गुस्सा जायज़ हो सकता है, गाली नहीं

गुस्सा जायज़ हो सकता है, गाली नहींgaonconnection

हमारी राजनीति की दो मातृभाषा है। प्रेस कांफ्रेंस या कार्यकारिणी की भाषा अर्ध-लोकतांत्रिक होती है। धरना प्रदर्शनों तक आते-आते उसकी भाषा सामंतवादी होने लगती है। कई बार बड़े-बड़े नेता भी भाषा के लिहाज़ से फ़ेल हुए हैं। अब एक नया चलन आया है। नेता अपने समर्थकों को खास तरह की मर्दवादी, स्त्रीविरोधी, सामंतवादी और सांप्रदायिक भाषा के लिए उकसा रहे हैं।

पार्टियां ऐसी भाषा के लिए आईटी सेल के नाम से कारखाना लगा रही है। समर्थक और विद्वान तक गुंडागर्दी के इस कारखाने को अपना सक्रिय और मौन समर्थन दे रहे हैं। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि सख्ती और निगरानी के तमाम उपायों के कारण राजनीति में गुंडा होना और रखना असंभव होता जा रहा है इसलिए भाषा में गुंडे पैदा किए जा रहे हैं। ऐसे गुंडे जो अपने नेता के लिए गुंडई की जुबान बोलने से ज्यादा लिखते हैं।

लखनऊ के हजरतगंज चौराहे पर बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह शर्मनाक है। ठीक वही भाषा है जिसका प्रयोग भाजपा नेता दयाशंकर सिंह ने किया है। बसपा को भी भाजपा की तरह इस पर कुछ प्रतिक्रिया देनी चाहिए। मुझे मायावती की बात ठीक लगी कि उनके समाज के लोग देवी समझते हैं और जिस तरह से दूसरे लोग अपनी देवी के खिलाफ अपशब्द इस्तेमाल होने पर गुस्सा जाते हैं उसी तरह से ये उनका गुस्सा है लेकिन इसी जवाब में एक समस्या भी है। मायावती जिस गाली का विरोध कर रही थीं उसी गाली को जायज भी ठहराने लगीं। गुस्सा जायज़ हो सकता है, गाली जायज़ नहीं हो सकती है।

हज़रतगंज चौराहे पर जो भाषा बोली गई वो वह सामंतवाद की भाषा है। कोई राजनीतिक दल तब तक नया विकल्प नहीं बन सकता जब तक वह भाषा के मामले में भी विकल्प न तैयार करे। दयाशंकर सिंह ने मायावती को वेश्या बोलकर उस सीमा को छू दिया जिसके बाद सब्र का बाँध टूट जाता है लेकिन जब जवाब में उसी भाषा का इस्तेमाल कर बसपा कार्यकर्ताओं ने बता दिया कि वे भी गुस्से में कुछ अलग नहीं हैं।

यह घटना बताती है कि भारतीय राजनीति में स्त्री विरोधी मानसिकता एक पैटर्न है। यह मानसिकता वामपंथ में भी है, दक्षिणपंथ में भी है और उदारवादी धारा में भी है और दलित आंदेलन में भी है। मायावती के लिए लखनऊ की सड़कों पर बसपा की महिला कार्यकर्ताओं का हुजूम होता तो शायद वहां दयाशंकर जैसी भाषा प्रतिरोध की भाषा मानी जा सकती थी मगर पुरुषों के हुजूम ने उसी भाषा संस्कार को हड़प लिया जिससे दयाशंकर जैसे मर्द आते हैं। वे गाली देते हुए प्रतिकार कम कर रहे थे अपनी भाषा संस्कार का मुज़ाहिरा ज़्यादा कर रहे थे। सवर्ण का गाली देना और दलित का गाली देना एक समान नहीं होता है।

सदियों से सुनते-सुनते दलित जब गाली सुना देता है तो यह सवर्णों की भाषा में उसका जवाब होता है। हो सकता है मायावती के समर्थकों का ग़ुस्सा वैसा ही हो। मायावती को गाली देने की संस्कृति मान्य होती जा रही थी। आम बातचीत में बहुत कम नेताओं को उनके बारे में आदर से बोलते सुना है। इन नेताओं में जाति का अहंकार आ ही जाता है। फिर भी लखनऊ में एक पार्टी के बैनर के तहत ये सब हुआ। वहां भाषा से ज़्यादा संख्या बड़ी थी लेकिन भाषा के ग़लत इस्तेमाल ने संख्या छोटी कर दी।

अभी तक दलित आंदोलनों की मुख्य रूप से यही पहचान रही है कि उनका तेवर अहिंसक संविधानवादी होता है। हिंसक आंदोलन भी हुए हैं मगर दलित आंदोलन इस बात को लेकर ख़ास तौर से सचेत रहा है कि हिंसा न हो और अपनी ताकत का इज़हार शालीनता से किया जाए। एक शब्द के इस्तेमाल ने भाजपा के लिए दयाशंकर सिंह की जातिगत उपयोगिता समाप्त हो गई। ऐसे कई शब्दों के लिए बसपा को भी अपनी उपयोगिता के बारे में सोचना चाहिए। भाजपा ने दयाशंकर सिंह को निकाल कर ठीक काम किया। बसपा को भी कुछ ऐसा ही ठीक काम करना चाहिए। खेद प्रकट करना चाहिए।

संसद में सभी दलों ने मायावती का साथ दिया। भाजपा ने भी सदन की भावना समझी। हाल के दिनों में गाली-गलौज की भाषा को ख़ूब बढ़ावा दिया गया है। उसकी प्रतिक्रिया में दूसरे लोग भी उसी प्रकार की भाषा बोल रहे हैं। खासकर महिला नेताओं के खिलाफ इस तरह की भाषा लगातार बोली जा रही है। कमजोर लोगों के खिलाफ ऐसी भाषा बोली जा रही है। गुजरात के दलित युवकों को कार से बांधना कर मारना भी एक किस्म की भाषा है। मीडिया ने मारने का दृश्य ही रिकार्ड किया है। मारते मारते उन जवानों को क्या गाली दी गईं ये कौन जानता है। लाठी से मारते वक्त गौ रक्षक गुंडे मंत्र का जाप तो नहीं ही कर रहे होंगे।

बसपा समर्थकों ने दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी को गाली देकर ठीक नहीं किया। इसके प्रतिकार में दयाशंकर सिंह की पत्नी भी वही भाषा बोल रही हैं जिससे उन्हें एतराज़ होना चाहिए। उनकी बारह साल की बेटी की तो यह भाषा नहीं हो सकती जो टाइम्स आफ इंडिया में छपी है। दयाशंकर सिंह की बेटी का बयान छपा है कि नसीम अंकल, मुझे बताएं कहां आना है आपके पास पेश होने के लिए। ज़ाहिर है उनकी बेटी ने यह भाषा घर से हासिल की होगी। शायद घटना की प्रतिक्रिया में घर वालों को बोलते सुना होगा।

स्वाति लखनऊ विश्वविद्यालय में लेक्चरर रही हैं। क्या यह उनकी भाषा है जिसे बेटी ने हासिल की है कि “नसीम अंकल बताइये कहां पेश होना है।” क्या एक पाठक को इसमें कुछ भी असमान्य नहीं लगता है। स्वाति ने किसी अज्ञात जगह से अंग्रेज़ी के एक अख़बार को इंटरव्यू दिया हैं। स्वाति को बसपा समर्थकों की भाषा से यातना हो रही है लेकिन अपने पति की भाषा से यातना क्यों नहीं हो रही है।

वे जिस तरह से बसपा नेताओं की अभद्र जुबान के लिए निंदा करती हैं उस तरह से अपने पति की निंदा नहीं करती हैं। वो बसपा नेताओं की गाली से सहानुभूति तो पाना चाहती हैं मगर मायावती को वेश्या कहा गया इससे उन्हें कोई सहानुभूति नहीं लगती। कम से कम उस एक इंटरव्यू से तो यही लगता है। क्या स्वाति अपने पति के खिलाफ एफआईआर कराने जाएंगी या वे भी इसकी आड़ में बतकुच्चन का लाभ उठाने का प्रयास करेंगी।

स्त्री विरोधी भाषा संसार में हमारी स्त्रियां भी फंसी हैं जैसे सामंतवादी जातिवादी ढांचे में हमारे दलित भी फंसे हैं। स्मृति ईरानी, मायावती, स्वाति और हम सब दोनों जगह फंसे हैं। कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा और राजद सब फंसे हैं। इस ढांचे से रोज़ तोड़ कर थोड़ा-थोड़ा बाहर आना पड़ता है। स्मृति, मायावती और स्वाति तीनों को भी बाहर आना होगा। वरना हमारा ग़ुस्सा हमें क्षण भर में हमारे भीतर बैठी सामंतवादिता की छत पर ले आता है और हम वही करने लगते हैं जिसके खिलाफ हमें गुस्सा आता है। 

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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