हरियाली निगल रही हैं अवैध आरा मशीनें

हरियाली निगल रही हैं अवैध आरा मशीनेंगाँवकनेक्शन

मेरठ। पिछले दिनों प्रदेश में पौधे लगाने के मामले में सरकार ने विश्व रिकॉर्ड बनाया। हर साल वन विभाग लाखों पेड़ लगाने का दावा भी करता है। लेकिन जमीन पर ये पेड़ दिखते नहीं हैं क्योंकि प्रदेश भर में संचालित अवैध आरा मशीनें हरियाली की दुश्मन बनी हुईं हैं।

मेरठ जिले में 120 आरा मशीनों को लाइसेंस मिला हुआ है जबकि 500 से छोटी-बड़ी आरा मशीनें अवैध रुप से चलाई जा रही हैं। इनमें से कई मशीनें हस्तिनापुर सुरक्षित वन क्षेत्र के आसपास भी हैं। इन मशीनों पर चोरी-छिपे जंगलों और तस्करी कर लाई गई लकड़ियों की चिरान होती है। मेरठ में आरा मशीनों की संख्या ज्यादा होने वजह खेल की फैक्ट्रियां भी हैं। मेरठ के बनाए बल्ले तो विदेशों तक प्रसिद्ध हैं। क्रिकेट के साथ ही कैरम समेत दूसरे लकड़ियों की यहां दर्जनों फैक्ट्रिया हैं। इसके साथ ही दिल्ली-एनसीआर से नजदीकी भी बड़ी वजह है।

मेरठ के थाना नौचंदी क्षेत्र रफाकत अली (48 वर्ष) एक आरा मशीन के संचालक हैं वो बताते हैं, “ खेल के सामान के साथ तेजी से बन रहे घर और अपार्टमेंट के लिए भी बन रहे हैं सबको लकड़ी तो चाहिए भी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 1994 से ही नई आरा मशीनों के लिए लाइसेंस नहीं मिल रहे। इसलिए कई अवैध आरा मशीनें भी चलाई जा रही हैं।”

वो आगे बताते हैं, “जिनके पास लाइसेंस है उनमें से कई लोग अनुमति तो 100 पेड़ की लेते हैं लेकिन काटते 500 हैं। अब मिलीभगत हैं।” मेरठ में लिसाड़ी गेट, ब्रह्मपुरी, नौचंदी, सदर बाजार, कोतवाली के शहरी क्षेत्र और हस्तिनापुर,किला परीक्षितगढ़ ,खरखौदा,जानी आदि में बड़े पैमाने पर आरा मशीनें देखी गई हैं।

वन विभाग और अवैध आरा मशीनों के बीच तालमेल कराने वाले तारापुरी इलाके के फारुख मियां बताते हैं, “सबको पैसा देना पड़ता है। पुलिस और वन विभाग की मदद के बिना कुछ नहीं हो सकता है।”

अपनी मजबूरी गिनाते हुए एक आरा मशीन संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, हम लोगों को लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन पुख्ता कराना पड़ता है। स्टॉक रजिस्टर रखना पड़ता है। मंडी समिति (3000 रुपये प्रति माह) वन विभाग (15000/-),सेल्स टैक्स (2500/-)प्रदूषण विभाग,अग्नि शमन यंत्र और प्रति वर्ष उन की जाँच, बिजली विभाग ,लेबर डिपार्टमेंट ,नगरनिगम आदि विभागों में प्रति वर्ष निर्धारित फीस तो देनी ही पड़ती है। ‘ऊपर से हर महीने भी कुछ न कुछ रुपये पहुंचाने पड़ते हैं। हम से सुखी तो बिना लाइसेंस वाले हैं वो ज्यादा कमाते हैं।”

हालांकि वन विभाग और प्रशासन के अधिकारी अवैध कटान से पूरी तरह इंकार करते हैं। मेरठ के जिला वन अधिकारी मनीष मित्तल बताते हैं, “हमारी टीम लगातार इन अवैध आरा मशीनों के खिलाफ कार्य कर रही है। मेरी नजर में ऐसी मशीने हैं ही नहीं अगर आप के पास कोई सबूत है तो आप दीजिए हम कार्रवाई करेंगे।” हालांकि गांव कनेक्शन के पास दर्जनों आरा मशीनों के फोटो हैं, जो अवैध रुप से संचालित की जा रही हैं।

स्पोर्ट्स कारोबारी पवन सोंधी बताते हैं, अधिकांश आरा मशीने रसूखवाले लोगों की है। एक कारोबारी ने इस बारे में वनविभाग से आरटीआई का जवाब मांगा था लेकिन सालभर से ऊपर हो गया कोई जवाब नहीं मिला।

अवैध आरा मशीनों से सरकार को लाखों रुपये के राजस्व के साथ पर्यावरण को भी हानि हो रही हैं। पर्यवारण विद अलोक कुमार बताते हैं, “मेरठ, बिजनौरस हापुड, मुजफ्फरनगर में छोटी-बड़ी कई प्लाइवुड फैक्ट्री हैं जो जंगल खा रही है हैं। कई हजारों एकड़ में फैला हस्तिनापुर वन क्षेत्र सिकुड़ता और वीरान होता जा रहा है। जंगली जानवरों और पशु पक्षियों के लिए भी ये खतरनाक हैं।”

रिपोर्टर - सुनील तनेजा

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