इनकी रोटी ही सिंघाड़े की खेती से आती है

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कानपुर देहात। जुलाई महीने में अच्छी बारिश होने से किसानों ने सिंघाड़े की खेती शुरू कर दी है, पिछले दो साल से सूखे की वजह से सिंघाड़े की खेती को बहुत नुकसान हो रहा था लेकिन इस बार किसानों को सिंघाड़े की अच्छी पैदावार की उम्मीद है।

कानपुर देहात जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर मैथा ब्लॉक के बैरी सवाई गाँव के कई किसान सिंघाड़े की खेती कर रहे हैं। इनका मुख्य व्यवसाय ही सिंघाड़े की खेती है। बैरी सवाई गाँव के मोनू कश्यप (22 वर्ष) बताते हैं, “हमारे यहां कई पीढ़ियों से सिंघाड़े की खेती की जा रही है। पिछले साल सूखा पड़ जाने के कारण सभी फसलों की तरह सिंघाड़े की फसल को भी नुकसान का सामना करना पड़ा था। बारिश की कमी के कारण तालाबों में ट्यूबवेल से पानी भराना पड़ा था, लेकिन अच्छी फसल भी नहीं हुई थी। अब इस बार अच्छी बारिश से अच्छी पैदावार की उम्मीद की जा रही है।”

सबसे पहले सिंघाड़े की पौध छोटे तालाब में तैयार करते हैं। इसके बाद इसे तैयार करने के दौरान डीएपी व जैविक खाद डालनी पड़ती है। कीटनाशक दवाओं का भी प्रयोग करते हैं। अक्तूबर महीने में फसल तैयार होनी शुरू हो जाती है। इसके बाद सिंघाड़े की तुड़ाई की जाती है। करीब तीन से चार महीने में फसल तैयार होती है। बाजार में फल को सूखा कर या इसे कच्चा ही 10 से 15 रुपए प्रति किलो बेचा जाता है। 

उसी गाँव के राम सहारे (62 वर्ष) सिंघाड़े की खेती के बारे में बताते हैं, “हम लोग इस फसल के लिए मार्च के महीने में ही बीज डाल देते हैं। इसमें बीज के लिए पके हुए सिंघाड़े को तालाब में डाल देते हैं जो कि अंकुरित हो जाते हैं। कुछ पके सिंघाड़े जो तालाब में छूट जाते हैं वो भी अंकुरित हो जाते हैं। 

वो आगे कहते हैं, “अगर तालाब में बेल कम दिखती है, तो हम दूसरे से भी खरीदते हैं, जिसके पास बेल जरूरत से ज्यादा होती है वह अपनी बेल की बिक्री करते हैं। एक हजार रुपए में 40 किलो (एक मन) बेल मिलती है। एक बीघा तालाब में सात-आठ मन बेल लगती है।” 

सिंघाड़ा भी दो तरह का होता है, एक जो कच्चा या उबालकर बेचते हैं और दूसरा जो सुखाकर बेचते हैं। इस फसल में प्रति बीघा लगभग दस हजार रुपए की लागत लग जाती है, अबकी बार पिछले वर्ष का भी औसत निकल आना चाहिए।

छोटे कश्यप (59 वर्ष) बताते हैं, “हमारे पास अपना खुद का तालाब नहीं हैं। हम लोग दूसरों के तालाब बटाई में ले लेते हैं। तालाबों का किराया बीघा और पानी के साधन के हिसाब से तय किया जाता है। इस बार बारिश हो जाने से तालाबों की किराए में भी इजाफा हुआ है। ज्यादातर सिंघाड़े की फसल कश्यप जाति के ही लोग करते हैं।”

स्वयं वालेंटियर: अंकित यादव

स्कूल: बीए तृत्तीय वर्ष

 पता: रामजानकी महाविद्यालय, बैरी असई, कानपुर देहात

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