गेहूं बेच कर सरकारी अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर लोग

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लखनऊ। क्वीन मेरी अस्पताल में इलाज करने आये पिन्टू साहू पेशे से किसान है। गेहूं बेचकर वो अपनी गर्भवती पत्नी का बीते 16 दिनों से यहां इलाज करा रहे हैं। इसके बावजूद भी डिलीवरी के बाद बच्चा नहीं बचा। ये हाल केवल पिंटू का नहीं है बल्कि दर्जनों ऐसे लोग हैं जो इस सब कुछ बेचकर अपने परिजनों का इलाज कराने को मजबूर हैं। 

बहराइच के कैंसरगंज तहसील की पूर्व दिशा की ओर गाँव सुरजनपूर के रहने वाले पिन्टू साहू (30 वर्ष) के परिवार में पांच लोग हैं। पिन्टू के पास एक बीघा खेत है जिसमें इस बार दो कुंतल गेहूं हुआ था। इस दौरान उसकी पत्नी गर्भवती हुई तो गाँव की सीएचसी से उसे क्वीन मेरी अस्पताल रिफर कर दिया गया। घर के लिए खाने के लिए बचे गेहूं को भी पिंटू ने बेच दिया क्योंकि हर रोज उसे यहां 200 रुपए इलाज के खर्चे के लिए देने पड़ रहे थे। पिंटू बताता है कि मेरे पिता भी गाँव में मजदूरी कर रहे थे ताकि बच्चे के पैदा होने में पैसे की कोई कमी न आए। डिलीवरी के समय बड़ा ऑपरेशन भी हुआ पर बच्चा नहीं बचा। सारा पैसा और जेवर इलाज में लगा डाला।

सरकर ने गरीबों का इलाज कराने के लिए नि:शुल्क व्यवस्था कराई लेकिन गरीबों को इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। बहुत से गरीब तीमारदारों से जब गाँव कनेक्शन ने बात की तो उनके पास बीपीएल कार्ड ही नहीं मिले और न ही उन ग्रामीणों को निरोग्य निधि की जानकारी थी। पिन्टू की पत्नी अंजू साहू (25 वर्ष) बताती है कि बड़ा ऑपरेशन के बाद बच्चा नहीं बचा। शादी के पांच साल बाद बच्चा हुआ। बड़े शहर में रुपया पैसा लगाकर इलाज कराने आये थे पर कुछ ठीक नहीं हुआ। जो थोड़ा बहुत पैसा रुपया बचा था वो सब खर्च हो गया। डॉक्टर ने कहा कि शरीर में कमजोरी और खून की बहुत कमी है, अभी कुछ जांच करानी है उसके बाद छुट्टी होगी। अब कहां से जांच के लिए पैसा लाए। जिला हरदोई तहसील सहाबाद से 30 किलोमीटर दूर गाँव बूटामऊ से थम्मान लाल अपनी बेटी का इलाज कराने के लिए यहां आये हुए हैं। इसके पहले वो 6 फरवरी को एक बार और आये थे और लगातार डेढ़ महीने इलाज कराया था। पैसा खत्म हो जाने पर बेटी को लेकर चले गये। जब दोबारा समस्या हुई तो इलाज करने आये हैं। वो बताते हैं कि पिछले 8 दिन से यहां पर रुके हुए हैं, यहीं खाना पानी बना खा रहे है। पांच कुन्तल गेहूं बेच दिया पर बिटिया सही नहीं हो पाई है। 

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