बजट और किसान: खेती की बंजर जमीन को कितना सींच पाएगा ये बजट?

बजट और किसान: खेती की बंजर जमीन को कितना सींच पाएगा ये बजट?

Mithilesh Dubey

Mithilesh Dubey   4 July 2019 7:15 AM GMT

लखनऊ। कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए आज सबसे ज्यादा जरूरी क्या है? कृषि प्रधान देश में लंबे समय से इस पर विमर्श हो रहा है। 5 जुलाई को जब मोदी सरकार अपना बजट पेश करेगी तो देश के लगभग साढ़े 14 करोड़ किसान भी सरकार से उम्मीद करेंगे कि सरकार उनकी समस्याओं की सुध लेगी।

लेकिन सवाल अब भी यही है कि आज किसानों की नजर में उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है? यह सवाल जब गांव कनेक्शन ने अपने सर्वे के दौरान 19 राज्यों के 18,267 लोगों से पूछा तब जो जवाब मिला वो चौंकाने वाला रहा।

41 फीसदी लोगों का मानना है अच्छी सिंचाई व्यवस्था आज किसानों की सबसे बड़ी जरूरत है। 29.5 फीसदी लोगों ने यह भी कहा कि फसल की सही कीमत मिले तो भी कृषि सेक्टर में सुधार आ सकती है। 19.9 फीसदी का कहना है कि सस्ते बीज और खाद से भी खेती की व्यवस्था में सुधार आ सकती है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार, भारत में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर कृषि होती है। इसमें से 52 फीसदी हिस्सा अनियमित सिंचाई और बारिश पर निर्भर है।

भारत में 52 फीसदी से ज्यादा खेती सीधे बारिश के पानी पर निर्भर है। यानि इस ओर और ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है। साल 2015 में मोदी सरकार ने पीएम कृषि सिंचाई योजना शुरु की थी। जिसके तहत पांच सालों के लिए 50 हजार करोड़ का बजट आवांटित था लेकिन सरयू सिंचाई परियोजनाएं अब भी अधूरी हैं।

पिछले साल एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हर खेत को पानी पहुंचे, इसके लिए 50,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ नहरों और बांधों पर काम चल रहा है। इसके साथ पानी का खेती के कामों में उचित उपयोग हो, ड्रिप सिंचाई की तकनीक को चार सालों के अंदर ही 26.87 लाख हेक्टेयर खेतों तक पहुंचा दिया गया है।


लेकिन गांव कनेक्शन के सर्वे में जो रिपोर्ट निकलकर सामने आ रही है उसके अनुसार किसानों के लिए आज भी सिंचाई सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। जमीन पर हालात अनुमान से कहीं बदतर हैं। महाराष्ट्र में खेत तालाब योजना पूरी पैसे की बर्बादी साबित हुई है। इसलिए पानी बचाने के लिए मौलिक योजनाएं बनानी होंगी।

नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि सरकार खेती के विकास के लिए 25 लाख करोड़ के निवेश की योजना बना रही है। इसका बड़ा हिस्सा माइक्रो इरिगेशन को जाएगा।

बिहार के जिला सिवान के गांव मराची के किसान अवधेश कुमार कहते हैं, "नदी सूख रही है, तालाबों में पानी बिल्कुल नहीं है। बहुत से किसान इस कारण खेती भी छोड़ रहे हैं। सरकार को चाहिए कि ट्यूबवेल और कुओं की संख्या बढ़ाई जाए ताकि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।"

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के रिसर्च फेलो ओम प्रकाश कहते हैं, "सिंचाई की दिक्कत तो बहुत हो रही है। महाराष्ट्र में तो सूखा ही पड़ गया है। सरकार भी कुछ कर नहीं पा रही है। महाराष्ट्र की बात करें तो वहां सिंचाई व्यवस्था ठीक करने के लिए सरकार ने जो भी प्रयास किये थे सब असफल रहे।"

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ओम प्रकाश आगे कहते हैं "जब बारिश होनी चाहिए तब होती नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे अपनी फसल को लगाएं कब। अनियमित बारिश के कारण सिंचाई की व्यवस्था और खराब हुई है।"

भारत के पास अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा खेतिहर जमीन है। नेशनल मास्टर की रिपोर्ट के अनुसार 2005 तक भारत के पास 159.65 मिलियन हेक्टेयर जमीन खेती के लायक थी, जबकि अमेरिका के पास 174.45 मिलियिन हेक्टेयर खेतिहर जमीन है।

वर्ल्ड बैंक के अनुसार वर्ष 1960 में देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान 44.313 फीसदी था। इससे बेहतर स्थिति दो बार बनी। 1967 में देश की अर्थव्यवस्था में योगदान 42.768 फीसदी और 1972 में 41.162 फीसदी रहा।

वर्ष 1972 तक स्थिति उतार-चढ़ाव वाली रही। लेकिन इसके बाद से हालत बिगड़ते गये। 2017 में आई रिपोर्ट के अनुसार ये गिरावट गिरते-गिरते 15.619 फीसदी तक पहुंच गई।


2010-11 की कृषि गणना के अनुसार भारत में कुल सिंचित क्षेत्र 6.47 करोड़ हेक्टेयर का है। इसमें से सबसे ज्यादा 45 प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई ट्यूबवेल से होती है जिसके बाद नहरों और कुओं का स्थान है।

पुरानी रिपोर्टस् को देखे तो सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए 1950-51 से ही नहरों का सिंचित क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। तब नहरों से सिंचित होने वाला रकबा 83 लाख हेक्टेयर था, 2011 तक यह बढ़कर 1.7 करोड़ हेक्टेयर हो गया। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि 1951 में नहरों से सिंचित रकबे की हिस्सेदारी 40 फीसदी थी जो 2010-11 में घटकर 26% तक पहुंच गई। जबकि कुओं और ट्यूबवेल की हिस्सेदारी 29 से बढ़कर 64 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

बीते कुछ वर्षों में देश में गहरे ट्यूबवेल की संख्या तो बढ़ी है लेकिन कुंओं की स्थिति बदतर होती जा रही है। 2017 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की पांचवीं लघु सिंचाई गणना की रिपोर्ट जारी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 2006-07 और 2013-14 के बीच गहरे ट्यूबवेलों की संख्या में लगभग 11 लाख की बढ़ोतरी देखी गई है और यह संख्या 14 लाख 60 हजार से बढ़कर 26 लाख तक पहुंच गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एक करोड़ 26.8 लाख हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई करने वाले ज्यादातर गहरे ट्यूबवेल पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित हैं और ये मुख्य रुप से किसानों के निजी स्वामित्व वाले हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 98.5 प्रतिशत गहरे ट्यूबवेल निजी स्वामित्व वाले है। इनमें से 81 प्रतिशत निजी मालिक व्यक्तिगत किसान हैं जबकि 19 प्रतिशत किसानों के समूह हैं।

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा के ब्लॉक लमगड़ा के किसान खेमपाल बताते हैं, "पहले पानी की इतनी दिक्कत नहीं थी। लेकिन अब सिंचाई के लिए पानी की बहुत समस्या है। सरकार यहां कुछ काम भी कर रही थी, करोड़ों रुपए खर्च भी हुए लेकिन उससे हमें कोई फायदा नहीं हुआ।"

कुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में कितनी बढ़ी है, कितनी घटी है, इसकी कोई सरकारी रिपोर्ट तो नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र में काम कर रहे लोग कुएं गिरती संख्या पर चिंता जरूरी जाहिर कर रहे हैं।

बुंदेलखंड में जल संरक्षण पर काम कर रही परमार्थ संस्था के राष्ट्रीय संयोजक संजय कुमार ने बताया, " बुंदेलखंड, महाकौशल और रीवांचल क्षेत्र में 80 के दशक तक सिंचाई और पीने के लिए मात्र कुएं ही माध्यम थे। इन क्षेत्रों में करीब 10 लाख से ज्यादा कुएं हुआ करते थे। यहां पर सिंचाई के लिए अभी भी कुएं ही माध्यम हैं, लेकिन 96 प्रतिशत कुएं खत्म हो चुके हैं।"


केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा की गई पांचवीं छोटी सिंचाई जनगणना के ही अनुसार देश देश के 661 जिलों में गहरे कुंओं की संख्या 2.6 मिलियन है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल गहरे कुएं, जो 12.68 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई करते हैं, मुख्यत: पंजाब, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि गहरे कुएं 70 मीटर से अधिक गहरे हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के कृषि अर्थशास्त्री डॉ. गिरीश झा का भी मानना है भातरीय खेती और किसानों के लिए बेहतर सिंचाई को होना बहुत जरूरी है। वे कहते हैं "अगर सिंचाई की पर्याप्त सुविधा हो तो उत्पादन बढ़ने से किसानों की लागत घट सकती है, क्योंकि किसानों की आय बढ़ाने के लिए जरूरी है कि इनपुट कास्ट (लागत) कम की जाए।"

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि इस समस्या का समाधान क्या है। इस बारे में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोलॉजी के जलीय पारिस्थितिकी वैज्ञानिक डॉ ब्रिज गोपाल गांव कनेक्शन से कहते हैं "हर चीज के लिए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए किसानों को भी चाहिए कि वे पानी संचय सीखें। खेतों में पानी को रोकें, खेतो के आसपास छोटे तालाब बनाएं।"

ये समस्या विकराल क्यों होती जा रही है इस पर ब्रिज गोपाल कहते हैं कि ये स्थान पर भी निर्भर करता है। लेकिन सरकार इस दिशा में मजबूत कदम नहीं उठाए। सरकार ने डैम तो बनाए लेकिन उसे सीमेंटेंड कर दिया, ऐसे में पानी जमीन के अंदर तो पहुंच नहीं रहा है। सरकार इन छोटी-छोटी गलतियों को भी सुधारकर इस दिशा में कारगर कदम उठा सकती है।"

फिर वापस गांव कनेक्शन के बजट पर आते हैं, यूपी बिहार से लेकर महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश तक के किसान मानते हैं अगर उनके खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचे तो खेती का न सिर्फ लागत कम होगी बल्कि उत्पादन भी बढ़ेगा। ऐसे में देखना होगा कि निर्मला सीतारामन देश में सिंचाई व्यवस्था के लिए बजट में आवंटन करती हैं?


गांव कनेक्शन सर्वे की पूरी रिपोर्ट


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