ग्रामीण युवाओं को चाहिए बुनियादी शिक्षा

ग्रामीण युवाओं को चाहिए बुनियादी शिक्षाgaonconnection

एक लम्बे समय तक गाँवों की आबादी नगरों की बजाय गाँवों में ही रोजगार पैदा करने में सक्षम थी। मध्यकाल तक आज जैसी ग्राम से नगर की ओर पलायन की समस्याएं नहीं थीं। धीरे-धीरे गाँव की हैसियत कमजोर पड़ी, जबकि वे राज्य के लिए आर्थिक स्रोत ठीक उसी प्रकार से बने रहे, जैसे वे पहले थे। आजादी के बाद बहुत कुछ बदला लेकिन गाँव अपनी पुरानी हैसियत प्राप्त नहीं कर पाए। परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण युवा अपने भविष्य की तलाश करने शहरों की ओर निकल पड़ा।   अब यहां पर तीन प्रश्न हैं। प्रथम यह कि क्या ग्रामीण युवा में उद्यमिता की संभावनाएं वैसी ही हैं, जैसी शहरी युवा में? द्वितीय-क्या गाँव युवा उद्यमिता मौलिक आधार बन सकते हैं अथवा नहीं? और तृतीय- क्या सरकारें नगरों की तरह गाँवों में भी उद्यम स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जहां ग्रामीण युवा संभावनाएं तलाश सके।  

यदि ग्रामीण अंचलों में गम्भीरता से झांक कर देखा जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि अभी भी ग्रामीण युवा के लिए उद्यम का प्रमुख क्षेत्र कृषि ही है। यदि ‘सामाजिक, आर्थिक व जाति आधारित जनगणना-2011’ के अंतिम आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि देश के 640 जिलों में रहने वाले शहरी और ग्रामीण परिवारों की कुल संख्या 24.39 करोड़ है। इसमें से ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 17.91 करोड़ परिवार रहते हैं, अर्थात लगभग 73 प्रतिशत परिवार ग्रामीण हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि 5.37 करोड़ यानि 29.97 प्रतिशत ग्रामीण परिवार भूमिहीन हैं और 51.14 प्रतिशत ग्रामीण परिवार दैनिक मजदूरी पर तथा 30.10 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर हैं। उम्मीद की जा सकती है कि कृषि पर लोगों की निर्भरता और सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी के बीच जितना बड़ा गैप है, उसी अनुपात में गाँव का युवा कार्य से वंचित है या वंचित होने की संभावना से ग्रस्त होगा।

वैसे सामान्य स्थिति में भी कृषि में वर्ष भर रोजगार निर्मित नहीं होते इसलिए ग्रामीण युवाओं को बेरोजगारी/अर्द्धबेरोजगारी की समस्या का सामना करना पड़ता है। अतिरेक आय के निर्माण न हो पाने के कारण, उद्यमों की ओर ग्रामीण युवाओं का रुझान उद्यम की ओर नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप यह ग्रामीण युवा शहर की ओर उद्यम की तलाश में प्रवर्जित होता है लेकिन पलायन के बाद भी उनकी कठिनाइयां दूर नहीं होती जिससे कभी-कभी वे कुंठा के शिकार होते हैं और उनमें उद्यमिता की जो विशेषता विद्यमान होती हैं, उसका भी धीरे-धीरे क्षय होने लगता है। इस विपरीत परिणाम देने वाली स्थिति का निर्माण इसलिए अधिक हुआ है क्योंकि भारतीय युवाओं में जिस मनोविज्ञान का निर्माण हुआ है, उसके केन्द्र में नौकरी है, उद्यम नहीं। जबकि वास्तविक राह उद्यमिता के विकास से ही होकर जाती है। 

 आज जरूरत यह है कि हमारा युवा वर्ग एक सफल उद्यमी बनने की मनोविज्ञान विकसित करे या स्वप्न देखे ताकि वह स्वयं रोजगार तलाश न करे बल्कि रोजगार पैदा करे लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी उद्यमिता संभावनाएं ग्रामीण युवाओं में विद्यमान हैं? एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में 612 जिलों में लगभग 6,38,588 गाँव आते हैं जहां कुल आबादी के लगभग 75 करोड़ जनता रहती है। वर्तमान में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का शुद्ध घरेलू उत्पाद 13,70,000 करोड़ रुपए या 304 बिलियन डॉलर से अधिक है और ग्रामीण सकल घरोेलू उत्पाद करीब 1546018 करोड़ रुपए या 343 बिलियन डॉलर है। सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकी ग्रामीण जनता तक पहुंच रही है। (2007 में ग्रामीण भारत में 209 मिलियन मोबाइल फोन उपभोक्ता थे‍ और 2008 में वायरलेस प्रौद्योगिकी के ग्रामीण उपभोक्ता 643 मिलियन थे) और भारत के गाँव सूचना, प्रौद्योगिकी तथा बाजार तक पहुंच के संदर्भ में निरंतर समानता हासिल कर रहे हैं। 

संभावनाओं के दोहन के लिए उचित दक्षता-निर्माण तथा प्रोद्योगिकी के मिश्रण से यह इलेक्ट्रानिक संपर्क ज्ञान और आर्थिक रिटर्न के निर्बाध प्रवाह का रास्ता साफ कर सकता है। हालांकि वित्तीय सेवाओं के संदर्भ में ग्रामीण आधार को मजबूत करने के लिए नीति स्तर पर महत्वपूर्ण जोर रहा है लेकिन हाल में सम्पन्न हुई सामाजिक-आर्थिक जनगणना काफी भिन्न निष्कर्षों के लिए जगह बनाती हुई दिख रही है। विकास की नई व्यवस्था में संपर्क साधनों में सुधार बेहतर माहौल तथा आर्थिक कारक लागत के कारण कई उद्योग तथा शैक्षणिक संस्थाएं को गाँवों की ओर आकर्षित किया है। वर्तमान समय में करीब 40 प्रतिशत कॉलेज और 20 प्रतिशत प्रोफेशनल कॉलेज ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। यही नहीं यह हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। खास बात यह है कि इन संस्थाओं में कई विद्वान स्वयंसेवक तथा भावी उद्यमी होते हैं जो दक्षताओं को आमदनी तथा मानव विकास में बदलने के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी, वृहद एकीकरण तथा अधिक सक्षम प्रबंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि गाँवों के तरफ शैक्षणिक -व्यवसायिक संस्थानों और स्वयंसेवकों को गाँवों की ओर पलायन हो रहा है, इसके अर्थ दो हुए। एक यह कि उन्हें ग्रामीण युवाओं में कुशलता, दक्षता एवं उद्यमिता की संभावनाएं दिख रही हैं। द्वितीय -वे ग्रामीण युवाओं में उद्यमिता की संभावनाओं का निर्माण करने के लिए यत्नशील हैं। अब आवश्यक यह है कि ग्रामीण युवा तकनीक व कौशल के क्षेत्र में दक्षता हासिल करने के लिए आगे आए क्योंकि  तकनीकी दक्षता हासिल किए बिना आज के युग में उद्यम प्रतियोगिता में सफलता अर्जित कर पाना बेहद मुश्किल होगा। 

दरअसल उद्यमिता किसी वर्ग, किसी स्थान, किसी जाति, धर्म या क्षेत्र से प्रेरित और उस पर आधारित नहीं होती है। यह वैयक्तिक गुणों के साथ-साथ सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है लेकिन इसके साथ-साथ युवाओं में उद्यमिता की भावना का भरना बेहद जरूरी है। हालांकि इसके लिए ठोस व नियोजित ढंग से कदम उठाने की आवश्यकता होगी। इसके लिए ग्रामीण युवाओं को संगठित करके उनमें कौशल का विकास करना होगा, उन्हें शहरी युवाओं के साथ लाना होगा, उन्हें डिजिटली कनेक्ट करना होगा और इस सबसे पूर्व ग्रामीण युवाओं के अभिभावकों की सोच में परिवर्तन लाना होगा। उद्यमिता की संभावनाओं के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि पहले ग्रामीण युवाओं तक उद्यमों से सम्बंधित नए ज्ञान, नई सूचनाएं व आवश्यक जानकारियां पहुंचाई जाएं ताकि उनमें उद्यमिता के प्रति अभिरुचि एवं ज्ञान पैदा हो। उद्यमिता के विकास के लिए उनमें कुछ आवश्यक गुणों का निर्माण जरूरी होगा, जैसे- नई उपलब्धियों और संभावनाओं के प्रति सचेतता, जोखिम उठाने की प्रवृत्ति, सकारात्मक सोच, इनीशिएटिव लेने का साहस, चुनौतियों से निपटने की क्षमता, वातावरण को विश्लेषित करने की इच्छा, प्रयासों की सातत्यता, सूचनाओं को संकलित करते रहने की विशेषता, अवसरों की तलाश, आदि। 

इस दिशा में गांधी जी का बुनियादी शिक्षा वाला मंत्र बेहद कारगर हो सकता है। उल्लेखनीय है कि गांधी जी बुनियादी शिक्षा की मंशा यह थी कि गाँव के बच्चों को सुधार-संवार कर उन्हें गाँव का आदर्श बाशिंदा बनाया जाए। उनका मानना था कि जो कांग्रेसजन स्वराज्य की इमारत को बिल्कुल उसकी नींव से चुनना चाहते हैं, वे देश के बच्चों की उपेक्षा कर ही नहीं सकते। परदेशी हुकूमत चलाने वालों ने अनजाने ही क्यों न हो, शिक्षा के क्षेत्र में अपने काम की शुरुआत बिना चूके बिल्कुल छोटे बच्चों से की है। हमारे यहां जिसे प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है वह तो एक मजाक है, उसमें गाँवों में बसने वाले हिन्दुस्तान की जरूरतों और मांगों का जरा भी विचार नहीं किया गया है और वैसे देखा जाए तो उसमें शहरों का भी कोई विचार नहीं हुआ है। बुनियादी शिक्षा का उद्देश्य दस्तकारी के माध्यम से बलों को शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक विकास करना है लेकिन मैं मानता हूं कि कोई भी पद्धति, जो शैक्षणिक दृष्टि से सही है और जो अच्छी तरह चलाई जाए, आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्त सिद्ध होगी। 

(लेखक आर्थिक विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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