गिल्ली-डंडा और लंगड़ी टांग का गाँव कनेक्शन

गिल्ली-डंडा और लंगड़ी टांग का गाँव कनेक्शनgaonconnection, गिल्ली-डंडा और लंगड़ी टांग गाँव का मनोरंजन

शहर के बच्चों का ज्यादातर समय सोशल मीडिया, वीडियो गेम्स और मोबाइल गेम्स में बीतता है लेकिन गाँवों में कहीं-कहीं आज भी ये चीजें अजूबा हैं। ग्रामीणों के लिए मनोरंजन का मतलब गिल्ली डंडा, लंगड़ी टांग, खो-खो, कबड्डी और ऐसे ही कुछ दूसरे खेल हैं। हमारे विज्ञान में भी कहा गया है कि घर के बाहर कुछ देर खेलने से शरीर की एक्सरसाइज होती है और शरीर चुस्त दुरुस्त होता है। वहीं शहरी बच्चे दिनभर एक कमरे में रहने की वजह से बाहरी दुनिया से कटते जा रहे हैं और यह स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर डालता है। गाँवों के कुछ मशहूर खेलों के बारे में बता रही हैं शेफाली श्रीवास्तव:

बहुत पुराना खेल है कबड्डी

कबड्डी भारत का एक पुराना खेल है जिसमें दो टीमें होती हैं। इस खेल को दक्षिण में चेडुगुडु और पूरब में हुतूतू के नाम से भी जानते हैं। यह खुले मैदान में खेला जाता है। दो टीमों के बीच एक लाइन होती है। अंक पाने के लिए एक टीम का रेडर (कबड्डी-कबड्डी बोलने वाला) विपक्षी टीम के पाले में जाकर वहां मौजूद खिलाड़ियों को छूने का प्रयास करता है। इस दौरान विपक्षी टीम के खिलाड़ी अपने पाले में आए रेडर को पकड़कर वापस जाने से रोकते हैं और अगर वह इस प्रयास में सफल होते हैं तो उनकी टीम को इसके बदले एक अंक मिलता है और अगर रीडर किसी स्टॉपर को छूकर सफलतापूर्वक अपने पाले में चला जाता है तो उसकी टीम के एक अंक मिल जाता और जिस स्टॉपर को उसने छुआ है उसे कोर्ट से बाहर जाना पड़ता है। भारत के गाँवों में खेले जाने वाले इस खेल को अब प्रोफेशनल रूप मिल गया है। प्रो-कबड्डी लीग के जरिए इस खेल को प्रमोट किया जा रहा है जिसमें कई टीमें कबड्डी खेलती हैं।

शहर में बिलिअर्ड गाँव में कंचा खेल

यह अक्सर लड़कों द्वारा खेला जाता है लेकिन अब लड़कियां भी इसमें भाग लेती हैं। इसमें एक गड्ढा बनाया जाता है और उसमें कुछ दूरी से जहां एक रेखा खिंची होती है कंचे फेंके जाते हैं। जिसके कंचे सबसे ज्यादा गिनती में गड्ढे में जाते हैं वह जीतता है। यह शहर में खेले जाने वाले बिलिअर्ड की तरह ही है।

लंगड़ी टांग-लड़कियों का प्रिय खेल

गाँवों में लड़कियों का प्रिय खेल है लंगड़ी टांग। यह अक्सर लड़कियों द्वारा छत पर या आँगन में खेला जाता है। इसमें चॉक, खड़िया और ईंट के टुकड़े  से कई खाने बनाए जाते हैं। फिर दो लड़कियां इसे एक पत्थर के टुकड़े से खेलती हैं। पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर सरकाना पड़ता है, बिना लाइन को छुए हुए। अंत में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है। 

गर्मी की दोपहर में यूं तो बाहर निकलने का मन नहीं होता लेकिन गाँव में लड़कियां इस समय में भी इस खेल को खेलती हैं। उनके लिए इससे अच्छा मनोरंजन कुछ नहीं हो सकता।

क्रिकेट का देहाती रूप-गिल्ली डंडा

इसे क्रिकेट का देहाती रूप कहें तो कुछ बुराई नहीं है। दरअसल गाँवों में लड़कों का प्रिय खेल गिल्ली डंडा होता है जिसमें कम से कम दो खिलाड़ियों की आवश्यकता होती है। खेल प्रारम्भ करने के लिए पहले जमीन पर एक छोटा सा लम्बा गड्ढा करते है। फिर उस पर गिल्ली रख कर डन्डे से उछालते है। यदि सामने खड़ा खिलाड़ी गिल्ली को हवा में ही पकड़ लेता है तो खिलाड़ी हार जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो सामने खड़ा खिलाड़ी गिल्ली को डन्डे पर मारता है जो कि जमीन के गड्ढे पर रखा होता है, यदि गिल्ली डंडे पर लग जाती है तो खिलाड़ी हार जाता है। नहीं तो पहला खिलाड़ी फिर गिल्ली को डंडे से उसके किनारे पर मारता है। गिल्ली को किनारे से मारने का प्रत्येक खिलाड़ी को तीन बार मौका मिलता है। इस खेल मे अधिकतम खिलाड़ियों कि संख्या निर्धारित नहीं होती है।

रस्सी कूद-मनोरंजन के साथ स्वास्थ्य भी

गाँवों में स्कूलों में यह खेल बहुत खेला जाता है जहां रस्सी कूद प्रतियोगिता होती है। वैसे रस्सी वजन घटाने के लिए एक अच्छा व्यायाम है लेकिन गाँव में इसे इस वजह से नहीं खेला जाता है। वहां सभी इसे मज़े लेकर खेला जाता है। इसे कई तरीके से खेलते हैं। अकेले भी और तीन लोगों के साथ भी। दो लड़कियां एक रस्सी को दोनों सिरों से पकड़ लेती हैं और उसे घुमाना शुरू करती हैं और तीसरी लड़की बीच में कूदती है। इस तरह सबकी बारी आती है और बिना रुके कूदता है वह जीतता है।

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