'जब बाहर से ही खरीदनी है दवाई, तो प्राइवेट अस्पतालों में क्यों न कराएं इलाज '

जर्जर भवनों में संचालित हो रहे सरकारी अस्पताल, डॉक्टरों और मेडिकल उपकरणों का है अभाव, प्राइवेट अस्पताल जाने के लिए लोग मजबूर

Chandrakant Mishra

Chandrakant Mishra   11 July 2019 8:59 AM GMT

लखनऊ। "मैं मजदूरी करके किसी तरह पेट पालती हूं। कुछ दिनों से मेरी बेटी बीमार रहती है, कुछ खाती-पीती नहीं। बहुत कमजोर हो गई है। अस्पताल लेकर गए थे, एक दवाई थमा दी और बाहर से कुछ दवाई खरीदने के लिए बोल दिया। जब बाहर से ही पैसा देकर दवा खरीदनी है तो सरकारी अस्पताल का फायदा।" लखनऊ जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर माल ब्लॉक के रामपुर में रहने वाली नीना ने बताया।

बारह सौ आबादी वाले इस गाँव में 39 बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जिनके माता-पिता उन्हें लेकर सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं लेकिन सही से इलाज नहीं मिलता। ऐसे में ये लोग प्राइवेट अस्पताल में महंगा इलाज कराने के लिए विवश हैं।

डॉक्टरों की कमी से मरीजों को होती है परेशानी। फोटो: चन्द्रकान्त

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पिछले दिनों गांव कनेक्शन ने जब 19 राज्यों में सर्वे कराया तो उसमें भी लोगों ने बताया कि वे आखिर क्यों सरकारी अस्पतालों से दूर हो रहे हैं। सर्वे में निकलकर सामने आया कि हर तीसरा आदमी इलाज कराने के लिए सबसे पहले प्राइवेट डॉक्टर के पास ही पहुंचता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि 18.33 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे जब अस्पताल जाते हैं तो डॉक्टर मौजूद ही नहीं रहते। हालांकि 43.34 फीसदी लागों ने कहा कि उन्हें डॉक्टर मिलते हैं। 3.46 प्रतिशत ने कहा कि डॉक्टर तो मिलते हैं लेकिन दवाइयां नहीं मिलती हैं। जबकि चौंकाने वाली बात फाइंडिंग यह रही कि 35.87 फीसदी लोगों ने कहा कि डॉक्टर कभी-कभार ही मिलते हैं।

भारत में हर सरकारी विभाग की गतिविधियों को दर्ज़ करने वाली संस्था ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी- 2016 के आंकड़ों के अनुसार देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसी) में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। वहीं, पीएचसी और सीएचसी,दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरूरत की अपेक्षा मात्र पचास फीसदी ही स्टाफ है। ऐसे में भला सरकारी अस्पतालों से लोग दूरी क्यों नहीं बनायेंगे।


चौथे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, 56 प्रतिशत शहर और 49 प्रतिशत गाँव के लोग निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विकल्प चुना, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का ही अभाव है। बेहतर इलाज के लिए लोग ज्यादा पैसे भी खर्च कर रहे हैं।

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पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट नई दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद ने गांव कनेक्शन को बताया, "भारत में बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंताएं जताई जाती हैं और उनसे निपटने के उपायों के बारे में चर्चा भी की जाती है, लेकिन धरातल पर उपायों का क्रियान्वयन नहीं होता है, जिसका खामियाजा एक बड़ी आबादी को कई तरह की बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है। भारत में टीबी की बात करें तो यह एक ऐसी बीमारी बन चुकी है, जिसका मुमकिन इलाज होने के बावजूद कई कारणों से खत्म नहीं हो पा रही है।"

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक ट्रेडोस एडहानोम गेबेरियस ने एक विज्ञप्ति में कहा था, "बहुत से लोग अभी भी ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जिसका आसान इलाज मौजूद है और बड़ी आसानी से जिसे रोका जा सकता है। बहुत से लोग केवल इलाज पर अपनी कमाई को खर्च करने के कारण गरीबी में धकेल दिए जाते हैं और बहुत से लोग स्वास्थ्य सेवाओं को ही पाने में असमर्थ हैं। "


देहरादून के रहने वाले कुलदीप व्यास (38 वर्ष) भी सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटने से परेशान हैं, उन्होंने बताया, "सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में पैसा तो बहुत खर्च कर रही है, लेकिन उसका सही प्रयोग नहीं हो रहा है। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर समय से नहीं आते, इलाज के नाम पर दो-चार गोलियां थमा दी जाती हैं। कर्मचारियों का व्यवहार भी ठीक नहीं होता है,इसलिए लोग सरकारी अस्पतालों से दूरी बना रहे हैं।"

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यूपी की राजधानी से मात्र 95 किलोमीटर दूर बाराबंकी में घाघरा नदी के किनारे बसा परसावल गाँव आज भी सड़क, बिजली, शौचालय, अस्पताल और स्कूल जैसी मूलभूत जरुरतों से कोसों दूर है। इस गाँव से करीब 9 किलोमीटर दूर टिकैतनगर में अस्पताल है। बीमार को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं बल्कि, खाट और नाव का सहारा लेना पड़ता है।

"रात को अगर कोई बीमार पड़ जाता है तो सुबह तक इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान वह मर ही क्यों न जाए, हम कुछ कर नहीं सकते। सुबह होने पर मरीज को खाट या साइकिल पर लादकर नदी तक ले जाते हैं, फिर नाव के सहारे नदी पार कर अस्पताल पहुंचते हैं।" ये कहना है यूपी के जनपद बाराबंकी के गाँव परसावल निवासी लालमती देवी का।


पिछले दिनों मुजफ्फपुर में चमकी बुखार से करीब 150 बच्चों की मौत हो गई थी। ये सब मौतें सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी का ही नतीजा है। मुजफ्फपुर के ही रहने वाले ऋषिकेश कुमार ने बताया, "जून के महीने में चमकी बुखार से पीड़ित एक बच्चे को लेकर मैं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुस्तफापुर पहुंचा। वहां मुझे कोई डॉक्टर नहीं मिला। पास में एक एएनएम से मैंने बच्चे का बुखार मापने की गुहार की। लेकिन वह आनाकानी करने लगी। जब हम पूछा तो उसने कहा, यहां थर्मामीटर ही नहीं है बुखार कैसे चेक करूं। यह सुनकर मेरे होश उड़ गए। इतने बड़े अस्पताल में जब थर्मामीटर जैसी सुविधा नहीं है तो और बीमारी का इलाज भला कैसे होगा। "

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उत्तररखंड के हल्द्वानी के रहने वाले मोहन लोसहाली (40 वर्ष) ने बताया," पूरे उत्तराखंड में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। पहाड़ पर तो स्थिति और भी बदतर है। मेरे एक परिचित हो ह्दय से संबंधित बीमारी है, लेकिन यहां पर किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ही नहीं है। किसी भी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए यहां के लोग बरेली, मुरादाबाद या दिल्ली के किसी प्राइवेट अस्पताल जाने लिए मजबूर होते हैं। सीएचसी-पीएचसी में डॉक्टर नहीं मिलते। दवाइयों का भी टोटा है।"


ग्वालियर के रहने वाले संजय कुमार (45 वर्ष) की पत्नी कविता (40 वर्ष) के पेट में अपेंडाइटिस था। संजय ने बताया, "एक दिन अचानक से पत्नी के पेट में दर्द होने लगा। मैं तुरंत लेकर उसे जिला अस्पताल पहुंचा। करीब एक घंटे लाइन लगने के बाद हमारा नंबर आया। जब डॉक्टर के पास पहुंचे तो नब्ज टटोल के अल्ट्रासाउंड के लिए लिख दिया। अल्ट्रासाउंड रूम पहुंचने पर वहां दस दिन बाद का नंबर मिला। इस दौरान कविता दर्द से कराहती रही। मजबूरी में कविता को लेकर पास के एक प्राइवेट अस्पताल गया। जहां तुरंत उसका इलाज शुरू हुआ। अब तो सरकारी अस्पताल से मेरा भरोसा ही उठ गया है।"

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राजनीतिशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की विभागाध्यक्ष प्रो. अनुराधा अग्रवाल का कहना है, "हमारे देश में बीमारियों के बोझ की तुलना में स्वास्थ्य सेवा का ढांचा काफी लचर है। सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र और सरकारी अस्पतालों की संख्या कम है। इन समस्याओं को दूर करने की जिम्मेदारी जिनपर है वे जनता से कटे हुए हैं, इसलिए हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी बदहाल हैं।"

जम्मू-कश्मीर के जिला पुंछ की मंडी तहसील के बायला गांव निवासी मो. दीन ने बताया, "मेरे गांव में एक स्वास्थ्य उपकेंद्र है, लेकिन यहां किसी प्रकार के जांच की सुविधा नहीं है। डॉक्टरों की कमी के कारण अक्सर यहां पहुंचने वाले मरीजों को मायूसी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बीमार पड़ने पर लोग प्राइवेट अस्पताल जी जाते हैं।"

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