इलाहाबाद विश्वविद्यालय एक नमूना है, मर्ज़ बहुत व्यापक है

इलाहाबाद विश्वविद्यालय एक नमूना है, मर्ज़ बहुत व्यापक हैगाँव कनेक्शन

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने अपना त्यागपत्र देने की पेशकश की है, यह कहते हुए कि किसी विधायक और सांसद को कुलपति बना दें। यहां तक ठीक था लेकिन उन्होंने साथी अध्यापकों के त्यागपत्र की भी बात कही है, यह बन्दरघुड़की जैसा लगता है। ऐसे हालात के लिए अकेले सरकार को, या कुलपतियों और अध्यापकों को अथवा छात्रों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सभी ने मिलकर ये हालात पैदा किए हैं। 

इलाहाबाद में वर्तमान विवाद की जड़ है ‘ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा’ जिसका विरोध राजनैतिक कारणों से हुआ है। अच्छा होता इस तरह का फैसला कुलपतियों की बैठक में किया गया होता और देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी लागू होता। कठिनाई तब अधिक होती है जब विश्वविद्यालय प्रशासन का निर्णय निष्पक्ष और निर्भीक नहीं होता। पुराने समय के कुलपति राधाकृष्णन, जा़किर हुसैन, आचार्य नरेन्द्र देव, आशुतोष मुखर्जी ने त्यागपत्र देने की बात कही होती तो राजनीति में भूचाल आ जाता। हांगलू साहब की धमकी से तिनका भी नहीं हिला।

विश्वविद्यालयों में प्रवेश परीक्षा पर बहस नहीं हो सकती क्योंकि पढ़ने वालों की संख्या दिन पर दिन बढ़ी है और स्थान तथा सुविधाएं उस हिसाब से नहीं बढ़ी हैं। इसके साथ ही प्रत्येक राजनैतिक दल का छात्र संगठन वहां मौजूद है जो कहता है उच्च शिक्षा हमारा मौलिक अधिकार है। जब से वोट डालने की उम्र 18 साल हुई तो प्रत्येक विश्वविद्यालय वोट बैंक बन गया। नेताओं का हित समाधान खोजने में नहीं है, भीड़ बढ़ाने में है। यदि विश्वविद्यालयों में केवल एमए, एमएससी और एमकॉम की पढ़ाई तथा शोधकार्य रहे और बीए, बीएससी और बीकॉम की पढ़ाई डिग्री कॉलेजों में हो तो विश्वविद्यालयों पर दबाव घट सकता है। 

कुलपतियों के सामने प्रमुख समस्याएं होती हैं प्रवेश, छात्रसंघ चुनाव और परीक्षाएं जिनके लिए विश्वविद्यालय बना है। छात्रसंघों के सम्बन्ध में लिंगदोह कमीशन ने कुछ सुझाव दिए थे जो बहुत उपयोगी और प्रभावी हो सकते थे, लेकिन उन पर अमल नहीं किया गया। छात्र राजनीति और अध्यापक राजनीति ने परिसरों को दूषित कर रखा है। अध्यापकों में दो गुट हो जाते हैं, कुलपति पक्ष और कुलपति विपक्ष। यदि दोनों ही पक्ष किसी बात पर सहमत हों तो कुलपति के असहज होने का कोई कारण नहीं। 

कई बार विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सवाल उठाया जाता है। आज से करीब 60 साल पहले स्वायत्तता थी, आर्थिक, प्रशासनिक और अकादमी स्वायत्तता। लखनऊ विश्वविद्यालय के कोषाध्यक्ष सीबी गुप्ता हुआ करते थे जो मुख्यमंत्री बने बाद में। वह पर्याप्त धन जुटा लेते थे लेकिन विश्वविद्यालयों ने स्वायत्तता का मतलब स्वच्छन्दता समझा और आर्थिक अनुशासन नहीं रहा, विश्वविद्यालय कर्जे में चले गए। तब की कांग्रेस सरकार ने विश्वविद्यालयों को धन देना आरम्भ किया लेकिन आर्थिक तथा प्रशासनिक स्वायत्तता छीन ली। प्रत्येक विश्वविद्यालय में अपना रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी बिठा दिया। 

अभी भी अकादमी स्वयत्तता बची थी और प्रत्येक विश्वविद्यालय बहुत दिनों तक सरस्वती मन्दिर बने रहे। वर्दीधारी पुलिस वहां घुस नहीं सकती थी। कुलपतियों का स्तर गिरता गया, जोड़-तोड़ करके सामान्य लोग कुलपति बनने लगे और उन्होंने प्राध्यापकों के चुनाव में मनमानी आरम्भ की, जिससे छात्रों में असन्तोष बढ़ता गया और अनुशासनहीनता भी। आज की तारीख में परीक्षाएं कराने के लिए भी कुलपति सरकार पर निर्भर हैं, पुलिस के बगैर सम्भव नहीं। बावजूद इसके सभी कुलपति स्वायत्तता की बात करते हैं। है कहां स्वायत्तता जिसकी दुहाई दे रहे हैं, वह तो 60 साल पहले जा चुकी।

पश्चिमी देशों में दो प्रकार के विश्वविद्यालय होते हैं, स्टेट यूनिवरसिटीज़ यानी सरकारी विश्वविद्यालय और प्राइवेट यूनिवरसिटीज़। वहां प्रवेश की मारामारी नहीं है। एक तो वे नहीं मानते कि उच्च शिक्षा मौलिक अधिकार है और दूसरे वहां आबादी के हिसाब से शिक्षा संस्थानों की कमी नहीं है। सच यह है कि यदि भारत जैसे देशों से छात्र वहां न जाएं तो उनके विश्वविद्यालयों में सन्नाटा छा जाए। वे लोग हमें जितनी छात्रवृत्ति देते हैं उससे कई गुना कीमत की बौद्धिक सम्पदा कमा लेते हैं। अपनी समस्या का समाधान हमें खुद ही निकालना होगा। सारे देश के कुलपतियों का हर साल सम्मेलन होता है जिसमें सरकार की भी भागीदारी रहती है। यदि ये सब मिलकर भी समाधान नहीं निकाल पाए तो उच्च शिक्षा का क्या होगा, पता नहीं। 

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