हमले होते रहते हैं, हम भूल जाते हैं

हमले होते रहते हैं, हम भूल जाते हैंहमले होते रहते हैं, हम भूल जाते हैं

फ्रांस की तरह हम तुर्की को भूल जाएंगे। तुर्की की तरह हम बांग्लादेश को भूल जाएंगे। उससे पहले हम सब भूल गए हैं। इसके बाद हम सब भूल जाएंगे। आतंकवाद को कभी धर्म से तो कभी धर्म के बिना पहचाना जाता रहेगा। आतंकवाद हर बार लौट कर आता रहेगा।

कभी भी, कहीं भी। हवाई अड्डे के भीतर कोई घुसा चला आ रहा है, कोई रेस्त्रां में तो कोई अख़बार के दफ्तर में। ऐसी कोई जगह नहीं जहां आतंकवाद न पहुंचा। हम लड़ रहे हैं। हम और भी लड़े हैं। फोन कर आपस में सांत्वना देना फिर टीवी पर अपने नागरिकों को सांत्वना देना। मोमबत्तियाँ जलाना, स्टेटस लिखना और तस्वीरें लगाकर स्मरण लिखना। सब कुछ कई बार हो जाता है। आतंक के विरोध में एक नई लोक संस्कृति पनप गई है। शोक की एक संस्कृति बन गई है।

हम इस संस्कृति में शामिल होकर भरोसा भी कर लेते हैं, जानते हुए कि मुल्कों में एका नहीं हैं। बांग्लादेश की घटना पर कितना उबला जाए और तुर्की पर कितना। जब तक उबाल कम होता है टीवी पर सीसीटीवी का कोई और फुटेज चलने लगता है। लोग फिर से मारे जाने लगते हैं। फिर से वही सब बोला जाने लगता है। फिर कहीं पर बोला जाता है कहीं पर चुप रह जाया जाता है। रविवार को बग़दाद में शियाओं के मोहल्ले में कार धमाके में अस्सी से ज़्यादा लोग मारे गए और दो सौ घायल हो गए। ढाका में गला रेत कर मारा गया तो कहीं धमाका कर। क्रूरता में कितना फर्क करें। समाज दुनिया क्या वाक़ई इन घटनाओं से हिल रही है? बेचैनियां कहां दिखती हैं? आक्रोश कहां दिखता है?

धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल हर जगह बदहवासी मचा रहा है। धर्म के नाम पर गुंडे से लेकर आतंकवादी पैदा कर रहा है। अगर हर नाइंसाफी के ख़िलाफ़ आतंक ही प्रतिकार बन जाए तो कौन बचेगा? आतंकवादी मारे भी जा रहे हैं। पकड़े भी जा रहे हैं। फिर भी वो कौन सी फैक्ट्री है, कहां है वो फैक्ट्री जहां वो पैदा होते जा रहे हैं। आज ही ख़बर पढ़ी कि फ्रांस से यहूदी भी सीरिया जा रहे हैं आतंकवादी बनने। यूरोप के कई देशों से लड़के आतंकवादी बनने जा रहे हैं। भारत में भी जाते हुए पकड़े गए हैं। कई चले भी गए होंगे। देशों ने आतंक को सेना के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया। दुनिया चुप रही। खुलेआम उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा गया। क्या कर लिया अमेरिका ने उनका। मुजाहिदीन किसने पैदा किए? आईसिस से कारोबार कौन कर रहा है? कहीं राजनीतिक तौर पर आतंक का इस्तेमाल हो रहा है तो कहीं इसके ज़रिए एक धर्म के बहुमत के लिए कट्टरता पैदा की जा रही है। हम सब कुछ जान चुके हैं। हम हर जानकारी से सामान्य हो चुके हैं।

आतंकवाद किसे डरा रहा है। किसे मार रहा है। धर्म के नाम पर धर्म के लिए या सत्ता के खेल में किसी के लिए मार रहा है। धर्म में आतंकवाद है या धर्म से आतंकवाद है या धर्म के लिए आतंकवाद है। सब कुछ कहा जा चुका है। धर्म वालों ने निंदा की है, आतंक के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किए हैं कि हत्या गुनाह है। अभी हाल में केरल में इसके ख़िलाफ़ रैली हुई, दिल्ली में जमीयत ने विशाल रैली कर आतंक को ग़ैर इस्लामी कहा था। हमें नहीं मालूम दुनिया के बाकी हिस्सों में ऐसा हो रहा है या नहीं। यह इस्लाम को भी मार रहा है, मुसलमान को भी। पाकिस्तान-बांग्लादेश और दुनिया के तमाम देशों में मुसलमानों को भी मार रहा है।

आतंकवाद अलग-अलग धर्म और अस्मिता के नाम से आ चुका है। दूसरे धर्मों में धर्म के नाम पर गुंडे पैदा हो रहे हैं। यही गुंडे एकदिन आतंकवादी में बदल जाएंगे। राष्ट्रवादी आतंकवाद, इस्लामिक आतंकवाद या सिख आतंकवाद, तमिल आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद या शियाओं के खिलाफ सुन्नी आतंकवाद, नक्सल आतंकवाद। कोई पुजारी को मार रहा है तो कोई मौलवी को तो कोई सूफ़ी को। पाकिस्तान में क़व्वाल गायक अमजद साबरी के जनाज़े में लाखों लोग शामिल हुए। क्या इस प्रतिकार से कुछ हुआ? उसी पाकिस्तान में अहमदिया और शियाओं की हत्या हो रही है। सैकड़ों की संख्या में शिया डाक्टरों की हत्या हुई है। हम तो सिर्फ हिन्दू उत्पीड़न की ख़बरों पर राष्ट्रवादी हो लेते हैं। मगर वहां तो अपनों के क़त्ल हो रहे हैं।

हाल ही में वहां के चैनल के एक एंकर ने खुलेआम कह दिया कि हम लाखों अहमदियों के साथ क्या कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं ऐसा। ऐसा नहीं है कि हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने वाले नहीं हैं। एंकर ने तो अकेले आवाज़ उठाई। उसके खिलाफ फ़तवा जारी हो गया और चैनलों की नियामक संस्था ने एंकरिंग से हटा दिया। ढाका के अख़बारों में देखिए वहां के पत्रकार जो मुसलमान हैं कैसे खुलकर इस्लाम के राजनीतिक इस्तेमाल के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं। भारत में एक बाप ने ही अपने बेटे की गृह मंत्रालय से शिकायत कर दी कि उसका बेटा आईसिस के संपर्क में तो नहीं है। मुंबई के मां बाप को पता चला तो ख़ुद पुलिस के पास गए। समाज का समर्थन होता तो लाखों आतंकवादी पैदा हो गए होते। ज़ाहिर है इसके लिए किसी और का समर्थन काम कर रहा है।

इसलिए चुप्पी गिनने वालों का इरादा भी उतना ही ख़तरनाक है। वो इस गिनती के बहाने उसी बहुमत के आतंक को स्थापित करना चाहते हैं जो आतंक चाहता है। आतंक बहुमत को सिरफिरा बना देना चाहता है, निंदा या चुप्पी की गिनती करने वाले उसी प्रकार के दूसरे बहुमतवादियों का विस्तार कर रहे हैं। कुछ लोग हर घटना के बाद खोजने लगते हैं कितने सेकुलर चुप रहे। कितने सेकुलरों ने निंदा की। ऐसे शिनाख्त होती है जैसे इन्हीं की चुप्पी और समर्थन से आतंकवाद चल रहा है। गिनती का यह काम भी उसी सोच की पैदाइश है जो आतंकवाद के नाम पर फैलाने की कोशिश की जाती है। संदिग्ध करो। शिनाख्त करो। जैसे निंदा करना ही आतंकवाद से लड़ना हो गया है। जैसे निंदा कर आतंकवाद को मिटाया जा चुका है। चुप रहने से कुछ हुआ है, बोलने से कुछ हुआ है तो कोई बताए क्या हुआ है। प्रधानमंत्रियों और रक्षा मंत्रियों की निंदा से ही क्या हो गया। क्या हममें से कई धर्म के राजनीतिकरण और लोकतंत्र में उसे मुद्दा बनाने को लेकर बोलते हैं? क्या हम नहीं जानते कि भीड़ की सनक किसी के दिमाग़ में ज़हर भर देती है। लोकतंत्र में हर जगह टुच्चे धार्मिक सनकियों की धमक बढ़ती जा रही है। स्टेटस लिखने और ट्वीट करने की जगह इसे देखिए। इस पर लिखिए।

आतंकवाद को समझने के लिए तमाम मुल्कों में शोध संस्थान चल रहे हैं। जर्नल छप रहे हैं। किताबें मोटी हो रही है। विशेषज्ञ पैदा हो गए हैं। छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। आतंकवाद प्रायोजित है, आतंकवाद स्वाभाविक है। मूर्खों का आतंकवाद है तो पढ़े-लिखों का आतंकवाद है। नई-नई रक्षक सेनाएं बन रही हैं। नए-नए आतंकी गुट बन रहे हैं। हर जगह सीसीटीवी कैमरे लग रहे हैं। भाषण हो रहे हैं। प्रस्ताव पास हो रहे हैं। कोई कह रहा है आतंकवाद को परिभाषित करो। क्या परिभाषित करना है आतंकवाद को लेकर। ऐसा क्या है इसमें जिसे समझने के लिए परिभाषा जरूरी है। आतंक को परिभाषित किया जाए या उसके पनपने के कारणों को परिभाषित किया जाए। सब हो रहा है मगर आतंकवाद भी चल रहा है। लोग मारे जा रहे हैं। हर मौसम और त्योहारों में लाशों की गिनती हो रही है। हम अफ़सोस और ग्लानि से मरे जा रहे हैं। वो सिर उठाकर मुंह छुपा कर सबको मारे जा रहे हैं। एकजुटता का एलान बोगस होता जा रहा है। दो आतंकवादी आते हैं और सब बिखर जाता है।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं। यह उनके निजी विचार हैं। )

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