सरकारी अस्पतालों से दूर भागते हैं ग्रामीण

महंगा इलाज होने के बावजूद लोग प्राइवेट अस्पताल में जाते हैं इलाज के लिए, सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी और लचर कार्यप्रणाली से लोग बना रहे दूरी

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   6 July 2019 9:36 AM GMT

लखनऊ। बदहाल भवन, टूटे खिड़की-दरवाजे, जंग लगे बेड। यह हाल किसी कबाड़ी की दुकान का नहीं हैं, बल्कि यह तस्वीर है उन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की, जिनके कंधों पर ग्रामीणों की सेहत की सुरक्षा करने का दायित्व है।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली ब्लॉक के जलालनगर स्वास्थ्य केंद्र को देखने मात्र से पता लग जाता है कि यहां की साफ-सफाई हुए महीनों हो गए। पास के गाँव मनिकपुर से इलाज कराने आए अर्जुन ने बताया, "यहां न तो कोई स्वास्थ्यकर्मी रहता है,और न ही मरीज आता है। केंद्र तक जाने का रास्ता भी ठीक नहीं है।"

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बीमार होने पर गावों के लोग सबसे पहले सरकारी अस्पताल ही पहुंचते हैं, गाँव कनेक्शन सर्वे के दौरान 44 फीसदी लोगों ने कहा कि वह पास के सरकारी अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन अभी भी गाँव का हर तीसरा आदमी (36 प्रतिशत लोग) इलाज कराने के लिए सबसे पहले प्राइवेट डॉक्टर के पास ही पहुंचते हैं। सर्वे में जब ग्रामीणों से पूछा गया कि वे सरकारी अस्पताल जाते हैं तो वहां डॉक्टर मिलते हैं कि नहीं इस सवाल पर 42.34 प्रतिशत लोगों ने कहां की डॉक्टर मौजूद रहते हैं। 18.33 प्रतिशत ने कहा कि डॉक्टर मौजूद नहीं रहते हैं। 3.46 प्रतिशत ने कहा कि डॉक्टर तो मिलते हैं लेकिन दवाइयां नहीं मिलती हैं, वहीं 35.87 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कभी कभार ही डॉक्टर मिलते हैं।

भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की यह तस्वीर गाँव कनेक्शन द्वारा 19 राज्यों के 18,267 हजार लोगों के बीच किए गए सर्वे में निकल कर आई। इस सर्वे के जरिए गाँव कनेक्शन ने यह जानने की कोशिश की कि लोगों में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कितना भरोसा है।

भारत में हर सरकारी विभाग की गतिविधियों को दर्ज़ करने वाली संस्था ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी- 2016 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसी) में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। वहीं, पीएचसी और सीएचसी,दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरूरत की अपेक्षा मात्र पचास फीसदी ही स्टाफ है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडों के अनुसार भारत में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है, इसके बावजूद हर साल केवल 5500 डॉक्टर भर्ती हो पाते हैं। देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी से भी ज्यादा कमी है। ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 82 फीसदी तक पहुंच जाता है।

ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी होने से मरीजों को उचित समय पर इलाज नहीं मिल पाता है, और वहां मौजूद स्टॉफ से ही काम चलाना पड़ता है।

"पिछले साल सड़क दुर्घटना में मेरे बड़े भाई को गंभीर चोटें आईं, हम लोग तुरंत उन्हें पास के सीएचसी ले गए, मगर वहां कोई डॉक्टर नहीं था। मैंने देखा कि एक नर्स और एक वॉर्ड ब्वॉय वहां मरीजों का इलाज कर रहे थे। वहां से निकल कर हम लोग सीधे एक निजी अस्पताल पहुंचे, जहां उनका इलाज शुरू हो सका। डॉक्टर ने कहा, थोड़ा और लेट कर दिए होते तो स्थिति काफी खतरनाक हो सकती थी क्योंकि खून काफी बह गया था। तबसे मुझे सरकारी अस्पताल से भरोसा उठ गया है," उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में रहने वाले अमित कुमार (35 वर्ष) ने अपना अनुभव बताया।

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वहीं, मध्य प्रदेश के मुरैना निवासी कुलदीप कुमार (40 वर्ष) ने भी बताया, "सीएचसी और पीएससी की हालत खराब है, डॉक्टरउपलब्ध नहीं होते, आधुनिक उपकरणों की कमी है, जरूरत की दवाएं अस्पतालों में नहीं मिलतीं।"

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में इस समय पांच लाख डॉक्टरों की कमी है। आजादी के समय देश में कुल 23मेडिकल कॉलेज थे। 2014 में इनकी संख्या बढ़कर 398 हो तो गयी लेकिन होनी चाहिए थी 1000 से ज्यादा।

वर्ष 2018 में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक ट्रेडोस एडहानोम गेबेरियस ने एक विज्ञप्ति में कहा था, " भारत में बहुत से लोग अभी भी ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जिसका आसान इलाज मौजूद है और बड़ी आसानी से जिसे रोका जा सकता है। बहुत से लोग केवल इलाज पर अपनी कमाई को खर्च करने के कारण गरीबी में धकेल दिए जाते हैं और बहुत से लोग स्वास्थ्य सेवाओं को ही पाने में असमर्थ हैं। यह अस्वीकार्य है।"

स्वास्थ्य क्षेत्र की खबरों और जानकारियों को छापने वाले प्रतिष्ठित जर्नल 'द लैंसेट' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है, वर्ष 1990 में भारत 153वें पायदान परथा। ताजा सूची 2016 के अध्ययन पर आधारित है। ढाई दशकों में भारत के प्रदर्शन में मात्र 16.5 अंकों की बढ़त हुई, जबकि वैश्विक औसत 54.4 अंकों का है।


पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट नई दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद ने गाँव कनेक्शन को बताया, "भारत में बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंताएं जताई जाती हैं, और उनसे निपटने के उपायों के बारे में चर्चा भी की जाती है, लेकिन धरातल पर उपायों का क्रियान्वयन नहीं होता, जिसका खामियाजा एक बड़ी आबादी को कई तरह की बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है। भारत में टीबी की बात करें तो यह एक ऐसी बीमारी बन चुकी है, जिसका मुमकिन इलाज होने के बावजूद कई कारणों से खत्म नहीं हो पा रही है। जिन लोगों पर इन समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी है वे इस तरफ गंभरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं।"

लोकसभा में केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने जानकारी दी थी कि स्वास्थ्य सेवाओं पर पिछले तीन वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.2 फीसदी से लेकर 1.5 फीसदी तक राशि ख़र्च की गई। पेश आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में जीडीपी का 1.5 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च हुआ। इसी तरह वर्ष 2015-16 में 1.4 फीसदी और वर्ष 2014-15 में 1.2 फीसदी जीडीपी का खर्च किया गया।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. अभय शुक्ला ने गाँव कनेक्शन को बताया, "जो हम सुझा रहे हैं और जो सरकार कर रही है, उसमें जमीन आसमान का अंतर है। हम मांग कर रहे हैं सभी के लिए अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था हो। विदेशों में हर नागरिक को प्राइमरी और सेकेंडरी हेल्थ केयर सरकार की ओर से मुफ्त मिलती है, लेकिन हमारे यहां प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में सभी लोग कवर ही नहीं हो रहे, उसमें सिर्फ 50 करोड़ लोग ही कवर्ड हैं, जबकि बाकी के 80 करोड़ लोग कवर्ड ही नहीं हैं।"


वर्ष 2013-14 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1.2 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च होता है, जो कि 2016-17 में बढ़कर 1.4प्रतिशत किया गया। सरकार ने वर्ष 2017-18 के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 48,878 करोड़ रुपये का प्रावधान किया, जो कि वर्ष2013-14 में 37,330 करोड़ रुपये था।

देश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मालिनी आइसोला ने गाँव कनेक्शन से बताया, "आयुष्मान भारत योजना का लाभ लोगों को मिल रहा है, यह अच्छी बात है, लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इस योजना में प्राथमिक चिकित्सा पर ध्यान नहीं दिया गया, जो भारत जैसे देश के लिए काफी जरूरी है," आगे कहती हैं, "जब तक हम प्राथमिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ नहीं करेंगे तब तक ये योजनाएं शत प्रतिशत लाभकारी नहीं हो सकती हैं। बुनियादी स्वास्थ्य को मजबूत करने की बेहद जरूरी है।"

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया है देश की आबादी का कुल 3.9 प्रतिशत यानी 5.1 करोड़ भारतीय अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा खर्च इलाज पर ही कर देते हैं, जबकि श्रीलंका में ऐसी आबादी महज 0.1 प्रतिशत है, ब्रिटेन में 0.5 फीसदी,अमेरिका में 0.8 फीसदी और चीन में 4.8 फीसदी है।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो आफ हेल्थ इंटेलिजेंस की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है। फिलहाल प्रति 11,082 आबादी पर महज एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के मुताबिक यह अनुपात एक प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। देश में यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11गुना कम है। बिहार जैसे गरीब राज्यों में तो तस्वीर और भयावह है। वहां प्रति 28,391 लोगों पर महज एक एलोपैथिक डॉक्टर है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी तस्वीर बेहतर नहीं है।

उत्तराखंड के चंपावत जिला निवासी पान सिंह (60 वर्ष ) कहते हैं, "हमारे यहां सरकारी अस्पताल हैं लेकिन वहां दवा नहीं मिलती। डॉक्टर भी नदारद रहते हैं। गंभीर रूप से बीमार होने पर हम लोग यहां से 128 किलोमीटर हल्द्वानी लेकर जाते हैं। सरकारी अस्पतालों का बहुत बुरा हाल है।"

हिमाचल प्रदेश के बद्दी निवासी रविंद्र कुमार (30 वर्ष ) भी सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटने से परेशान हैं, उन्होंने बताया, "सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में पैसा तो बहुत खर्च कर रही है, लेकिन उसका सही प्रयोग नहीं हो रहा है। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर समय से नहीं आते, इलाज के नाम पर दो-चार गोलियां थमा दी जाती हैं। कर्मचारियों का व्यवहार भी ठीक नहीं होता है,इसलिए लोग सरकारी अस्पतालों से दूरी बना रहे हैं।"

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