हिन्दू समाज में भी महिलाओं की तकलीफ़ें कम नहीं

हिन्दू समाज में भी महिलाओं की तकलीफ़ें कम नहींgaoconnection

हिन्दू महिलाओं को तीन तलाक की दहशत तो नहीं रहती लेकिन दुश्वारियां कम नहीं हैं। अभी दो दिन पहले की बात है राजस्थान में पांच साल की लड़की और 11 साल के लड़के की शादी हो गई। कितनी विधवाएं एकाकी जीवन बिता रही हैं और विधुर दूसरी शादी कर लेते हैं। दहेज का डंक लड़कियों के साथ उनके परिवार को भी लगता है और अबला होने के बावजूद दोष उसी पर लगता है। महिला सुरक्षा के कानून बने हैं लेकिन उनका सम्मान नहीं होता। दहेज शायद सबसे ज्यादा दुखी करता है। बहुत से परिवारों में लड़का पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है और लड़की पैदा होती है तो सन्नाटा छा जाता है। लड़की पैदा होने के लिए नारी को दोषी माना जाता है जब कि वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर लड़का या लड़की के लिए पुरुष जिम्मेदार होता है, स्त्री नहीं। विज्ञान का दुरुपयोग करके लड़कियों के भ्रूण हत्याओं के कारण हजार पुरुषों पर केवल 940 के लगभग नारियां बची हैं। जो भी हो, इस डंक का विष तो समाज को ही उतारना होगा, सरकार ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।

किसी ज़माने में दुल्हन खरीदने जैसा रिवाज़ नहीं था, महिलाओं को अपना पति स्वयंबर में चुनने का अधिकार था। पिता द्वारा मिली सम्पत्ति पर उनका स्वामित्व रहता था और महिलाओं को समाज में पुरुषों से बेहतर सम्मान मिलता था। अंग्रेज शासन से पहले सम्पत्ति पर लड़की का अधिकार रहता था, अनादि काल से सम्पत्ति पर लक्ष्मी का स्वामित्व रहा है विष्णु का नहीं। अंग्रेजों ने सम्पत्ति पर से महिलाओं का स्वामित्व समाप्त कर दिया और तबसे विवाह के समय लड़की के परिजनों द्वारा दी जाने वाले उपहारों पर भी लड़के और उसके परिवार का हक बन गया। गुलामी तो खत्म हुई लेकिन गुलामी के जमाने की दहेज परम्परा बनी रही।

गाँव देहात में शादी का सिलसिला विचित्र ढंग से शुरू होता है। दो बातों पर सबसे अधिक जोर होता है- पहला बनाबन्त यानी लड़का-लड़की के 36 में से कितने गुण मिलते हैं और दूसरा गनागन्त यानी लेन-देन। सब कुछ सही होने के बावजूद शादियां सफल नहीं होतीं। आखिर दहेज के खिलाफ देश के नौजवान मौन क्यों हैं, बाकी दुनियाभर के विषयों पर हंगामा करते रहते हैं। आधुनिक भारत में अपराध रिकार्ड के आंकड़े बताते हैं कि 1998 से 2010 की अवधि में दहेज के कारण होने वाली मौतों में लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालात दिन पर दिन बिगड़ ही रहे हैं। बढ़ती हुई शिक्षा, जागरूकता और महंगाई के साथ दहेज भी बढ़ रहा हैं लेकिन दर्द का अहसास तभी होता है जब दहेज देना होता है। तब नहीं जब लेना होता है।

कभी-कभी टीवी या अखबारों से पता चलता है कि अमुक शहर में लड़की ने मंडप में शादी से इनकार कर दिया क्योंकि लड़के वाले दहेज के लिए उसके परिवार को जलील कर रहे थे, परन्तु तब तक परिवार का बहुत नुकसान हो चुका होता है। लड़की को यह क्रान्तिकारी कदम उसी समय उठाना चाहिए था जब मोल-भाव हो रहा था। दहेज विरोधी लोगों को ऐसी बारातों में नहीं जाना चाहिए और ऐसी शादियों में सम्मिलित ही नहीं होना चाहिए जिनमें दहेज का मोल भाव हुआ हो।

यदि हमारा समाज यह नहीं चाहता कि लड़कियां दहेज के कारण बिना ब्याही रह जाएं या बेमेल शादियां हों तो दो विकल्प होने चाहिए। या तो ऐसा रिश्ता ढूंढें जो बिल्कुल सादगी से बिना दहेज और बिना दिखावा के सम्बन्ध करने को तैयार हो या फिर लड़के-लड़कियों को अपना साथी चुनने की पूरी छूट दें। ऐसी छूट का मतलब होगा पूरी तरह जाति और धर्म को नकारना। सम्भव है हमारा समाज अभी इस बात को सहज भाव से स्वीकार न करे। युवाशक्ति को इसके आगे झुकना नहीं चाहिए। तर्कसंगत और सहनशील मानसिकता बनाने में समय लगेगा। परन्तु सामाजिक समरसता और शान्ति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि बुजुर्ग अपने बच्चों को पूरी आजादी और आशीर्वाद दें।

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