सरकार और जानकारों का मानना है कि आर्थिक विकास के लिए लोगों का खेती से निकाला जाना बहुत जरुरी है। विश्व बैंक ने 1996 में कही कहा था कि भारत के 40 फीसदी लोगों को खेती से निकालना होगा। मनमोहन सिंह से लेकर पी चिदंबरम (वित्तमंत्री रहते) तक भी कहते रहे हैं कि लोगों को खेती से बाहर निकाला जाए।"

हरियाणा के हिसार जिले में राजपुरा गांव के रणधीर सिंह (65 वर्ष) दो एकड़ जमीन के मालिक हैं, लेकिन दो साल से अपने खेतों की तरफ नहीं गए। उनके बच्चे खेती छोड़कर मजदूरी करते हैं। रणधीर सिंह बताते हैं, "खेती में सिर्फ साल भर खाने का ही अनाज होता था, और सभी लोग उसी में लगे रहते थे, कोई फायदा नहीं था। अब एक बेटा बिजली का काम (मैकेनिक) है और दूसरा मजदूरी करता है। इसमें ज्यादा फायदा है।"

पंजाब को अन्न का कटोरा कहा जाता है। यहां के किसानों की औसत आय देश के अन्य किसानों से ज्यादा है लेकिन वहां भी किसान परेशान हैं। मोहाली पिंड रायपुर कला गांव के सुखदेव सिंह ने 10 साल पहले अपनी खेती बेच दी। "खेती में कुछ बचता नहीं था , इसलिए छोड़ दिया। पांच एकड़ जमीन थी, जिसे बेचकर दूध का काम शुरु कर दिया। मेरे तीन बच्चे हैं, उन्हें नौकरी नहीं मिली तो वो डेयरी का काम कर रहे हैं।"

रणधीर सिंह और सुखदेव की तरह करोड़ों किसान खेती से दूर हो रहे, जिसकी बड़ी वजह किसानों की घटती आमदनी है। आर्थिक सर्वेक्षण (2016) के मुताबिक देश के 17 राज्यों यानि आधे से ज्यादा भारत में किसानों की वार्षिक औसत आय मात्र 20,000 रुपए है यानि सिर्फ 1,700 रुपए महीना है। आर्थिक सर्वेक्षण ये भी कहता है कि भारत के गांवों में कृषि संबंधित रोजगार जो 1990 में 61 फीसदी था, जो 2014 में 47 फीसदी बचा। क्योंकि गांवों में कृषि से इतर काम के अवसरों की कमी है। इस वजह से किसानों को कमाई के अवसर कम मिलते हैं, जबकि इसी समय के दौरान शहर और कस्बों में काम के अवसर बढ़े हैं।

खेती में क्लाइमेट चेंज के प्रभाव पर अंग्रेजी में खबर यहां पढ़ें- Climate change is the biggest challenge in farming: Gaon Connection Survey



ऑर्गेनाइजेश फॉर इकनामिक कॉपरेशन एंड डेलवमेंट (ओएसडीसी) की जुलाई 2018 में आई रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो दशकों में सेल्फ एम्पलाई वर्कर (किसान) कम हो गए हैं और हैं और कैजुअल वर्कर यानि मजदूर बढ़ गए हैं क्योंकि बहुत सारे कृषि उत्पादों को बाजार में अच्छा भाव नहीं मिल पाता है। किसान का मुनाफा लगातार कम होता जा रहा है।

देविंदर शर्मा, नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में आई स्किल इंडिया की पॉलिसी का हवाला देते हुए कहते हैं, "नेशनल स्किल पॉलिसी का डाक्यूमेंट देखें उसमें लिखा है कि हम खेती पर आधारित लोगों को 2022 तक 57 फीसदी से घटाकर 38 फीसदी पर लाएंगे।'

पिछले कई दशक किसानों की आवाज़ उठा रहे स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव गांव कनेक्शन से कहते हैं, "किसानी मुनाफे का धंधा नहीं है और दुनिया की जो भी चीज मुनाफा का धंधा नहीं है उसमें कोई क्यों जुड़ना चाहेगा, दूसरा उसे सांस्कृतिक आत्मसम्मान भी नहीं मिल रहा। ये किसान का दोष नहीं, जिस परिस्थिति में देश में किसानी की जा रही उसका दोष है।"

नेशनल सैंपल सर्वे की पिरियोजिक लेबर फोर्स सर्विस 2017-18 की रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 से 2017-18 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में 3.2 करोड़ अनियमित श्रमिकों ने अपना रोजगार खोया इनमें से मोटे तौर पर तीन करोड़ कृषि श्रमिक बताए जाते हैं। रिपोर्ट बताती है कि कृषि में रोजगार की उपलब्धता में 40 फीसदी की कमी हुई है। ये वो दौर है जब अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी ने अपने स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया-2019 में कहा कि 2016 से 2018 के बीच 50 लाख लोगों ने अपना रोजगार खोया। यानि शहरों जब शहरों में रोजगार की कमी है कृषि क्षेत्र में मजदूरों की संख्या घटी है।

हो सकता है अर्थशास्त्री इसे आर्थिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत माने लेकिन किसानों के पैरोकार और जानकार इस पर सवाल उठा रहे। खेती से किसानों को निकाला जाना ही भारत की अर्थव्यवस्था के लिए हितकारी है, इस सोच को ही जानकार आत्मघाती बताते हैं।

"सबसे पहले तो हमें इस मानसिकता से मुक्त होना होगा कि यूरोप में जो किसानों के साथ वो भारत में भी हो। यानि कि किसानों को किसानी छोड़नी पड़ेगी, इस देश में 8-10 फीसदी लोग ही किसान बचे, इस मानसिकता से मुक्त होने पर ही खेती से बच पाएंगे।" योगेंद्र यादव कहते हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी वर्कफोर्स (कार्य कुशलता वाले युवा) वाले देश में बेरोजगारी बड़ी समस्या है ज्यादातर किसान कोई विकल्प न होने के चलते खेती के पारंपरिक पेशे में लगे हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले खेती की आमदनी कई दशकों से नहीं बढ़ी है। ओईसीडी ( OECD) की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों से किसान की आमदनी फ्रोजन है यानि स्थिर है। अगर फसल के दाम बढ़े हैं तो इसके अनुपात में लागत ज्यादा बढ़ी है। किसान और दूसरे क्षेत्र की कमाई, और सरकारों ने कैसे देश की कृषि को बढ़ाया है उसके समझने के लिए 1970 से अब 2015 तक खेती और बाकी चीजों की महंगाई के अंतर से समझते हैं।

1970 में 76 में गेहूं प्रति कुंतल था जो 45 साल बाद 1450 रुपए कुंतल हुआ जबकि इस दौरान स्कूल चपराई की सैलरी 280 से 300 गुना बढ गई। सरकारी मुलाजिम की सैलरी 120-150 फीसदी सैलरी बढ़ी। जबकि इन अनुपात में गेहूं धान का रेट सिर्फ 19 गुना बढ़ा। (रेट के अनुपात में)

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, "सरकारी नौकरियों की बढ़ी सैलरी के अनुपात में ही गेहूं की कीमत भी होनी चाहिए थी, चलिए 150-180 नहीं अगर 100 गुना भी महंगाई बढ़ी होती तो गेहूं कम से कम 7600 रुपए कुंतल होना चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, किसान को मिले सिर्फ 1450 रुपए।"

यानि गेहूं धान से होने वाली किसान की आमदनी बढ़ी 19 गुना जबकि सरकारी मुलाजिमों के भत्ते और तनख्वाह बढ़ी 180-280 गुणा तक। देविंदर शर्मा आगे कहते हैं, "किसानों का कर्ज माफ करने, एमएसपी बढ़ाने (MSP) , किसानों को छूट देने पर हंगामा होता है और कहा जाता है कि फिस्कल डेफिसिट fiscal deficit बढ़ेगा। सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा, देश की आर्थिक तरक्की रुकेगी लेकिन यही सब छूट कॉरपोरेट को आसानी मिलती हैं, क्योंकि भारत आर्थिक ढांचा ही ऐसे खड़ा किया गया है जिसमें माना जाता है कि उद्योग (Industry) और आधार भूत संरचना (infrastructure) ही कमाई करने वाली गतिविधियां हैं, खेती से कमाई( Farm income ) नहीं होती।"

2001 में हुई भारत की जनगणना के मुताबिक देश में 127,312,831 किसान थे जो 2011 घटकर 118,708000 बचे। इस दौरान मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। किसान खेती छोड़कर खेतिहर मजदूर बनने में ज्यादा फायदा देख रहे हैं। जनगणना के इन्हीं आंकड़ों के अनुसार 2001 खेतिहर मजदूरों की संख्या 106,775,330 थी जो 2011 में बढ़कर 144,388,00 हो गई। इन 10 वर्षों में 86 लाख किसानों ने खेती छोड़ दी थी। यानि किसान 7.1 फीसदी कम हो गए थे, जबकि कृषि मजदूर 3.5 फीसदी बढ़ गए थे। नीचे चार्ट देखें

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"खेती की बढ़ती लागत किसानों की पहली बड़ी समस्या है। मजदूरों की कमी दूसरी, गांव के मजदूर शहर जा रहे। यहां (खेत में) करीब 200 रुपए की दिहाड़ी मिलती है जबकि शहर में उसे एक दिन के 300-400 रुपए कम से कम मिलते हैं। इसलिए वो नजदीकी शहर चले जाते हैं।' यूपी में बाराबंकी जिले में गड़िया बाजार गांव के किसान खेती की समस्याएं गिनाते हैं। ओएसडीसी की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते खर्च के चलती ही हजारों छोटे किसानों ने जमीन बेच दी या दूसरा रोजगार अपना लिया।

आंकड़ों के मुताबिक भारत के करीब 57 फीसदी यानी 60 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कृषि संकट से गुजर रही है। विश्व बैंक के मुताबिक भारत शहरीकरण की लहर से जूझ रहा है और लगभग एक करोड़ लोग हर साल शहर और कस्बों की तरफ रुख कर रहे हैं। विश्व बैंक ने इसे इस सदी का विशालतम ग्रामीण और शहरी पलायन कहा है।

महंगाई को कम रखना है तो किसानों के उत्पाद को सस्ता रखना होगा। रिजर्व बैंक की माइक्रो पॉलिसी कहती है कि महंगाई को 4 फीसदी से ज्यादा नहीं होने देना है। लेकिन ताकि खाने पीने की चीजें महंगी न हो जाएं। और उद्योग को सस्ता कच्चा माल भी देना है। देविंदर शर्मा आगे जोड़ते हैं, " मैं अक्सर कहता हूं, " एग्रीक्लचर बीइंग सेक्रीफाइड टू कीप दि इकनॉमिक रिफॉर्म अलाइव।"

फसल का दाम का सीधा कनेक्शन किसान की आमदनी से है। इसी सर्वे के एक सवाल खेती सुधारने के लिए क्या कदम उठाएं जाए के जवाब में 41 फीसदी लोगों ने कहा कि बेहतर सिंचाई सुविधा होनी चाहिए, 29.5 फीसदी ने कहा फसलों के अच्छे दाम मिलने चाहिए जबकि 19.9 फीसदी लोगों ने सस्ते खाद बीज की हिमायत की वहीं 9.6 फीसदी लोगों ने सस्ते डीजल को विकल्प बताया।

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2010 के बाद किसानों की दशा को लेकर देश में खूब हंगामा मचा। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनावों से पहले किसानों की दशा और आमदनी को बड़ा मुद्दा बनाया और चुनावी घोषणापत्र में महंगाई दोगुनी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारियों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देना का वादा कर सत्ता आई।

2016 में किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए 8 सदस्यीय इंटर मिनिस्ट्रियल कमेटी की गठन हुआ। केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव अशोक दलवाई इसके अध्यक्ष बनाए गए। उन्होंने 14 वैल्यूम में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें 2015-16 को आधार मानकर कहा कि किसान की आय राष्ट्रीय स्तर पर 96,703 रुपए वार्षिक है, उस दौरान यानि 2015-16 में 172694 होनी चाहिए थी, इस इस अनुपात में 2022 तक किसान की वार्षिक आय 242998 रुपए होनी चाहिए।

कमेटी ने कहा कि एक किसान की औसत आय (जुलाई 2012-जून 2013 तक ) 6426 रुपए थे जबकि खर्च उसका मासिक खर्च 6223 रुपए है। यानि किसान के पास महज कुछ रुपए बचे हैँ। इस समिति ने एमएसपी बढाने समेत कई सुझाव भी दिए थे लेकिन वो कुछ को छोड़कर बाकी को अमल में नहीं लाया गया। हालांकि रिपोर्ट ने ये भी कहा कि एमएसपी बढ़ाने से से ही किसानों की आमदनी बढ़ जाएगी और उसके अच्छे परिणाम आएंगे ऐसा जरुरी नहीं है।

2016 के बाद किसानों की आय में कितनी बढ़ोतरी हुई है इस पर कोई रिपोर्ट तो नहीं आयी है। 2017 में नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी तभी हो सकती है जब कृषि क्षेत्र का विकास 10.4 फीसदी की दर से होगा।

किसानों की आय पर बात करने पर जाने माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी कहते हैं, "जिस कृषि विकास दर की बात अभी की जा रही मतलब 10.4 फीसदी, वो तो बहुत पुरानी हो चुकी है। देश में कृषि विकास की दर इससे ज्यादा तो दो साल पहले ही होनी चाहिए थी। ऐसे में किसानों की आय दोगुनी तभी संभव है जब इस समय ही 13 फीसदी कृषि विकास दर होती, जो कि 2030 से पहले तो होता नहीं दिख रहा। ऐसे में किसानों के लिए अच्छे दिनों तो नहीं आये हैं।"

खुद सरकार का एक धड़ा ये भी कहता है कि कृषि क्षेत्र में क्रांति लाए बिना देश 9-10 फीसदी की आर्थिक वृद्धि हासिल नहीं कर सकता है। पिछले दिनों नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अमिताभ कांत ने कहा कि कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की जरुरत है। देश की 50 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है। यदि भारत को अगले 30 साल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 9 से 10 फीसदी की वृद्धि हासिल करनी है तो यह कृषि क्षेत्र में क्रांति लाये बिना नहीं हो सकता है।

एग्री बिजनेस मामलों के जानकार कमल शर्मा दूसरी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। कमल कहते हैं "सितंबर 2018 में केंद्र सरकार ने महंगाई जो आंकड़े पेश किये थे वो बेहद चिंताजनक हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत की थोक और खुदरा महंगाई क्रमश: 3.8 और 2.2 प्रतिशत थी। महंगाई की यह दर 18 महीनों में सबसे कम थी। इसका असर किसानों पर पड़ा, क्योंकि जब बाजार में कीमत ही कम होगी तो किसानों को उपज का सही दाम कैसे मिलेगा।"

ओईसीडी-आईसीआरआईईआर ने एक साझा रिपोर्ट में ये भी कहा कि 2000 से 20174 के फसल और कृषि उत्पादों के कम मूल्य के चलते किसानों को 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। देविंदर शर्मा अपने ब्लॉग में लिखते हैं, अगर किसी दूसरे क्षेत्र में इतना बड़ा नुकसान हुआ होता तो वो पूरी तरह ध्वस्त हो जाता। लेकिन ये भी सत्य है कि कृषि संकट अब चरम पर है।

परंपरागत किसानों के सामने एक बड़ी समस्या बिखरते परिवारों की है। बंटवारे के चलते खेत छोटे हो रहे। यूपी के किसान पंकज शुक्ला बताते हैं, "किसी के पास 20 बीघे जमीन थी, अब उसके पास 4-5 लड़के हो गए तो उसके पास 4-5 बीघे जमीन आई। इतने खेत के लिए क्या वो पंपिग सेट खरीदे और क्या ट्रैक्टर खरीदे। मजबूरी में वो खेती बटाई पर देकर वो दूसरा काम शुरु कर देता है।

सरकार के पांचवें साल में चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि की शुरुआत कर 2 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को 6000 रुपए साल की शुरुआत की। माना जा रहा है, लोकसभा चुनाव में सम्मान निधि के 2000 रुपए की पहली किस्त ने अहम रोल निभाया। जिसके बाद अब हर बिना शर्त हर किसान को साल में 6 हजार रुपए देने की बात चली है। इसी तरह आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ओडिशा में कुछ शर्तों के साथ किसानों जोत के आधार पर निश्चित रकम दी जाती है। कृषि जानकार इसे अच्छी पहल मानते हैं। उनका ये भी मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में ये रकम बढ़ सकती है।

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इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए क्‍लिक करें - 48% farmers don't want the next generation to take up farming: Gaon Connection survey

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