हेडली, इशरत व भारतीय पाखंड

हेडली, इशरत व भारतीय पाखंडgaon connection, गाँव कनेक्शन

डेविड कोलमैन हेडली की गवाही के साथ इशरतजहां का मामला फिर से हमारी स्मृति में लौट आया है। इशरतजहां की कहानी में तीन पहलू बेहद अहम हैं। सबसे पहले उन्हीं पर बात। पहला तो यह कि इशरत और जिन अन्य को मारा गया उनके आतंकियों के साथ मजबूत रिश्ते थे, संभवत: लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के संग। दूसरा, उनकी हत्या सुनियोजित मुठभेड़ में की गई, जिसका तानाबाना खुफिया ब्यूरो (आईबी) और गुजरात पुलिस ने बुना। तीसरा यह कि भले ही यह मुठभेड़ (15 जून, 2004) संप्रग राज में हुई और आईबी के अगले छह निदेशक उसी सरकार ने नियुक्त किए लेकिन उसने कई वर्षों बाद मुठभेड़ को तब फर्जी और इशरत को निर्दोष बताना शुरू किया,जब उसके लिए गुजरात से सियासी चुनौती बड़ी होती गई। 

जब अमेरिका में हेडली से पहली पूछताछ में एनआईए ने उसके ब्योरे को पेश किया तो यह राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया कि इशरत लश्कर से जुड़ी थी और अपना मिशन पूरा नहीं कर पाई। संदर्भ हटा दिए गए, उन्हें निरस्त और खारिज कर दिया गया। अब हेडली अपने 2010 के बयान को ही दोहरा रहा है। हेडली के दावों से तीन विवादित तस्वीरें उभर रही हैं। 

पहली उसका दावा एकदम खोखला है। वह दोषी है। साथ ही ऐसा दोहरा एजेंट रहा है, जिसने अमेरिकी और भारतीय कानून में टाडा अदालत से माफी के जरिए राहत पाई है। इशरत के बारे में उसका बयान राजग सरकार द्वारा दी गई माफी के बदले एहसान भी हो सकता है। लिहाजा, उनकी मूल धारणा में कोई बदलाव नहीं आया है कि इशरत निर्दोष थी, जो फर्जी मुठभेड़ की भेंट चढ़ गई।

दूसरा, अब तमाम सबूत बोलते हैं कि इशरत लश्कर की सक्रिय सदस्य थी और अगर पुलिस ने उन लोगों का उड़ा दिया तो इसमें क्या समस्या है, आपको आतंकियों से सक्रियता के साथ निपटने की दरकार है। 

तीसरी तस्वीर नागरिक अधिकारवादियों का यह सुविधाजनक पहलू कि अगर वह आतंकी थी भी, तो क्या? क्या इससे फ़र्जी मुठभेड़ को वैधता मिल जाती है?

इन सभी तस्वीरों के तर्क भारी पड़ते हैं लेकिन ये तथ्य और नैतिकता के आधार पर दोषपूर्ण भी हैं। चलिए उन शुरुआती तीन पहलुओं के संदर्भ में इन्हें कसौटी पर कसते हैं। पहला यह कि संप्रग शासन के दौरान खुफिया हलकों में यह मान लिया गया था कि इशरत एलईटी की सदस्य थी। उस गिरोह को सुनियोजित मुठभेड़ में मार गिराया गया, जो आतंक से निपटने की कवायद के 'अनुरूप' ही था। असल में संप्रग के दूसरे कार्यकाल में ही यह शुरू हुआ, जब सरकार को गुजरात से चुनौती कड़ी होती दिखी और उसके मोदी, शाह और उनके सक्रिय पसंदीदा पुलिसकर्मियों पर उनके विशेष परिचालन समूहों ने सक्रियता बढ़ा दी और 'फर्जी मुठभेड़' पर मातमपुर्सी का सिलसिला शुरू हुआ। इसके दोहरे मकसद थे। एक तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की जड़ें काटना और दूसरा मुसलमानों को पीडि़त के तौर पर पेश कर चुनावी फायदा उठाना।   

मई, 2004 में सत्ता संभालने के कुछ हफ्तों के भीतर ही संप्रग ने अपना पहला आईबी निदेशक नियुक्त किया और अगले प्रमुख के तौर पर अजित डोभाल जैसे तेजतर्रार शख्स को चुना। तब खुफिया ब्यूरो एमके नारायणन की अगुआई में चल रहा था और करीब एक दशक तक ऐसे ही चला। आईबी में नारायणन की तुलना में कोई भी उतना परिचित, सम्मानित और प्रशंसनीय अधिकारी नहीं हो सकता था और साफ  कहूं तो हमने कभी उन्हें इशरत को निर्दोष, मुठभेड़ को फर्जी बताने या आईबी की गुजरात इकाई के प्रमुख संयुक्त निदेशक (पुलिस महानिरीक्षक के समकक्ष) राजेंद्र कुमार के खिलाफ मुकदमा चलाने का समर्थन करते नहीं सुना। हालांकि डोभाल सहित कोई आईबी प्रमुख कितना ही (खुराफाती) यह कुछ अनुपयुक्त अनुवाद है इसे साधन संपन्न और बेहद सक्रिय समझिए, क्यों न हो, कोई नारायणन से आगे नहीं हो सकता। 

वास्तव में जब अदालती दखल और शीर्ष राजनीतिक स्तर पर संप्रग के फैसले से मुठभेड़ सुर्खियों में लौटी और राजेंद्र कुमार को लपेटा जाने लगाए जब देश में पहली बार आईबी के किसी अधिकारी के साथ ऐसा सुलूक हो रहा था तो संगठन के अंदरूनी ढर्रे की परतें खुलनी लगीं, जिससे सुरक्षा हलकों में बेचैनी बढ़ गई। तमाम वयोवृद्ध दिग्गजों सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इसका विरोध किया और तर्क दिया कि यह बेहद जोखिमभरा है और ऐसी मुठभेड़ें का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए 

मगर सियासत इस पर हावी हो गई। एक स्तर पर यह सीबीआई बनाम आईबी की लड़ाई बन गई। दूसरी ओर कांग्रेस के विशेष परिचालन समूह के सदस्यों ने नए सिद्धांत गढ़ लिए, जैसे कि कुमार और नरेंद्र मोदी का (नजदीकी याराना) रहा है और जब मोदी हिमाचल में भाजपा के प्रभारी थे तो चंडीगढ़ में आईबी की कमान संभाल रहे कुमार के साथ उनकी करीबी बढ़ी। यह खोज करने में संप्रग को एक दशक, तीन गृह मंत्री और पांच आईबी प्रमुख लग गए। 

अब यह खुलासा हो चुका है और कांग्रेस को नहीं पता कि उसे कहां मुंह छिपाना है। यह किसी से छिपा नहीं रहा कि सुरक्षा संबंधी सभी खतरों से निपटने में कांग्रेस खासी क्रूर रही है। वर्ष 1984 से 1993 के दरमियान उसने बेमिसाल एकनिष्ठता के साथ गुप्त तरीके से पंजाब में अलगाववाद को नेस्तनाबूद किया। अगर विशाल भारद्वाज की 'हैदर' में नब्बे के दशक की शुरुआत के दौरान कश्मीर में आतंक विरोधी गतिविधियों से निपटने की हृदय विदारक तस्वीर ने आपको विचलित किया हो तो याद रखिए कि यह सब नरसिंह राव की 'कमजोर' और अल्पमत वाली कांग्रेस सरकार के दौरान हो रहा था। इसलिए कांग्रेस के लिए सीधा जवाब यही होगा कि देखो इस मसले पर कौन आवाज उठा रहा है।  

सबसे बेवकूफाना तर्क यह है कि भाजपा ने हेडली को माफी दी और इशरत को लेकर उसका दावा सौदेबाजी का हिस्सा है। हेडली को लेकर सौदेबाजी संप्रग के समय में ही शुरू हुई थी। 

अगर आपको संदेह है तो तत्कालीन अमेरिकी राजदूत टिम रोमर की नारायणन से बातचीत के लीक अमेरिकी केबल पर गौर कीजिए, जिसमें वह कहते हैं कि भारत खुद को ऐसे पेश नहीं कर सकता कि वह प्रत्यर्पण से पीछे हट रहा है, लेकिन फिलहाल इसे नहीं उठाएगा। स्वाभाविक रूप से रोमर इशारा करते हैं कि अमेरिकी कानून में अगर किसी को दोषी ठहराया जाता है तो जब तक सजा पूरी न हो जाए, उसका प्रत्यर्पण नहीं हो सकता और यह मामला 35 साल की सजा से जुड़ा है। लिहाजा, भारतीय माफी महज औपचारिकता है। 

नागरिक अधिकारवादियों का मामला ज्यादा पुख्ता है, खासतौर से जब वे यह कहते हैं कि अगर वह आतंकी थी भी तो क्या। कोई भी कानून फर्जी मुठभेड़ों को वैधता नहीं देता। यह सर्वमान्य है। भाजपा का तर्क है कि आतंकियों को किसी भी सूरत में ठिकाने लगाया जा सकता है, भले ही वह नैतिक और कानूनी रूप से गलत हो। सवाल है कि क्या इशरत मामला फर्जी मुठभेड़ है।

फर्जी और वास्तविक मुठभेड़ों (बटला हाउस मुठभेड़ भी संप्रग के दौर में हुई) के अलावा एक तीसरी और प्रचलित श्रेणी है। 

खुफिया लोगों ने सबसे अशिष्ट चीज के लिए बेहद शिष्ट शब्द गढ़ा है। इसे वे निर्देशित हत्या का नाम देते हैं। इशरत मुठभेड़ न तो वास्तविक थी और न ही फर्जी। मेरे नजरिए ये यह नियंत्रित हत्या थी। अगर आतंकी खतरों के बढऩे से ऐसी और हत्याएं जरूरी हैं तो आपको भी अमेरिका की तरह कानूनी ढांचा बनाना होगा। या फिर स्कैंडेनेवियाई देशों की राह चलना होगा। अगर इस अवैध और अनैतिक कृत्य को लेकर आप असंतोष जताते हैं तो आपको इसकी शुरुआत कुछ पहले से करनी होगी और अगर 1968-71 के दौर वाले नक्सली अध्याय से नहीं तो 1984-93 के पंजाब से ही सही। आप इशरत पर भी नहीं रुक सकते। क्या संप्रग के राज में किसी आजाद नाम के माओवादी पर कोई हंगामा हुआ, आजाद भारत में किसी अन्य की तुलना में कांग्रेस के राज में ही सबसे ज्यादा नियंत्रित हत्याएं हुईं। असंतोष जताने के लिए सुविधावादी नहीं हुआ जा सकता। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं) 

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