इक छोटी सी इल्तज़ा है आपसे

इक छोटी सी इल्तज़ा है आपसे

दोस्तों, मैं सोशल मीडिया से किसी के डर के कारण नहीं गया हूं। मैं ऐसा न अपने साथ कर सकता हूं और न आपके साथ। यह बात दिमाग़ से निकाल दीजिए कि चार लोग हैंडल बनाकर इधर-उधर टैग कर कुछ लिख देंगे तो मैं डर जाऊंगा। मैं सिर्फ इसी बात को लेकर डरा रहता हूं कि मुझसे कोई ग़लती न हो जाए और हो भी गई तो जान नहीं देने वाला। कुछ लोग और समूह हैं जो मुझसे डरते हैं। मेरी किसी रिपोर्ट या लिखावट से इतना डर जाते हैं कि इन्हें लगता है कि कहीं दुनिया ने उस पर यकीन कर लिया तो क्या होगा। ऐसा न हो सकता है और न किसी पत्रकार को यह मुगालता पालना चाहिए। पर उनका दांव बहुत ज्यादा है इसलिए वे डर कर मुझे डराने के नाम पर अनाप-शनाप लिखते हैं, तो उस तरफ डरपोकों की फौज है जो दिन रात अफवाह फैला रही है। ट्वीटर और फेसबुक पर नकली पेज बनाकर सांप्रदायिक किस्म की भी अफवाह फैलाई जा रही है।

मुझे डराने के नाम पर कुल खानदान का पता करने लगे हैं। मुझे अब हंसी भी नहीं आती। मेरे कुल खानदान में हर तरह के लोग मिल ही जाएंगे जैसे उनके कुल खानदान में हैं। मैं खुद के लिए जवाबदेह हूं। मुझे लेकर कुछ नहीं मिला तो लोग गाँव तक पहुंच गए हैं। मेरी जाति का भी पता करते हैं। मैं फिलहाल जानबूझ कर नहीं लिख रहा। वो जि़द्दी तो मैं भी जि़द्दी। लिखूंगा लेकिन अपने वक्त और मन के हिसाब से। बस देख रहा हूं कि वे कहां तक जा सकते हैं। चोरों की बारात है। कानाफूसी से डराने चले हैं। सुना है, और पता चला है से बात नहीं बनेगी उनकी। मैं लिखना नहीं चाहता कि वे कितना डरे हुए हैं। ल्युटियन दिल्ली के चाटुकारों को आजकल मुझे लेकर गुदगुदी हो रही है। होने दीजिए। आकाओं के दरबार से लौटकर लिखने की आदत है तो वो मेरे लिख देने से जाएगी नहीं। इंतज़ार कर रहा हूँ कि वे कितना लिख सकते हैं। जब दंगाई इस समाज में सिर झुका कर नहीं घूमता तो मैं डर कर छिपाने से रहा।

सोशल मीडिया पर मेरे बारे में तरह-तरह के अभियान चल रहे हैं। आप लोग मुझे एसएमएस कर रहे हैं। गाँवों में भी नौजवान स्मार्ट फोन पर दिखा देते हैं कि ये आपके समर्थन में अभियान चल रहा है और आप पत्रकारिता मत छोडि़ए। फिर विरोध में अभियान चलने लगता है। मुझे उनकी चिन्ता नहीं है लेकिन आप चाहने वालों की चिन्ता है। बिल्कुल मत सोचिए कि किसी ने डरा दिया और मैं चला गया। मेरे बारे में न तो लिखने की जरूरत है न किसी प्रकार का टेम्प्लेट बनाकर व्हाट्स अप पर घुमाने की। ऐसा मत कीजिए। इससे सारा मकसद फेल हो जाएगा। आप मेरे समर्थन में बिल्कुल मत लिखिए। हां ये जो प्रवृत्ति है उसके बारे में लिखिए लेकिन ध्यान रहे कि आप बिल्कुल वैसा न करें जैसा करने वालों के विरोध में आपको लिखना है। ऑनलाइन गुंडागर्दी से लडि़ए। अपने भीतर की उस निष्ठा से लडि़ए जिसके चलते आप या हम चुप हो जाते हैं ।

मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अकेला चलने का आदी रहा हूं। मैं पत्रकारिता छोड़ कर नहीं जा रहा। हां, यह सही है कि मैं इन दिनों घोर अंतर्द्वंद से गुज़र रहा हूं। भीतर से बेचैन हूं। भावुक आदमी हूं तो थोड़ा जल्दी असर हो जाता है और देर तक रहता है। सबके जीवन में ऐसा क्षण आता है। मेरा मन नहीं लगता अब इस पेशे में। नेताओं से मिलकर पत्रकार ही पत्रकार का भीतरघात कर रहे हैं। कई-कई दिनों तक अखबार भी नहीं पढ़ता। चैनल नहीं देखता। शायद यह वक्ती बेचैनी हो सकती है। काम की थकान भी हो सकती है और निर्थकता भी। रात-रात भर नींद नहीं आती। कभी दो बजे रात को उठ कर लिखने लगता हूं तो कभी रात भर पढ़ते रह जाता हूं। मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।

मेरी परेशानी सिर्फ उन चिरकुटों के गरियाने से नहीं है। कुछ और है। रोज़ कोशिश करता हूं इस उदासी से उबरने की। रोज अपने आप से लड़ रहा हूं। बहुत देर तक गहरी नींद सोना चाहता हूं मगर जल्दी जाग जाता हूं। लगता है दिमाग में मच्छर भनभना रहा है। मैं भयंकर जद्दोजहद से गुज़र रहा हूं। चूंकि आप मुझे लेकर चिन्तित हैं तो लिख रहा हूं। ये लड़ाई मेरे भीतर की भी है लेकिन सिर्फ अपने आप को लेकर नहीं है। आपके लिखने या हौसला बढ़ाने से कुछ समय के लिए फर्क तो पड़ता है मगर थोड़ी ही देर में उसी मनस्थिति में पहुंच जाता हूं। रास्ता मुझी को खोजना है। मुझे अकेला छोड़ दीजिए।

पत्रकारिता के अलावा कुछ आता भी नहीं। आता तो वाकई चला गया होता। यह पेशा घटिया हो गया है। इसमें कोई शक नहीं, पर मैं कुछ और कर नहीं सकता। आता भी नहीं है। उन लोगों का अनादर नहीं कर रहा जो अभी भी खुद को बचाकर लिख रहे है। लोगों के बीच जा रहे हैं। पर आपको यह भी जानना चाहिए कि अज्ञात शक्तियां लिखने वालों को डरा रही हैं। अख़बार ख़रीदते समय और चैनल देखते समय आप इस बात की चिन्ता जरूर करें। जो अख़बार लेते हैं उसे बीच-बीच में बंद भी किया कीजिये। एकदम से गुलाम की तरह किसी का पाठक और दर्शक मत बनिए। चैनलों के साथ भी यही कीजिए। मेरे साथ भी। नागरिक समूह बनाकर चाटुकारिता करने वाले अख़बारों या चैनलों को अपने मोहल्लों में कुछ समय के लिए बंद करवाइए लेकिन ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं। आपसी चर्चा और सहमति से। पत्रकारिता को लेकर छोटे-छोटे नागरिक सत्याग्रहों की जरूरत है ।

इसके बाद भी आपके लिए नई-नई कहानियां खोजने में लगा रहता हूं। फ़र्क ये है कि उन कहानियों तक ख़ुद को खींच कर ले जाता हूं। पहले अपने आप चला जाता था। आपने अभी तक मुझे बहुत प्यार दिया है। इसका कुछ-कुछ अहसास हो रहा है। कभी मेरे लिखने बोलने से ठेस पहुंची हो तो माफ कीजिएगा। गुस्से में बोल देता हूं। लिखते समय यह भी ख्याल आ रहा है कि मैं हूं कौन जो अपील जैसा लिख रहा हूं। खुद पर हंसी भी आ रही है।

मैं सोशल मीडिया पर भी आ जाऊंगा। यह कह कर गया भी नहीं था कि कभी नहीं आऊंगा। मैं अच्छा दामाद हूं। ससुराल में रूठता नहीं हूं। इसलिए आपको मनाने की ज़रूरत नहीं है। मैं चाहता ही हूं अकेला चलना। किसी एकांत से आपको देखना और किसी एकांत में अपने भीतर झांकना। कुछ कमज़ोरियों हैं। कुछ बेचैनियां हैं। कुछ मजबूरियां भी हैं। काश मैं थोड़ा सख्त होता। दोस्त ठीक ही कहते हैं यार तुम नाज़ुक बहुत हो, पर क्या नाज़ुक होना अच्छा नहीं! मैं कस्बा पर तो लिख ही रहा हूं वहां भी लिखूंगा जहां आप चाहते हैं। बस ये सब समर्थन वाला फॉरवर्ड करना बंद कर दीजिए। गाली और ताली, एक फूल दो माली। छोटी सी इल्तज़ा लंबी हो गई इसके लिए माफी।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं, ये उनके निजी विचार हैं) 

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